साल 1951 के एशियन गेम्स. दिल्ली का नेशनल स्टेडियम. भारतीय फुटबॉल टीम गोल्ड मेडल जीत चुकी थी. स्टेडियम में मौजूद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तालियां बजाकर टीम की जीत का जश्न मना रहे थे. लेकिन मैच के असली हीरो और इकलौते गोल करने वाले शियो मेवालाल मैदान पर नहीं थे. मैदान से कुछ दूर भारतीय एयरफोर्स का डकोटा प्लेन उनका इंतजार कर रहा था.
Asian Games 1951 : जब एक फुटबॉलर के लिए पीएम नेहरू ने मंगवा लिया था एयरफोर्स का प्लेन!
क्यों एक खिलाड़ी के लिए भारतीय एयरफोर्स का प्लेन मंगाया गया? आखिर क्यों महज एक खिलाड़ी के लिए देश के प्रधानमंत्री ने इतना बड़ा कदम उठाया? यह कहानी है एशियन गेम्स 1951 और इन खेलों के सबसे बड़े हीरो शियो मेवालाल की.

लेकिन ऐसा क्यों? क्यों एक खिलाड़ी के लिए भारतीय एयरफोर्स का प्लेन मंगाया गया? आखिर क्यों महज एक खिलाड़ी के लिए देश के प्रधानमंत्री ने इतना बड़ा कदम उठाया? यह कहानी है एशियन गेम्स 1951 और इन खेलों के सबसे बड़े हीरो शियो मेवालाल की.
भारत के लिए अहम था फुटबॉल गोल्डसाल 1951 में भारत को एशियन गेम्स की मेजबानी करने का मौका मिला. देश को आजाद हुए महज चार साल हुए थे, लेकिन भारत तरक्की की राह पर चल पड़ा था. पीएम नेहरू के लिए यह खेल दुनिया को अपनी ताकत दिखाने का बड़ा मौका था. इन खेलों के जरिए वह यह संदेश देना चाहते थे कि अंग्रेजों से मुक्त भारत हर तरह से सक्षम है. देश की राजधानी दिल्ली को मेहमानों की मेजबानी के लिए तैयार किया गया. एशियाई मेहमानों के स्वागत की तैयारियां की गईं. लेकिन सिर्फ इतना काफी नहीं था. नेहरू जानते थे कि मैदान के बाहर की कोशिशों के साथ-साथ मैदान पर जीत भी जरूरी है. और उन्हें सबसे ज्यादा उम्मीदें थीं भारत की फुटबॉल टीम से. वह टीम जो तीन साल पहले ओलंपिक में ऐतिहासिक प्रदर्शन करके लौटी थी.
एशियन गेम्स के फुटबॉल टूर्नामेंट में छह टीमें हिस्सा ले रही थीं. लेकिन फिलिपींस ने हिस्सा नहीं लिया. अफगानिस्तान और जापान को सीधे सेमीफाइनल में जगह मिली थी. भारत को सेमीफाइनल में पहुंचने के लिए इंडोनेशिया का सामना करना था. भारत ने यह मुकाबला 3-0 से जीत लिया. इसमें शियो मेवालाल ने एक गोल किया. इसके बाद सेमीफाइनल में टीम का सामना अफगानिस्तान से था. भारत को यहां भी जीत के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी. उसने 3-0 से मैच जीता और फाइनल में जगह बना ली.
लेकिन, इसके बाद था आखिरी और सबसे मुश्किल टेस्ट, ईरान. यह टीम उस समय एशिया की मजबूत टीमों में शामिल थी. भारतीय टीम इस फाइनल के लिए पूरी तरह तैयार थी, लेकिन शियो मेवालाल नहीं.
मेवलाल लौटना चाहते थे घरदिग्गज फुटबॉल पत्रकार नोवी कपाड़िया ने अपनी किताब *Barefoot to Boots* में लिखा है कि फाइनल 10 मार्च को होना था. मैच से पहले मेवालाल को कोलकाता से तार आया. उन्हें पता चला कि उनके परिवार में किसी करीबी का निधन हो गया है. यह सुनते ही मेवालाल कोलकाता रवाना होना चाहते थे. टीम के कोच सैयद अब्दुल रहीम ऐसा नहीं चाहते थे. वह जानते थे कि मेवालाल के बिना टीम के लिए जीतना बहुत मुश्किल होगा. उन्होंने मेवालाल को उस मैच की अहमियत समझाने की कोशिश की. लेकिन मेवालाल अंतिम संस्कार में शामिल होना चाहते थे.
जब मेवालाल नहीं माने तो कोच रहीम ने पीएम नेहरू से बात की. नेहरू फुटबॉल फैन से ज्यादा मेवालाल के फैन थे. वह टीम में उनकी अहमियत अच्छी तरह समझते थे. और यह भी जानते थे कि फुटबॉल फाइनल पर लोगों की नजरें टिकी थीं. भारत के लिए गोल्ड जीतना बहुत जरूरी था. उन्होंने मेवालाल से खुद बात की. उन्हें मैच खेलने के लिए तैयार किया. साथ ही यह जिम्मेदारी ली कि अंतिम संस्कार से पहले मेवालाल कोलकाता पहुंच जाएंगे.
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नेहरू ने ड्रेसिंग रूम में दी स्पीचफाइनल मैच में दोनों टीमों के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिली. पहले हाफ में दोनों टीमें कोई गोल नहीं कर सकीं. हाफ टाइम तक स्कोर 0-0 था. हाफ टाइम के ब्रेक में खुद पीएम नेहरू ड्रेसिंग रूम में पहुंचे. उन्होंने टीम का उत्साह बढ़ाने के लिए स्पीच दी. इस स्पीच का असर भी दिखा. हाफ टाइम के फौरन बाद ही मेवालाल ने गोल किया. उनका यह गोल निर्णायक साबित हुआ. ईरान ने इसके बाद गोल करने की काफी कोशिश की, लेकिन भारतीय डिफेंस को भेद नहीं पाया.
भारत ने यह मैच 1-0 से अपने नाम किया और एशियन गेम्स फुटबॉल में पहला गोल्ड मेडल जीता. खचाखच भरा स्टेडियम झूम उठा. भारतीय टीम पोडियम पर खड़ी हुई और राष्ट्रगान बजा.
एयरफोर्स प्लेन में घर लौटे मेवालालजीत के बाद नेहरू अपना वादा नहीं भूले. मेवालाल मेडल सेरेमनी खत्म होते ही स्टेडियम से निकल गए. पास के ही सफदरजंग एयरपोर्ट पर भारतीय एयरफोर्स का डकोटा उनका इंतजार कर रहा था. नेहरू के कहने पर इस प्लेन को खासतौर पर मेवालाल के लिए लाया गया था. मेवालाल जश्न छोड़कर कोलकाता रवाना हो गए. वह समय पर अपने परिवार के पास पहुंच गए थे.
मेवालाल ने मैदान पर अपना कर्म किया और परिवार के पास जाकर अपना फर्ज निभाया. आपको बता दें कि मेवालाल भारत के सबसे कामयाब स्ट्राइकर्स में शामिल हैं. कई किताबों और स्रोतों में दावा किया जाता है कि उन्होंने अपने करियर में 1,000 से ज्यादा गोल किए, जिनमें 32 हैट्रिक शामिल थीं. वह अपने दोनों पैरों से शूट करने के लिए जाने जाते थे. रनिंग बॉल के साथ गोल करने की उनकी प्रतिभा को उस दौर में काफी सराहा जाता था, क्योंकि यह काफी दुर्लभ थी. मेवालाल उन खिलाड़ियों में शामिल थे, जो अपनी बाइसिकल किक और राबोना किक के लिए भी जाने जाते थे.
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