दरअसल तमाम विवाद के बाद भी अखिलेश यादव अपने बयानों में कह रहे हैं कि नेताजी इन तीन महीनों के लिए पार्टी मुझे दे दें इसके बाद उन्हें में सारी चीज़ें लौटा दूंगा. अखिलेश ने शिवपाल और अपर्णा यादव को टिकट देकर परिवार को साथ लेकर चलने वाले ‘मुखिया’ बनने की भी कोशिश की है. मगर इस पार्टी वापस करने की बात में कितना दम है वो अखिलेश यादव के प्रचार रथ की डिज़ाइनिंग में आए दो बदलावों से समझा जा सकता है.पहली तस्वीर लगभग दो महीने पहले की है. तब नेताजी अपने बेटे को सार्वजनिक रूप से हड़का ले रहे थे. अखिलेश तुनक रहे थे मगर हर बात के आखिर में जो नेताजी कहेंगे वो करूंगा की बात भी कह दे रहे थे. तब 'समाजवादी विकास रथ' में नेताजी की तस्वीर बड़ी थी और साइकिल चलाते टीपू बैकड्रॉप में ही थे.
विवाद बढ़ा, दो फाड़ की नौबत आई. चुनाव आयोग तक बात पहुंची, रणनीति और ताकत के कॉम्बिनेशन के साथ अखिलेश पार्टी के नए कलेक्टर(शब्द के पीछे की भावनाओं को समझे) हो गए. अब कांग्रेस के साथ गठबंधन हो गया है. तो प्रचार रथों पर अखिलेश प्रमुख हैं इसके बाद डिंपल हैं. शिवपाल वगैरह नदारद हैं. और नेताजी, उन्हें राहुल गांधी के बगल में और बराबर जगह मिली है.
ज़्यादा टेंशन न लें, सियासत है यहां रवादारी समझनी पड़ती है. बिना रोज़ा रखे रोज़ अफ्तारी करने वाले लोगों की तस्वीरें और सियासी हैसियत इसी तरह से कम ज़्यादा होती रहती है. तो निरपेक्ष भाव से नाना प्रकार के सुखों का भोग करते हुए तय करिए कि किसे वोट देना है और किसे नहीं देना. ये भी पढ़ें













