The Lallantop

हिमाचल की इस सीट पर मोदी के मंत्री अपनी कॉलेज की लड़ाई निपटा रहे हैं

स्टूडेंट यूनियन का झगड़ा कित्ता बड़ा हो गया?

Advertisement
post-main-image
बंबर ठाकुर (बाएं) और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा (दाएं)

लड़के हैं, लड़ते हैं, झगड़ते हैं और आगे बढ़ते हैं. मगर हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर में ऐसा नहीं होता. यहां स्टूडेंट यूनियन के दौर की वफादारियां और दुश्मनियां आज भी याद रखी और रखवाई जाती हैं. इसकी शुरुआत होती है 1990 से. इस साल बिलासपुर के ही रहने वाले जगत प्रकाश नड्डा भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते हैं. हिमाचल प्रदेश में शांता कुमार की भाजपा सरकार बनती है. और बिलासपुर सदर की सीट से बीजेपी के टिकट पर सदाराम ठाकुर जीतते हैं. मगर अब नड्डा की इस सीट पर नजर है.

Advertisement

उधर बिलासपुर जिले के अहुर गांव का एक लड़का है. बंबर ठाकुर. पिता सरकारी विभाग में चपरासी. लड़का दबंगई के स्वभाव वाला. वो 1990 में कॉलेज यूनियन का चुनाव लड़ता और जीतता है. उसका इल्जाम है कि कांग्रेस की राजनीति करने के चलते भाजपा उसे परेशान करती है. उसका ये भी इल्जाम है कि जगत प्रकाश नड्डा के साथी उस पर जानलेवा हमला करते हैं. उसे मारपीटकर गोविंद सागर झील में फेंक देते हैं. पुलिस भी सुनवाई नहीं करती. और इस तरह उसका संघर्ष जारी रहता है.


बंबर ठाकुर
बंबर ठाकुर

कैलेंडर में तीन साल पलटते हैं. 1993 में बाबरी मस्जिद ध्वंस के संदर्भ में हिमाचल में फिर चुनाव होते हैं. सदर की सीट पर नड्डा दिल्ली के संपर्कों के बूते टिकट ले आते हैं. सिटिंग एमएलए का टिकट कटवाकर. और चुनाव जीत जाते हैं. मगर बीजेपी इन चुनावों में बुरी तरह हारती है. खुद शांता कुमार समेत उनके ज्यादातर मंत्री चुनाव हार जाते हैं. नड्डा को नेता प्रतिपक्ष बना दिया जाता है. वो शहर में भाजपा और युवा मोर्चा को खूब सक्रिय करते हैं. बंबर ठाकुर ठेकेदारी के जरिए कांग्रेस सरकार का लाभ उठाना शुरू करते हैं. 1997 के चुनाव में टिकट मांगते हैं. पर्चा भी दाखिल कर देते हैं. मगर वीरभद्र के कहने पर कांग्रेस कैंडिडेट और पूर्व विधायक बाबूराम गौतम के पक्ष में नामांकन वापस ले लेते हैं.

Advertisement

बाबूराम गौतम
बाबूराम गौतम

नड्डा इन्हीं बाबूराम गौतम को हराकर दूसरी बार विधायक बनते हैं. उसके बाद वो सूबे के सेहत मंत्री बनते हैं. मगर पांच साल बाद जब चुनाव होते हैं, तो जनता उनसे बेतरह नाराज होती है. वो कांग्रेस के तिलकराज शर्मा के खिलाफ चुनाव हार जाते हैं. बंबर को फिर टिकट नहीं मिलता. तब वो अपना ध्यान शहर से हटाकर गांव की तरफ लगाते हैं. और इसकी बदौलत 2005 में जिला परिषद का चुनाव जीत जाते हैं. 2007 के चुनाव में जब कांग्रेस उन्हें फिर टिकट नहीं देती, तो वो निर्दलीय चुनाव लड़ जाते हैं. नड्डा जीतते हैं और कांग्रेस का सिटिंग विधायक हारता ही नहीं, बल्कि तीसरे नंबर पर चला जाता है. दूसरे नंबर पर आते हैं बंबर ठाकुर.

jp-nadda
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा

इसके बाद के दौर में नड्डा की हिमाचल बीजेपी में पूछ कम होती है. वो केंद्र की राजनीति में सक्रिय हो जाते हैं. इधर बंबर बिलासपुर में ही सक्रिय हैं. 2012 में कांग्रेस आखिरकार उन्हें टिकट दे देती है. मगर इस बार नड्डा मैदान में नहीं थे. बीजेपी ने हमीरपुर के पूर्व सांसद सुरेश चंदेल को उतारा था. बंबर को उन पर फतेह हासिल होती है और आखिरकार स्टूडेंट यूनियन के दिनों में पाला उनका सपना पूरा होता है. उधर नड्डा का सपना दूसरे रास्ते से पूरा होता है. वो पहले तो बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव बनते हैं, फिर राज्यसभा सांसद और 2014 में मोदी सरकार बनने पर सेहत मंत्री.


सुरेश चंदेल (बीच में)
सुरेश चंदेल (बीच में)

अब आए 2017 के चुनाव. बंबर फिर कांग्रेस के टिकट पर मैदान में हैं. नड्डा बिलासपुर को एम्स की सौगात दे चुके हैं और उनका अरमान मुख्यमंत्री बनने का है. इसके लिए ज़रूरी है बिलासपुर जिले की चार सीटों पर क्लीन स्वीप करना. पिछली बार भाजपा यहां नयना देवी की सीट छोड़कर बाकी तीन हारी थी. नड्डा के लिए सबसे ज्यादा ज़रूरी है सदर की सीट से बीजेपी को जितवाना, जहां वो खुद तीन बार विधायकी पाकर शिमला गए थे. और इसीलिए इस बार उन्होंने टिकट दिलवाया अपने भरोसेमंद सुभाष ठाकुर को. नाम सुभाष ठाकुर का है, मगर बात नड्डा की ही हो रही है. बंबर ठाकुर भी इसे डेविड वर्सेस गोलिएथ की लड़ाई बनाने में जुटे हैं. उनका कहना है कि अगर यहां से भाजपा हारी, तो नड्डा की दावेदारी खत्म हो जाएगी.


सुभाष ठाकुर
सुभाष ठाकुर

उधर जगत प्रकाश नड्डा खेमे का कहना है कि बंबर ठाकुर की सियासी हैसियत ऐसी नहीं कि वो जगत प्रकाश नड्डा को चुनौती देने की सोचें. उन्होंने पांच साल सिर्फ दंबगई की. कभी DFO से झगड़ा किया कभी RTO से.

Advertisement

अब जनता सब झगड़ों का निपटारा करेगी. झगड़ा, जिसकी शुरुआत कॉलेज के दिनों में हुई थी.




पढ़िए हिमाचल से आईं ग्राउंड रिपोर्ट्स:

कांग्रेस विधायक ने बगल की सीट के कांग्रेसी कैंडिडेट को कोसा

जब एक निर्दलीय विधायक ने बीजेपी-कांग्रेस दोनों को रुलाया

जिस जिले से हिमाचल का निर्माता निकला, वही विकास में पीछे क्यों रह गया?

हिमाचल चुनाव: बड़ा अनोखा है इस कांग्रेसी बाप-बेटे की उम्र का गणित

देखिए अपने भाषण में क्या कह रही हैं देश के स्वास्थ्य मंत्री की पत्नी:

Advertisement