भारतीय चुनाव आयोग के SIR के खिलाफ CJP और कांग्रेस समेत तमाम संगठनों ने विरोध किया. अब भारत और विदेशों के संस्थानों से जुड़े लगभग 80 भारतीय वैज्ञानिकों ने चुनाव आयोग को एक खुला लेटर लिखा है. इस लेटर में उन्होंने 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) को रद्द करने की मांग की है. उन्होंने इसे बड़ी संख्या में ‘लोगों को उनके वोटिंग अधिकार से वंचित करने की प्रक्रिया’ करार दिया. वैज्ञानिकों ने मतदाता सूची के रिवीजन में पारदर्शिता लाने, गलत तरीके से हटाए गए एलिजिबल वोटर्स को फिर से शामिल करने और मनमाने ढंग से वोटिंग अधिकार छीने जाने के खिलाफ सुरक्षा उपाय लागू करने की मांग की.
'वोटिंग राइट छीनने वाला SIR रद्द करो', 80 वैज्ञानिकों ने चुनाव आयोग को लिखी चिट्ठी
भारत और विदेशों के संस्थानों से जुड़े करीब 80 वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने 23 अक्टूबर को लिखे खुले पत्र में SIR को रद्द करने, गलत तरीके से हटाए गए पात्र मतदाताओं के नाम बहाल करने और मतदाता सूची में पारदर्शिता बढ़ाने की मांग की है.

लेटर में वैज्ञानिकों ने इस बात पर चिंता जताई कि SIR के जरिए वोटर लिस्ट से काफी नागरिकों को बिना किसी उचित प्रक्रिया के हटा दिया गया. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक इस लेटर पर साइन करने वालों में IISER कोलकाता, HBCSE-TIFR मुंबई, इंस्टीट्यूट ऑफ मैथमेटिकल साइंसेज चेन्नई, टेक्सस टेक यूनिवर्सिटी (अमेरिका), यूनिवर्सिटी ऑफ बर्मिंघम (यूके), IISc बेंगलुरु, IIT-दिल्ली, न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ स्टटगार्ट (जर्मनी) जैसे संस्थानों के वैज्ञानिक शामिल हैं.
लेटर में वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि उन्होंने व्यक्तिगत हैसियत से इस बयान का समर्थन किया है. ये उनके अपने निजी विचार हैं और इनका उनके संस्थानों के विचारों से कोई लेना-देना नहीं है.

प्रवासी मजदूरों, हाशिए पर रहने वाले समुदायों और कमजोर वर्गों के एलिजिबल वोटर्स के नाम लिस्ट से हटाए जाने को 'मनमाना' और 'अनुचित' बताया गया. लेटर में कहा गया कि यह कदम लोकतांत्रिक अधिकारों की नींव पर प्रहार करता है. उन्होंने आगे कहा कि 'मतदान का अधिकार' लोकतंत्र का एक बुनियादी स्तंभ है.
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भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के हालिया आंकड़ों से पता चलता है कि अब तक मतदाता सूची से 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं. लेटर में कहा गया कि कानून में किसी व्यक्ति को तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक कि वह दोषी साबित न हो जाए. उसी तरह चुनावी प्रक्रिया में किसी भी बदलाव के जरिए नागरिकों को उनके वोट देने के अधिकार से वंचित करना उचित नहीं ठहराया जा सकता. खासकर तब जब ऐसा जटिल प्रक्रियाओं, अपर्याप्त सुरक्षा उपायों या अपनी एलिजिबिलिटी साबित करने का उचित मौका न मिलने के कारण किया गया हो.
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