पहले वीडियो देखिए:
यहां हंगामा भी हुआ और शांता इस वीडियो में कहते दिख रहे हैं कि शांता कुमार की पहली चॉइस प्रवीण शर्मा ही थे. जितनी बार भी पार्टी आलाकमान से मीटिंग हुई उसमें पालमपुर से प्रवीण शर्मा के नाम पर ही सहमति बनी. शांता कहते दिख रहे हैं कि एक बार नहीं 6 बार नामों पर सोचा गया. 6 की 6 बार पालमपुर से प्रवीण का नाम आया. मगर जब दिल्ली में फाइनल मीटिंग हुई तो बात उठी कि महिलाओं को हिमाचल में रिप्रजेंटेशन देना है और फिर प्रवीण की जगह इंदू गोस्वामी को पालमपुर से टिकट फाइनल कर दिया गया.
खुद को टिकट नहीं मिलने से नाराज प्रवीण शर्मा ने निर्दलीय पर्चा भर दिया है और अब पालमपुर में भाजपा के लिए सीट बचाने का संकट सामने दिख रहा है. संकट इसलिए कि सामने बृज बिहारी बुटैल के बेटे आशीष बुटैल को टिकट मिला है और खुद प्रवीण की इलाके में अच्छी पकड़ है. अब इंदू गोस्वामी को पैराशूट कैंडिडेट कहा जा रहा है और 'गो बैक इंदू गोस्वामी' के खूब नारे लगते भी दिख रहे हैं
क्या मोदी की खास हैं इंदू?

इंदू गोस्वामी दावा करती हैं कि वो नरेंद्र मोदी को लंबे समय से जानती हैं और उनकी वजह से ही हिमाचल में कुल सात महिलाओं को बीजेपी टिकट मिला है.
इंदू गोस्वामी को पालमपुर से टिकट मिलने से शांता की गृह-सीट में हड़कंप मचा हुआ है. माना जा रहा है कि इंदू का नाम पीएमओ यानी प्रधानमंत्री कार्यलय से फाइनल हुआ है. वो पालमपुर की नहीं बल्कि पास ही के बैजनाथ की रहने वाली हैं. साथ ही भाजपा की प्रदेश महिला मोर्चा की अध्यक्ष भी हैं. इंदू की जीत सुनिश्चत करने की जिम्मेदारी भी शांता कुमार पर है. इंदू गोस्वामी ही टिकट की एक ऐसी दावेदार रही, जिनकी वजह से दूसरी महिला नेताओं को भी भाजपा ने टिकट दिया है। जिसकी वजह से प्रदेश की राजनीति में उथल पुथल मच गई।
बताया जा रहा है कि मोदी ने गुजरात के लिए निकलने से पहले हिमाचल चुनावों पर उम्मीदवारों के नामों पर मीटिंग की थी. इसमें उन्होंने पूछा कि हिमाचल में कितनी महिलाओं को पार्टी चुनावों में उतार रही है, जिसके बाद इंदू समेत सात महिलाओं के नाम फाइनल हुए. खुद इंदू ने अपने एक इंटरव्यू में कहा है कि वो 30 साल से पार्टी के लिए काम कर रही हैं और जब मोदी हिमाचल के चुनाव इंचार्ज थे, तब भी उनके साथ काम किया था.

खुद शांता को मनाने पहुंचे थे जेपी नड्डा.
पालमपुर में भाजपा समर्थकों ने शांता कुमार के घर के बाहर भी इंदू गोस्वामी के नाम के लेकर खूब हंगामा किया था. इस को लेकर 18 अक्टूबर को जेपी नड्डा ने भी शांता कुमार से उनके घर में मीटिंग कर मामले को शांत करने की कोशिश की थी. जानकार ये भी बता रहे हैं कि इंदू की उम्मीदवारी को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए क्योंकि मोदी की तरफ से ये मुख्यमंत्री पद की दावेदार भी हो सकती हैं.
इंदू से पहले भाजपा की लिस्ट में सिर्फ एक ही महिला कैंडिडेट थी. कांगड़ा की शाहपुर सीट से सरवीन चौधरी इकलौती महिला थीं. मगर अब इंदौरा सीट से रीता धीमान, भोरंज से कमलेश कुमारी, रोहड़ू से शशि बाला, कसुम्पटी से विजय ज्योति के नाम भी इसमें शामिल हैं.
याद आ रहा है 1998 का चुनाव
यह महज एक संयोग नहीं है कि शांता के कैंडिडेट की जगह एक पैराशूट कैंडिडेट इंदू गोस्वामी को लाया गया है. ये मोदी और शांता के बीच की उस पुरानी प्रतिद्वंदता की भी निशानी है जब साल 1998 में नरेंद्र मोदी ने शांता कुमार की जगह प्रेम कुमार धूमल को मुख्यमंत्री पद के लिए प्रोजेक्ट कर दिया था. शांता कुमार ने अपनी पिछली टर्म में कई सख्त फैसले लिए थे जिसके चलते सरकारी कर्मचारी और अपर हिमाचल के सेब उत्पादक भाजपा के खिलाफ चले गए थे. भाजपा की छवि एंटी-ओल्ड हिमाचल की बन गई थी. इसी को तोड़ने के लिए मोदी ने धूमल को शांता की जगह आगे किया था. धूमल कभी शांता कुमार के राजनीतिक चेले रहे थे.
उसके बाद 2002 में गुजरात दंगों के दौरान शांता खुलकर मोदी के खिलाफ आए थे. तब शांता ने कहा था कि अगर मैं गुजरात का मुख्यमंत्री होता तो पद से त्यागपत्र दे देता. दोनों की पुरानी प्रतिद्वंदिता अलग-अलग मौकों पर सामने आती रही है.










