मैंने इससे पहले एक जगह पर इतने सारे पैसे नहीं देखे हैं.उस वक्त सुखराम के घर से 2.45 करोड़ रुपये बरामद हुए थे. इसके अलावा सीबीआई की एक टीम ने सुखराम के हिमाचल के मंडी स्थित बंगले पर भी छापेमारी की थी. टीम को वहां से 1.16 करोड़ रुपये मिले थे. पैसे दो संदूकों और 22 सूटकेस में रखे थे, जिनमें से अधिकांश सूटकेस पूजा वाले घर में रखे हुए थे. मामले में 27 अगस्त को सीबीआई ने आय से अधिक संपत्ति के मामले में सुखराम के खिलाफ नया केस दर्ज कर लिया. 19 नवंबर 2011 को टेलीकॉम घोटाले में सीबीआई की अदालत ने उन्हें पांच साल की सजा दी थी. उसी सुखराम का परिवार अब बीजेपी में शामिल हो गया है.
जिस मामले ने सुखराम को जेल भेजा, उसकी कहानी कुछ यूं है

सुखराम को मंडी इलाके में लोग पंडित सुखराम के नाम से बुलाते हैं. (फोटो: फेसबुक)
सुखराम पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में टेलीकॉम मिनिस्टर थे. उन्होंने अपने पद का इस्तेमाल करते हुए एक निजी फर्म को ठेका दे दिया और इसके बदले में तीन लाख रुपये की रिश्वत ली. इसके अलावा उन्होंने दूरसंचार विभाग को तार बेचने के लिए एक निजी कंपनी को ठेका दे दिया. ये निजी कंपनी थी हरियाणा टेलीकॉम लिमिटेड (एचटीएल), जिसे पॉलीथीन इन्सुलेटेड जेली फिल्ड (पीआईजेएफ) के 3.5 लाख कंडक्टर किलोमीटर (सीकेएम) केबल देने थे. इसकी कीमत 30 करोड़ रुपये थी. सीबीआई जांच हुई. इसके बाद कोर्ट ने पाया कि सुखराम ने दोनों ही मामलों में अपने पद का दुरुपयोग किया है और इसके एवज में पैसे खाए हैं. दिल्ली की अदालत ने 2011 में सुखराम को दोषी पाया और पांच साल की सजा दे दी. ये वही वक्त था, जब अन्ना हजारे जंतर मंजर पर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन कर रहे थे और पूरे देश की निगाह अन्ना के ऊपर लगी हुई थी.
सुखराम को जेल और भी मामलों में हुई

पूर्व केंद्रीय मंत्री को पांच साल की सजा हुई थी.
सुखराम को 2009 में आय से अधिक संपत्ति रखने का भी दोषी पाया गया था. उनके खिलाफ 4.25 करोड़ रुपये अवैध तरीके से कमाने के आरोप लगे थे. इसके अलावा 2002 में सुखराम को तीन साल की सजा हुई थी. सुखराम ने मंंत्री रहते हुए एक निजी कंपनी को सामान सप्लाई करने का ठेका दिया था, जिसकी वजह से सरकार को 1.66 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था. इसके अलावा उन्होंने हैदराबाद की कंपनी एडवांस रेडियो मास्ट्स को भी गलत तरीकों से फायदा पहुंचाया था.
अब है सक्रिय राजनीति से किनारा, बेटे और पोते कर रहे राजनीति

अनिल शर्मा (बाएं) वीरभद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री थे. आश्रय को भी बीजेपी ने टिकट का आश्वासन दिया है.
सुखराम भले ही राजनीतिक रूप से सक्रिय नहीं हैं, लेकिन उनके बेटे अनिल शर्मा और उनके पोते आश्रय शर्मा को पार्टी की ओर से टिकट का ऑफर मिला है. इसका दावा खुद अनिल शर्मा ने किया है. अनिल शर्मा मंडी सीट से तीन बार विधायक रहे हैं. कांग्रेस की सरकार में उन्हें दो बार मंत्री भी बनाया गया है. पहली बार उन्हें राज्य मंत्री बनाया गया था. वो 1993 से 1996 तक मंत्री थे, लेकिन टेलिकॉम घोटाले में सुखराम की गिरफ्तारी के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था. वीरभद्र सरकार में वो अब भी कैबिनेट मंत्री हैं. वो राज्यसभा के सांसद भी रह चुके हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्होंने कहा है कि वो और उनका परिवार कांग्रेस और उसके नेताओं का उत्पीड़न नहीं सह सकता है. हालांकि 7 तारीख को राहुल गांधी की रैली के बारे में उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर जो लिखा है, उसमें कांग्रेस और राहुल गांधी की शान में कसीदे पढ़े हैं.
फेसबुक पर किया बीजेपी जॉइन करने का ऐलान सुखराम के बेटे अनिल शर्मा ने बीजेपी जॉइन करने का ऐलान फेसबुक पर किया है. उन्होंने लिखा है इससे पहले वो हिमाचल में कांग्रेस की सरकार बनने का दावा करते थे और कांग्रेस के लिए वोट मांगते थे. इसका वीडियो उनके फेसबुक पेज पर भी है.
बीजेपी नेता अनुराग ठाकुर ने ट्वीट कर बीजेपी में उनका स्वागत किया है
सुखराम पहले भी कर चुके हैं बीजेपी की मदद
सुखराम और उनके बाद उनके बेटे अनिल शर्मा की वजह से मंडी इलाके में कांग्रेस का वर्चस्व रहा है. पंडित सुखराम ने 1962 में पहला विधानसभा चुनाव मंडी से लड़ा था और जीत गए थे. तब से 1984 तक वो मंडी से कांग्रेस के विधायक रहे. 1984 में वो लोकसभा के लिए निर्वाचित हो गए. 1993 में उनके बेटे अनिल शर्मा ने पिता की सीट से जीत हासिल की थी. इसी दौरान 1996 में उनका नाम दूर संचार घोटाले में उछला, जिसके बाद कांग्रेस ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया. सुखराम ने 1997 में अपनी पार्टी बना ली. नाम था हिमाचल विकास कांग्रेस. मुख्य दलों बीजेपी और कांग्रेस के साथ ही हिमाचल विकास कांग्रेस ने भी 1998 में विधानसभा का चुनाव लड़ा. बीजेपी को 31, कांग्रेस को 31 और हिमाचल विकास कांग्रेस को पांच सीटें मिलीं. पंडित सुखराम ने बीजेपी के साथ जाने का फैसला किया और मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बन गई. सरकार तो पूरे पांच साल तक चली, लेकिन उसके बाद 2004 में सुखराम ने कांग्रेस में अपनी पार्टी का विलय कर दिया. 2004 में सुखराम कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव जीत गए. 1998 में अनिल शर्मा राज्य सभा के लिए चुने गए थे. 2007 और 2012 में कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर मंडी सीट से जीत हासिल कर ली थी और इस बार की सरकार में कैबिनेट मंत्री थे.
वीरभद्र सिंह से रहा है 36 का आंकड़ा

सुशील शिंदे (बीच में) जब मंडी आए थे तो वीरभद्र (दाएं) और सुखराम के बीच आरोप-प्रत्यारोप लगे थे.
वीरभद्र सिंह और पंडित सुखराम हिमाचल की राजनीति की दो धुरी माने जाते हैं. भले ही उनकी पार्टी एक है, लेकिन वो हमेशा अलग-अलग किनारों पर खड़े दिखाई देते रहे हैं. 1996 में जब सुखराम के घर सीबीआई का छापा पड़ा था और करोड़ों रुपये बरामद हुए थे, तो उन्होंने कहा था कि इसमें उनकी ही पार्टी के नेताओं का हाथ है. उनका इशारा वीरभद्र सिंह की ओर था. बाद में पार्टी से किनारा करने के बाद जब वो दुबारा पार्टी में शामिल हुए तो वीरभद्र सिंह से मुलाकात कर गिले-शिकवे दूर करने की कोशिश की थी. 2014 के लोकसभा चुनाव में यह तल्खी और ज्यादा बढ़ गई थी. मंडी संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस की उम्मीदवार थीं प्रतिभा सिंह. मोदी लहर में वो चुनाव हार गईं. वीरभद्र सिंह ने इस हार की वजह ब्राह्मणवाद को बताया था और इसके लिए सीधे तौर पर तो नहीं, लेकिन सुखराम पर हमला किया था. इसके अलावा अभी इसी महीने जब कांग्रेस के हिमाचल प्रभारी सुशील कुमार शिंदे मंडी पहुंचे थे, तो इस कार्यक्रम में सुखराम भी शामिल हुए थे. इस दौरान वीरभद्र सिंह से उनकी नोकझोंक हुई थी.
राहुल की रैली का किया था विरोध

7 अक्टूबर की रैली में सुखराम को नहीं बुलाया गया था, जिससे वो नाराज थे.
7 अक्टूबर को हिमाचल के मंडी में राहुल गांधी की सभा थी. सभा पड्डल मैदान में होनी थी. सुखराम के बेटे और कैबिनेट मंत्री अनिल शर्मा ने राहुल गांधी की इस रैली पर ऐतराज जताया. उनका ऐतराज रैली पर नहीं, रैली के मैदान पर था. उन्होंने कहा था कि इस मैदान पर रैली करने से मैदान को नुकसान पहुंच सकता है. इसके अलावा 7 अक्टूबर की राहुल गांधी की रैली में पंडित सुखराम को बुलाया भी नहीं गया था, जिससे वो नाराज थे. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सुखराम दिल्ली में थे, लेकिन राहुल की रैली में शामिल होने के लिए वो 6 अक्टूबर को ही मंडी पहुंच गए थे. इसके बाद भी सुखराम को रैली में नहीं बुलाया गया.
...तो सलमान खान भी हिमाचल में मांगेंगे बीजेपी के लिए वोट

फिल्म अभिनेता सलमान खान की बहन की शादी सुखराम के परिवार में हुई है.
जी. सलमान खान ऐसा कर सकते हैं. इसकी सॉलिड वजह भी है. सुखराम के पोते आश्रय शर्मा को बीजेपी ने टिकट देने का आश्वासन दिया है. आश्रय शर्मा, आयुष शर्मा के बड़े भाई हैं. आयुष शर्मा की पत्नी का नाम है अर्पिता, जो सलमान खान की बहन है. आयुष और अर्पिता ने 2014 में शादी की थी. इस नाते सलमान खान आश्रय शर्मा के साले हुए. अब चुनाव है, तो साले का फर्ज बनता है कि वो अपने बहनोई की मदद करे. सलमान के बारे में लोग कहते भी हैं कि वो लोगों की मदद करते हैं. ऐसे में अपने बहनोई के लिए सलमान चुनाव प्रचार करते नजर आएं, तो कोई हैरानी नहीं होगी.
देखिए लल्लनटॉप बुलेटिन
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