FIFA World Cup 2026 का सबसे चर्चित शब्द है ‘रिग्ड’. माने जो पहले से तय कर दिया गया हो. सोशल मीडिया पर अहम मुकाबलों के बाद ये शब्द ट्रेंड में आ ही जाता है. चाहे अर्जेंटीना बनाम इजिप्ट का मुकाबला हो या पुर्तगाल बनाम क्रोएशिया. पूरा इंटरनेट वीडियो सबूतों से पटा पड़ा है.
FIFA 2026: इतिहास का सबसे ज्यादा 'बेईमान' फुटबॉल वर्ल्ड कप?
FIFA World Cup 2026 : क्या इस वर्ल्ड कप में पहले से सब तय है कि कौन सी टीम आगे जाएगी? इंटरनेट पर तमाम ऐसे नैरेटिव्स पिछले कुछ दिनों से दिख रहे हैं. ऐसे में दर्शकों के मन में ये सवाल आ रहा है कि क्या इस वर्ल्ड कप में बेईमानी चल रही है?


दावे ये कि फीफा मेसी और रोनाल्डो को वर्ल्ड कप जिताना चाहता है. आरोप ये कि इजिप्ट के साथ बेईमानी हुई, लुका मोड्रिच का सपना तोड़ दिया गया. चर्चा तो सेनेगल बनाम बेल्जियम वाले मैच की भी कम नहीं हुई थी. आरोप ये भी लगे कि फीफा अफ्रीकी देशों को जीतता नहीं देख सकता.
लेकिन, इस पूरे नैरेटिव को बल कहां से मिला? क्या सचमुच FIFA World Cup 2026 सबसे बेईमान वर्ल्ड कप है? या ये सिर्फ एक प्रोपेगेंडा है. दरअसल, इस पूरे नैरेटिव को बल मिला उन चंद इंसिडेंट्स से, जहां साफ तौर पर फीफा ने सही को सही और गलत को गलत नहीं ठहराया.
सबसे पहला केस ईरान का था. एशियन क्वालिफायर ईरान के सारे ग्रुप मैच अमेरिका में थे. लेकिन, अमेरिका को मनाने की जगह फीफा ने टीम को मेक्सिको शिफ्ट करने का विकल्प चुना. ईरान का बेस मेक्सिको के तिजुआना में रखा गया. उन्हें मैच से महज 24 घंटे पहले अमेरिका में एंट्री मिलती. मैच के बाद तुरंत वापस उड़ान भड़नी पड़ती.
हद तो तब हो गई, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फोन कॉल पर फ्लोरियन बालोगुन का रेड कार्ड वापस ले लिया गया. राउंड ऑफ 32 के मुकाबले में बोस्निया एंड हर्जेगोविना के मैच के दौरान फ्लोरियन बालोगुन को तारिक मुहरेमोविच के टखने पर पैर रखने के लिए रेड कार्ड दे दिया गया था. मैच रेफरी ने VAR से देखने के बाद ये कड़ा फैसला किया. नियम के मुताबिक, रेड कार्ड धारक प्लेयर अगले मैच में बैन होता है. यानी राउंड ऑफ 16 में बेल्जियम के खिलाफ मैच में वो नहीं खेल सकते थे.
लेकिन, फीफा प्रेजिडेंट जियानी इन्फैंटिनो ने अमेरिकी राष्ट्रपति के फोन कॉल पर रेफरी के फैसले को ओवरटर्न कर दिया. नतीजा, बेल्जियम के खिलाफ मुकाबले में वो खेले. हालांकि, इसके बावजूद अमेरिकी टीम ये मुकाबला नहीं जीत सकी. बेल्जियम ने ये मैच एकतरफा अंदाज में 4-1 से जीत लिया. लेकिन, इस एक फैसले ने फीफा की इंटेग्रिटी पर सवाल खड़े कर दिए.
यहीं से हर बड़े मैच के बाद ये नैरेटिव फैलाने वालों को बल मिल गया कि फीफा मैच ‘रिग्ड’ कर रहा है. हालांकि, किसी मैच में कोई गड़बड़ी हुई, इसकी पुष्टि कभी नहीं हो सकी. अब एक-एक कर उन मैचों पर भी बात कर लेते हैं, जिन्हें लेकर ये पूरा नैरेटिव गढ़ा गया.
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# अर्जेंटीना vs इजिप्टये फीफा वर्ल्ड कप का सबसे चर्चित मैच बन गया. कारण कि मेसी की वर्ल्ड चैंपियन टीम 78 मिनट तक 0-2 से पिछड़ रही थी. लेकिन, अंतिम 13 मिनट में गेम ने ऐसी करवट ली. स्कोर अर्जेंटीना 3 इजिप्ट 2 के साथ खत्म हुआ. इजिप्ट के प्लेयर्स से लेकर कोच तक कोई इस हार को पचा नहीं सके. फीफा तक को इजिप्ट फुटबॉल एसोसिएशन ने रेफरी के खिलाफ कंप्लेन कर दी. नतीजा, चीफ रेफरी पियरलुइगी कोलीना को फटकार लगानी पड़ी कि रेफरी पर बेबुनियाद आरोप लगाना बर्दाश्त नहीं करेंगे.
अब आते हैं ये पूरा विवाद हुआ क्यों? इजिप्ट 0-1 से आगे चल रही था. फिर इजिप्ट ने दूसरा गोल दाग दिया. लेकिन, VAR चेक के बाद रेफरी ने लिसांद्रो मार्टिनेज पर हुए फाउल को कंसिडर किया और गोल खारिज कर दिया. इजिप्ट ने इसके बाद फिर से एक गोल किया और 0-2 की बढ़त बना ली. अर्जेंटीना ने इसके बाद दो गोल किए. यहां तक सब ठीक था. मैच अब बराबरी पर पहुंच गया था. 90+2वें मिनट में अर्जेंटीना ने तीसरा गोल किया.
इस गोल में रेफरी ने VAR चेक नहीं किया. बाद में वीडियोज आए कि मो सालाह पर लिसांंद्रो जैसा ही फाउल कमिट किया गया था. ऐसे में यहां इजिप्ट को पेनल्टी मिलनी चाहिए थी और अर्जेंटीना को गोल मिल गया. लेकिन, मूवमेंट के दौरान ये साफ नज़र आया कि अल्वारेज ने सालाह से पहले ही बॉल छीन ली थी. ऐसे में जब उनका पैर सालाह के पैर से टकराया तब बॉल पोजेशन अल्वारेज के पास ही थी. ऐसे में इसे फाउल कंसिडर करना गलत होता. लेकिन, कई लोगों का मानना था कि इस दौरान दूसरी तरफ मैक एलिस्टर ने इजिप्शियन प्लेयर का शर्ट पुुल किया था. ऐसे में दोबारा VAR चेक करना चाहिए था. इसे लेकर ये कहा गया कि इससे गोल के मूव पर सीधा असर नहीं पड़ा. ऐसे में ये चेक होता भी तो रेफरी गोल को जरूर कंसिडर करते.
#पुर्तगाल बनाम क्रोएशियाराउंड ऑफ 32 में क्रोएशिया और पुर्तगाल वाला मैच भी खूब विवाद में रहा था. कारण था स्टॉपेज टाइम के अंतिम मिनट में आया क्रोएशिया के ग्वार्डियोल का इक्वालाइजर. इस गोल को भी VAR चेक के बाद खारिज कर दिया गया था. क्रोएशियाई दिग्गज लुका मोड्रिच समेत कई क्रोएशियाई प्लेयर्स ने इस फैसले पर सवाल उठाए थे.
दरअसल, इस पूरे विवाद का कारण थी बॉल सेंसर टेक्नोलॉजी. VAR के दौरान स्निकोमीटर से ये पता लगा था कि क्रोएशियन स्ट्राइकर इगोर मटानोविच के बालों को छूते हए बॉल आगे गई थी. उस वक्त मारियो पसालिच ऑफसाइड पोजिशन में थे. इसलिए बीच में आया पुर्तगाल के डिफेंडर का टच एक्सीडेंटल माना गया. हालांकि, इंटरनेट पर बहस इस बात पर छिड़ी थी कि स्निको में सिर्फ एक स्पाइक क्यों नज़र आया जब इतने टचेज हुए थे. बहरहाल, टेक्नोलॉजी की बहस अलग है. लेकिन, इसे वजह बताकर पुर्तगाल की जीत को खारिज करना भी सही नहीं होता.
#बेल्जियम बनाम सेनेगलबेल्जियम और सेनेगल के बीच राउंड ऑफ 32 का मुकाबला भी थ्रिलर था. 85वें मिनट तक बेल्जियम की टीम 0-2 से पिछड़ रही थी. लेकिन, इसके बाद रोमेलू लुकाकू और यूरी टील्समैन ने 86वें और 89वें मिनट में गोल दागकर मैच में वापसी कर ली. लेकिन, असली विवाद एक्सट्रा टाइम में मिले पेनल्टी को लेकर हुआ.
सेनेगल के प्लेयर्स का मानना था कि ये पेनल्टी नहीं थी. उन्होंने शुरू में विरोध भी किया. लगभग 7 मिनट तक VAR चेक किया गया. अंत में फैसला बेल्जियम के पक्ष में गया. यूरी टील्समैन ने पेनल्टी से गोल कर दिया. इसे लेकर भी पूरा इंटरनेट बंटा दिखा कि 7 मिनट चेक करने में लग गए. ऐसे में फैसला विवादास्पद ही लगता है.
रेफरी के फैसलों को लेकर सवाल पहले भी उठे हैं. लेकिन, बिना किसी प्रूव सिर्फ आरोप लगाना भी गलत है. सोशल मीडिया के दौर में ये भ्रम पैदा करना बहुत आसान है कि हर तरफ कॉन्सपिरेसी चल रही है. अब इसमें कितना सच है? कितना झूठ? ये स्वविवेक का सवाल है. जब तक फैसले नियमों के भीतर लिए जा रहे हैं, ये कहना गलत होगा कि पूरा टूर्नामेंट ही रिग्ड है. अब इस वर्ल्ड कप में महज 7 मैच बचे हैं. ऐसे में बेहतर यही है कि हम उसे एन्जॉय करें क्योंकि फिर ये वर्ल्ड कप 4 साल बाद ही आएगा.
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