हर मां-बाप का एक सपना होता है. बच्चा अच्छी पढ़ाई करे, एक बड़ी डिग्री हासिल करे और जिंदगी में वो मुकाम पाए जहां नौकरी के लिए उसे दर-दर भटकना न पड़े. इसी सपने को पूरा करने के लिए देश के लाखों परिवार अपनी सालों की बचत, कर्ज और कमाई का बड़ा हिस्सा बच्चों की हायर एजुकेशन पर लगा रहे हैं.
चमकदार कैंपस, महंगी फीस और नौकरी का सवाल... क्या प्राइवेट यूनिवर्सिटीज छात्रों को दे रही हैं सही भविष्य?
Private Universities in India: क्या प्राइवेट यूनिवर्सिटी की महंगी डिग्री सच में दिलाती है बेहतर करियर? फीस, प्लेसमेंट, NAAC ग्रेडिंग और एजुकेशन क्वालिटी किसकी ज्यादा अच्छी है- सरकारी या प्राइवेट यूनिवर्सिटी. जानिए कैसे चुनें सही यूनिवर्सिटी और दाखिले से पहले किन बातों का रखें ध्यान.


लेकिन पिछले कुछ वर्षों में भारत की शिक्षा व्यवस्था का नक्शा तेजी से बदला है. कभी जहां सरकारी कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज में दाखिले के लिए लंबी कतारें लगती थीं, वहीं अब एक नई दुनिया तेजी से फैल रही है. ये दुनिया है प्राइवेट यूनिवर्सिटीज की, जहां चमचमाते कैंपस, इंटरनेशनल सुविधाओं के दावे और बेहतर करियर के सपने दिखाए जाते हैं.
इंडिया टुडे के मुताबिक भारत में प्राइवेट यूनिवर्सिटीज की संख्या में पिछले एक दशक में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि साल 2014-15 के मुकाबले आज देश में प्राइवेट यूनिवर्सिटीज की संख्या कई गुना बढ़ चुकी है. शिक्षा मंत्रालय की ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान प्राइवेट यूनिवर्सिटीज में करीब 149 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है और इनकी संख्या 450 के आंकड़े को पार कर चुकी है.
लेकिन इस बढ़ते बाजार के साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया है. क्या भारत में प्राइवेट यूनिवर्सिटीज का विस्तार वाकई शिक्षा को ज्यादा लोगों तक पहुंचाने की क्रांति है या फिर ये एक ऐसा कारोबार बनता जा रहा है, जहां मोटी फीस के बदले सिर्फ डिग्री का भरोसा बेचा जा रहा है?
क्योंकि असली परीक्षा कैंपस की ऊंची इमारतों, शानदार विज्ञापनों और बड़े-बड़े दावों की नहीं, बल्कि उस वक्त होती है जब छात्र डिग्री लेकर नौकरी के बाजार में उतरता है. सवाल यही है कि क्या ये प्राइवेट यूनिवर्सिटीज युवाओं को सच में रोजगार के लिए तैयार कर रही हैं या फिर लाखों परिवारों की उम्मीदों के साथ एक महंगा समझौता हो रहा है?
गुजरात सबसे आगे तो क्या यूपी-बिहार यहां भी पीछे
AISHE की रिपोर्ट के आंकड़ों को अगर करीब से देखें तो भारत में प्राइवेट यूनिवर्सिटीज के विस्तार की एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है. देश के कुछ राज्य इस दौड़ में तेजी से आगे निकल गए हैं. गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों में पिछले कुछ वर्षों में प्राइवेट यूनिवर्सिटीज की संख्या में तेज उछाल देखने को मिला है. खासकर गुजरात में जिस रफ्तार से नई प्राइवेट यूनिवर्सिटीज को मंजूरी मिली है, उसने देश की हायर एजुकेशन पॉलिसी पर बहस छेड़ दी है.
लेकिन दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े आबादी वाले राज्यों की कहानी थोड़ी अलग है. यहां छात्रों की संख्या करोड़ों में है, लेकिन सरकारी यूनिवर्सिटीज और कॉलेजों पर पहले से ही भारी दबाव है. प्राइवेट यूनिवर्सिटीज ने इस खाली जगह को भरने की कोशिश जरूर की है, लेकिन बड़ा सवाल अब भी वही है कि क्या ये संस्थान छात्रों को बेहतर शिक्षा और रोजगार दे पा रहे हैं या सिर्फ डिग्री का विकल्प बढ़ा रहे हैं.
गुजरात में प्राइवेट यूनिवर्सिटीज के मॉडल को राज्य के इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम से जोड़कर देखा जाता है. कई जगहों पर इंडस्ट्री और एकेडमिक्स के बीच तालमेल बनाने की कोशिश हुई है, जिससे छात्रों को नए अवसर मिलने की उम्मीद बढ़ती है. लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में चुनौती अलग है. यहां बड़ी संख्या में छात्र उच्च शिक्षा के लिए निजी संस्थानों का रुख तो कर रहे हैं, लेकिन फीस और क्वालिटी एजुकेशन के बीच का अंतर उन्हें मुश्किल स्थिति में डाल देता है.
एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए ये फैसला आसान नहीं होता. लाखों रुपये की फीस देकर जब कोई छात्र किसी प्राइवेट यूनिवर्सिटी में दाखिला लेता है, तो उसके मन में सिर्फ एक उम्मीद होती है कि डिग्री के बाद उसे एक अच्छी नौकरी मिलेगी. लेकिन अगर चमकदार कैंपस के पीछे मजबूत फैकल्टी, बेहतर रिसर्च और भरोसेमंद प्लेसमेंट सिस्टम नहीं है, तो ये सपना अधूरा रह सकता है.
क्या पैसा देकर डिग्री मिल रही है?
प्राइवेट यूनिवर्सिटीज की सबसे बड़ी ताकत उनका चमकदार प्लेसमेंट ब्रोशर होता है. बड़े-बड़े पैकेज, मल्टीनेशनल कंपनियों के नाम और शानदार कैंपस प्लेसमेंट के आंकड़े छात्रों और अभिभावकों को आकर्षित करते हैं. लेकिन असली सवाल ये है कि क्या ये आंकड़े पूरी तस्वीर दिखाते हैं या फिर इनके पीछे कुछ अनकही कहानियां भी छिपी होती हैं?
कई बार कंपनियां कैंपस में जरूर पहुंचती हैं, लेकिन उनका फोकस सिर्फ चुनिंदा और पहले से बेहतर प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर होता है. बाकी बड़ी संख्या में छात्रों को ऐसे ऑफर मिलते हैं, जो उनकी उम्मीदों से काफी कम होते हैं. कई मामलों में ग्रेजुएट छात्रों को सेल्स, सपोर्ट या बीपीओ जैसी नौकरियों से शुरुआत करनी पड़ती है, जबकि उन्होंने लाखों रुपये खर्च करके एक बेहतर करियर की उम्मीद की होती है.
यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है 'रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट' यानी ROI का. क्या प्राइवेट यूनिवर्सिटी की भारी फीस वास्तव में उस करियर ग्रोथ में बदल रही है, जिसका सपना दिखाया जाता है? क्योंकि एक तरफ कई सरकारी यूनिवर्सिटीज में सालाना फीस कुछ हजार रुपये में पूरी हो जाती है, वहीं दूसरी तरफ प्राइवेट यूनिवर्सिटीज में यही खर्च कई कोर्सों के लिए 2 से 5 लाख रुपये सालाना या उससे भी ज्यादा पहुंच जाता है.
इसलिए किसी भी प्राइवेट यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने से पहले सिर्फ कैंपस की चमक या विज्ञापनों से प्रभावित होना काफी नहीं है. फैकल्टी, कोर्स की गुणवत्ता, पिछले वर्षों का प्लेसमेंट रिकॉर्ड, औसत पैकेज और फीस के मुकाबले मिलने वाले अवसरों को समझना जरूरी है.
नीचे दिए गए तुलनात्मक चार्ट के जरिए समझिए कि सरकारी और प्राइवेट यूनिवर्सिटी के बीच फैसला लेते समय किन अहम बातों पर ध्यान देना चाहिए.
| पैरामीटर | सरकारी यूनिवर्सिटी | प्राइवेट यूनिवर्सिटी |
| फीस | बहुत कम | बहुत ज्यादा |
| इंफ्रास्ट्रक्चर | पुराना/औसत | आधुनिक/हाईटेक |
| प्लेसमेंट | औसत (प्रतिभा पर निर्भर) | छलावा (मार्केटिंग ज्यादा) |
| फैकल्टी | अनुभवी (NET/PhD) | अक्सर फ्रेशर्स |
| डिग्री की वैल्यू | बहुत ज्यादा | केवल कॉर्पोरेट सेक्टर में |
[सोर्स: यूजीसी (UGC) गाइडलाइन्स और विभिन्न संस्थानों के एनआईआरएफ (NIRF) रैंकिंग]
युवाओं और अभिभावकों के लिए निवेश का मंत्र
आखिर में फैसला माता-पिता को करना है, लेकिन सिर्फ बड़े कैंपस, चमकदार इमारतों और विज्ञापनों से प्रभावित होकर नहीं. आज के दौर में किसी भी यूनिवर्सिटी की असली पहचान उसके एलुमनाई नेटवर्क, छात्रों की सफलता और इंडस्ट्री में उसकी साख से होती है. दाखिला लेने से पहले ये जरूर देखिए कि वहां से पढ़कर निकले छात्र कहां पहुंचे हैं? क्या वो अच्छी कंपनियों में काम कर रहे हैं? क्या उनके अनुभव और करियर की कहानी उस यूनिवर्सिटी के दावों से मेल खाती है?
अगर कोई संस्थान सिर्फ एसी क्लासरूम, आलीशान कैंपस, विदेशी टाई-अप और आधुनिक सुविधाओं को अपनी सबसे बड़ी ताकत बता रहा है, लेकिन फैकल्टी, रिसर्च, स्किल डेवलपमेंट और प्लेसमेंट पर ठोस जानकारी नहीं दे रहा, तो सावधान रहने की जरूरत है. क्योंकि डिग्री मिलना आसान हो सकता है, लेकिन उस डिग्री को करियर में बदलने के लिए असली हुनर जरूरी है.
शिक्षा में निवेश का मतलब सिर्फ लाखों रुपये की फीस जमा करना नहीं है. असली निवेश उस संस्थान को चुनना है, जो बच्चे की सोच, क्षमता और भविष्य को बेहतर दिशा दे सके. इसलिए प्राइवेट यूनिवर्सिटी चुनते वक्त उसकी मान्यता, एनएएसी (NAAC) ग्रेडिंग, फैकल्टी की गुणवत्ता, प्लेसमेंट रिकॉर्ड और इंडस्ट्री कनेक्शन जैसे पहलुओं की अच्छी तरह जांच करें.
क्योंकि आने वाले समय में सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि स्किल और काबिलियत ही तय करेगी कि कोई छात्र नौकरी की भीड़ में आगे निकल पाएगा या नहीं. सही यूनिवर्सिटी वही है, जो सिर्फ डिग्री नहीं देती, बल्कि एक बेहतर भविष्य की नींव तैयार करती है.
ये भी पढ़ें: US वीजा जांच: कॉग्निजेंट के बहाने क्या फिर खतरे में है भारतीयों का 'अमेरिकन ड्रीम'?
वीडियो: Ground Report: UGC गाइडलाइन्स पर बवाल के बीच जातिगत भेदभाव पर क्या बोले इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के छात्र?










