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क्या है VVPAT मशीन, जो 9 नवंबर को हिमाचल प्रदेश के हर पोलिंग बूथ पर होगी

चुनाव आयोग के लिए VVPAT फिक्सिंग के इल्ज़ाम की काट बन सकती है.

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VVPAT मशीन को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के साथ जोड़ा जाता है. फाइल फोटो.
चुनाव में हार जीत लगी रहती है. कभी पिछली बार के विजेताओं की ज़मानत ज़ब्त हो जाती है. कभी पहली बार का प्रत्याशी रिकॉर्ड लीड से जीत जाता है. इसलिए जीत के जुनून के साथ हार को स्वीकारने लायक ज़िम्मेदारी भी जरूरी है. लेकिन कई बार चुनाव में कैंडिडेट समझदारी नहीं दिखा पाते, अड़ जाते हैं. इसीलिए चुनाव आयोग हिमाचल प्रदेश चुनाव में सभी पोलिंग स्टेशन्स पर वोटर वेरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPAT) लगवा रहा है. ताकि हर वोट की रसीद निकले, और लोगों का ‘शुबहा’ दूर हो. हिमाचल प्रदेश दूसरा ऐसा राज्य होगा जहां किसी विधासभा चुनाव में सभी सीटों पर VVPAT मशीनों का इस्तेमाल होगा.
क्या है VVPAT?
जब से चुनावों में बैलेट पेपर की जगह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) का इस्तेमाल शुरू हुआ है, तब से ही कई लोग EVM पर सवाल उठाते रहे हैं. बैलेट पेपर पर ठप्पा मारने के बाद साफ नज़र आता था कि वोट किसे पड़ा, लेकिन EVM में सारा काम भरोसे का था, कि मशीन सही ही काम कर रही होगी. लेकिन जब गलाकाट स्पर्धा की बात आती है, तो कोई खाली भरोसे से काम नहीं चलाना चाहता.
बीते समय में भारत में चुनाव बैलेट पेपर के ज़रिए होते थे
बीते समय में भारत में चुनाव बैलेट पेपर के ज़रिए होते थे (फोटो ACE electoral knowledge)

कई लोग राजनैतिक दल इसे लेकर कोई रास्ता निकालने के लिए चुनाव आयोग पर ज़ोर डालते रहे हैं. तो चुनाव आयोग VVPAT लेकर आया. VVPAT को खींच कर लंबा करने से अंग्रेज़ी का 'Voter-verified paper audit trail' बनता है. ये मशीन इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के साथ ही जुड़ी होती है. इससे हर वोट की एक रसीद निकलती है, जिसे वोटर देख कर तसल्ली कर सकता है कि उसने जिस कैंडिडेट के नाम के आगे का बटन दबाया, वोट उसे ही पड़ा.
लेकिन ये पर्ची वोटर घर नहीं ले जा सकता. इसे चुनाव आयोग अपने पास जमा कर के रखता है. इसका फायदा ये है कि वोटों की गिनती के दौरान अगर विवाद हो जाए, तो इन रसीदों को गिनकर फैसला किया जा सकता है.
VVPAT का पहला इस्तेमाल 2013 में नागालैंड की नोकसेन सीट पर हुए उपचुनाव में हुआ था. इसके बाद कई छोटे चुनावों में VVPAT का इस्तेमाल किया गया. फरवरी 2017 में गोआ पहला ऐसा राज्य बना जिसमें विधानसभा चुनाव के दौरान सभी सीटों पर VVPAT का इस्तेमाल किया गया. हालांकि चुनाव आयोग ने साफ किया था कि वो गोआ में VVPAT की पर्चियों को गिनती के दौरान इस्तेमाल नहीं करेगा.
EVM से पोलिंग पर लोग समय-समय पर तकनीकी खराबी या बेईमानी का इल्ज़ाम लगाते रहे हैं
EVM से पोलिंग पर लोग समय-समय पर तकनीकी खराबी या बेईमानी का इल्ज़ाम लगाते रहे हैं

2019 आम चुनाव में हर बूथ पर होगी VVPAT
2013 में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से हर बूथ पर VVPAT की व्यवस्था करने को कहा था. सुप्रीम कोर्ट में आयोग के खिलाफ इसी मामले को लेकर अवमानना की सुनवाई चल भी रही है. चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि वो 2019 के आम चुनावों में VVPAT मशीन लगवाएगा. फिलहाल इतनी VVPAT मशीनें नहीं हैं कि पूरे देश के लिए पूरी पड़ें. इसलिए आयोग चाहता है कि 2019 में होने वाले आम चुनावों से पहले इतनी VVPAT मशीनों के लिए ऑडर जारी हों और उनका प्रोडक्शन हो जाए. अक्टूबर 2016 में मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम ज़ैदी सीधे प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिख कर इस ओर ध्यान देने के लिए कह चुके हैं.
कहां बनावाई जाती हैं VVPAT?
VVPAT और ईवीएम संवेदनशील मशीनें हैं. इसलिए इन्हें बनाने का काम सिर्फ सरकारी कम्पनियां ही करती हैं – भारत इलेक्ट्रिकल लिमिटेड (बीईएल) और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (इसीआईएल). लेकिन सभी कंपनियों की तरह इनकी भी एक तय क्षमता है. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, इसीलिए जुलाई 2016 में सरकार ने इस दिशा में सोच-विचार किया था कि क्यों न वीवीपीएटी प्राइवेट कंपनियों से बनवा ली जाएं. लेकिन चुनाव आयोग ने इनकार कर दिया. कहा कि ये काम निजी कंपनियों के हाथ में न दिया जाए. आयोग ने कहा था कि ज़रूरत पड़ने पर इंडियन टेलिकॉम इंडस्ट्री (बेंगलुरु) और सेंट्रल इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (ग़ाज़ियाबाद) की मदद ली जाए. ये दोनों सरकारी कंपनियां हैं.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद चुनाव आयोग 2019 के आमचुनाव में हर बूथ पर VVPAT लगाने की तैयारी कर रहा है
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद चुनाव आयोग 2019 के आमचुनाव में हर बूथ पर VVPAT लगाने की तैयारी कर रहा है
मार्च 2017 में चुनाव आयोग के पास तकरीबन 20,000 मशीनें थीं. इसके अलावा 67,000 मशीनों का ऑर्डर दिया गया है जिनकी डिलीवरी चल रही है. लेकिन 2019 में होने वाले चुनावों के लिए 16,15,066 वीवीपीएटी मशीनों की ज़रूरत है. इसीलिए यहां फुर्ती से काम करने की ज़रूरत है.
जब VVPAT को ही लपेट लिया गया
1 अप्रैल, 2017 को आईं कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि मध्य प्रदेश के भिंड में ईवीएम का कोई भी बटन दबाने पर वीवीपीएटी मशीन से कमल के निशान वाली पर्ची ही निकल रही है. मध्यप्रदेश में भिंड की अटेर सीट पर विधान सभा के लिए उपचुनाव होने थे. मध्य प्रदेश में नेता प्रतिपक्ष रहे कांग्रेस नेता सत्यदेव कटारे के निधन से ये सीट खाली हुई थी. इस सीट पर होने वाले चुनावों में हर ईवीएम के साथ वीवीपीएटी सेट का इस्तेमाल होना था. इसी से जुड़ी जानकारी देने के लिए 31 मार्च, 2017 को भिंड के ज़िला पंचायत ऑफिस में चुनाव आयोग ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी. इसमें वीवीपीएटी का डेमो हुआ. ईवीएम का बटन दबाया शालिनी सिंह ने, जो मध्य प्रदेश की मुख्य निर्वाचन अधिकारी थीं. वीवीपीएटी से जो पर्ची निकली उस पर सत्यदेव पचौरी नाम के साथ कमल का निशान बना हुआ था.
भिंड में इस पर्ची के आधार पर VVPAT मशीन में खामी के आरोप लगे थे
भिंड में इस पर्ची के आधार पर VVPAT मशीन में खामी के आरोप लगे थे

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में इस भाषा में खबर लिखी गई कि इसके बाद बटन दबाने पर भी भाजपा के निशान वाली पर्ची ही निकली. जबकी बाद में कांग्रेस के निशान की पर्ची भी निकली थी. आरोप लगने के बाद चुनाव आयोद ने जांच बैठा दी थी. बाद में साफ हुआ था कि ये गलत ढंग से रिपोर्टिंग का मामला था और VVPAT मशीन में कोई गड़बड़ नहीं थी.
पटेल आंदोलन में भी VVPAT की मांग उठी थी
गुजरात हाई कोर्ट में पाटीदार आरक्षण आंदोलन से जुड़े लोगों ने एक याचिका लगाई है, जिसमें मांग की गई है कि राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों में या तो वीवीपीएटी मशीनें लगाई जाएं या फिर बैलेट पेपर का इस्तेमाल हो. इस मांग को निराधार कहकर खारिज किया जा सकता है. लेकिन ये इस ओर भी इशारा करता है कि वीवीपीएटी को लेकर वे लोग भी आश्वस्त हैं जो आमतौर पर सिस्टम के खिलाफ राय रखते हैं.
पाटीदार आंदोलन के दौरान गुजरात के आगामी चुनावों में VVPAT के इस्तेमाल की मांग उठी थी
पाटीदार आंदोलन के दौरान गुजरात के आगामी चुनावों में VVPAT के इस्तेमाल की मांग उठी थी

चुनाव आयोग की नीयत पर शक करने वालों का आरोप है कि चुनाव आयोग और केंद्र मिले हुए हैं. इसलिए एक खास पार्टी चुनाव जीत रही है. ऐसे में हर बूथ पर वीवीपीएटी का इंतज़ाम चुनाव आयोग के साथ-साथ केंद्र की छवि के लिए भी बहुत ज़रूरी है. एक निष्पक्ष चुनाव जिसके नतीजे हारने वाला पक्ष भी स्वीकार करे, एक सेहतमंद लोकतंत्र की पहली ज़रूरत है.



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