अमेरिका का सरकारी कर्ज पहली बार 40 ट्रिलियन डॉलर (करीब 3,824 लाख करोड़ रुपये) के पार पहुंच गया है. दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था पर चढ़ा ये कर्ज अब सिर्फ एक बड़ा आंकड़ा नहीं, बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था के सामने खड़े बढ़ते राजकोषीय दबाव की कहानी भी बता रहा है. 19 अगस्त 2026 को अमेरिकी संघीय कर्ज ने ये रिकॉर्ड बनाया, वो भी ऐसे वक्त में जब सरकार लगातार भारी बजट घाटे और बढ़ते ब्याज खर्च से जूझ रही है. अमेरिकी ट्रेजरी कुल सरकारी कर्ज को रोजाना ट्रैक करता है. इसमें जनता के पास मौजूद कर्ज के साथ सरकार के अंदरूनी खातों की देनदारी भी शामिल होती है.
ट्रंप ने अमेरिका को कर्ज में डुबाया, ₹3824 लाख करोड़ के पार देनदारी, उधारी मांगना फिर भी जारी
US debt under Donald Trump: अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज पहली बार 40 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच गया है. भारतीय मुद्रा में बात करें तो करीब 3,824 लाख करोड़ रुपये. अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो दुनिया की ये सबसे बड़ी महाशक्ति अपने ऑल टाइम रिकॉर्ड लोन में डूबी है. बावजूद इसके नई उधारी लेने का सिलसिला जारी है. तो क्या Donald Trump का देश आर्थिक बदहाली की तरफ बढ़ रहा है?

न्यूयॉर्क टाइम्स ने 40 ट्रिलियन डॉलर के इस पड़ाव को अमेरिका की लगातार जारी ‘borrowing binge’ यानी उधारी की होड़ के बीच एक चिंताजनक खबर बताया है. रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप प्रशासन के वित्तीय अनुशासन और सरकारी कर्ज का बोझ घटाने के दावों के बावजूद टैक्स कटौती, सैन्य खर्च और दूसरी राजकोषीय जरूरतों ने अमेरिकी सरकार की उधारी पर दबाव बनाए रखा है. अब सवाल सिर्फ ये नहीं है कि अमेरिका पर कितना कर्ज है, बल्कि ये है कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था इस कर्ज को कितने समय तक और किस कीमत पर संभाल सकती है.
सवाल सिर्फ 40 ट्रिलियन डॉलर का नहीं है
कर्ज का कोई एक जादुई आंकड़ा ऐसा नहीं होता, जिसे पार करते ही देश की अर्थव्यवस्था खराब घोषित कर दी जाए. असली सवाल है कि कर्ज अर्थव्यवस्था के आकार की तुलना में कितना है, सरकार हर साल कितना नया कर्ज ले रही है और उस कर्ज पर ब्याज चुकाने में कितनी कमाई चली जा रही है.
अमेरिका के मामले में तस्वीर इसलिए गंभीर है क्योंकि समस्या सिर्फ कुल कर्ज की नहीं, लगातार बड़े बजट घाटे की भी है. अमेरिकी Congressional Budget Office यानी CBO के फरवरी 2026 के अनुमान के मुताबिक वित्त वर्ष 2026 में अमेरिका का बजट घाटा करीब 1.9 ट्रिलियन डॉलर (करीब 182 लाख करोड़ रुपये) रह सकता है. यानी सरकार जितना खर्च करेगी, उसकी तुलना में आमदनी करीब 1.9 ट्रिलियन डॉलर कम रहने का अनुमान है. CBO के मुताबिक 2026 में जनता के पास मौजूद संघीय कर्ज GDP के करीब 101 फीसदी के बराबर होगा और 2036 तक ये अनुपात 120 फीसदी तक पहुंच सकता है.
यानी अमेरिका की समस्या को सिर्फ ट्रंप की समस्या कहना भी पूरी तस्वीर नहीं है. पिछले कई दशकों में दोनों प्रमुख पार्टियों की सरकारों के दौरान कर्ज बढ़ा है. महामारी के दौरान खर्च, टैक्स कटौती, रक्षा खर्च, सोशल सिक्योरिटी, स्वास्थ्य और दूसरे सरकारी कार्यक्रमों की लागत ने कर्ज को लगातार ऊपर धकेला है. Reuters के मुताबिक ट्रंप के पहले कार्यकाल से लेकर अब तक अमेरिकी कर्ज दोगुने से भी ज्यादा हो चुका है, लेकिन इस बढ़ोतरी में कोविड दौर की नीतियां और बाइडेन प्रशासन के दौरान हुआ खर्च भी शामिल है.
ट्रंप का वादा और हकीकत
डॉनल्ड ट्रंप ने राजनीति में आने के समय अमेरिका के कर्ज को खत्म करने का बड़ा वादा किया था. मगर दूसरी पारी में भी खर्च और राजस्व के बीच का अंतर पूरी तरह खत्म नहीं हो पाया है.
ट्रंप प्रशासन ने सरकारी खर्च कम करने के लिए ‘सरकारी कार्यक्षमता विभाग’ (Department of Government Efficiency) यानी DOGE को आगे किया था. प्रशासन की तरफ से बड़ी बचत के दावे किए गए, लेकिन ‘सरकारी जवाबदेही कार्यालय’ (Government Accountability Office) ने बचत के आंकड़ों की विश्वसनीयता और पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं. दूसरी तरफ टैक्स कटौती और रक्षा खर्च जैसे फैसलों ने राजकोष पर अतिरिक्त दबाव डाला है.
टैरिफ से सरकार की आमदनी बढ़ाने की कोशिश भी हुई, लेकिन टैरिफ नीति से जुड़ी कानूनी और आर्थिक अनिश्चितताओं ने तस्वीर को पेचीदा बनाया. एसोसिएटेड प्रेस के मुताबिक अमेरिकी ट्रेजरी अब लंबी अवधि के सरकारी बॉन्ड की खरीद वापस बढ़ा रही है, क्योंकि लंबी अवधि की बॉन्ड यील्ड काफी ऊपर पहुंच गई है. 30 साल के अमेरिकी ट्रेजरी की यील्ड अगस्त में करीब 5.3 फीसदी तक पहुंची, जो 2007 के बाद का ऊंचा स्तर था.
और यहीं से कर्ज की असली कहानी शुरू होती है. सरकार जितना ज्यादा कर्ज लेती है, ब्याज दर ऊंची होने पर पुराने और नए कर्ज की सर्विसिंग उतनी महंगी होती जाती है. CBO के मुताबिक अमेरिकी संघीय कर्ज पर नेट ब्याज खर्च 2026 में करीब 1 ट्रिलियन डॉलर (करीब 95.6 लाख करोड़ रुपये) से बढ़कर 2036 में करीब 2.1 ट्रिलियन डॉलर (करीब 200.8 लाख करोड़ रुपये) हो सकता है.
दुनिया की 5 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में कौन कितना कर्जदार?
अगर सिर्फ कुल डॉलर रकम देखेंगे तो अमेरिका सबसे बड़ा कर्जदार दिखाई देगा. लेकिन अर्थव्यवस्था के आकार से तुलना करने पर तस्वीर कुछ अलग बनती है. IMF के अप्रैल 2026 ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक’ (World Economic Outlook) के मुताबिक 2026 में सामान्य सरकारी कुल कर्ज GDP के मुकाबले अमेरिका में 125.8 फीसदी, जापान में 204.4 फीसदी, चीन में 106.9 फीसदी, भारत में 83.4 फीसदी और जर्मनी में 64.6 फीसदी रहने का अनुमान है.
जापान इस पैमाने पर सबसे ज्यादा कर्ज वाले देशों में है. IMF के मुताबिक 2026 में जापान का सरकारी सकल कर्ज GDP के करीब 204.4 फीसदी है. लेकिन जापान की कहानी अमेरिका से अलग है क्योंकि उसके सरकारी बॉन्ड का बड़ा हिस्सा घरेलू वित्तीय तंत्र के पास है और उसकी अर्थव्यवस्था की वित्तीय संरचना भी अलग है. इसलिए केवल प्रतिशत देखकर दोनों देशों की स्थिति को एक जैसा नहीं कहा जा सकता.
चीन का सरकारी सकल कर्ज 2026 में GDP के करीब 106.9 फीसदी रहने का IMF अनुमान है. चीन के मामले में भी सरकारी कर्ज की गणना के दायरे को समझना जरूरी है, क्योंकि अलग-अलग संस्थाएं स्थानीय सरकारों और दूसरे सरकारी निकायों को शामिल करने के तरीके में अंतर रखती हैं. IMF खुद अपने डेटा में चीन के सरकारी कर्ज की परिधि को लेकर सावधानी की बात करता है.
भारत का आंकड़ा 83.4 फीसदी है. जर्मनी करीब 64.6 फीसदी पर है. इसका मतलब ये नहीं कि भारत या चीन का कर्ज कम है और इसलिए कोई समस्या नहीं है. कर्ज की गुणवत्ता, ब्याज खर्च, आर्थिक विकास की रफ्तार, सरकारी राजस्व और भविष्य के खर्च, इन सभी चीजों को साथ देखकर तस्वीर बनती है.
तो क्या अमेरिका की अर्थव्यवस्था डूब रही है?
इसका सीधी भाषा में जवाब है, अभी ऐसा कहना सही नहीं होगा. अमेरिका के पास दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, दुनिया का सबसे गहरा सरकारी बॉन्ड बाजार और डॉलर के रूप में दुनिया की प्रमुख रिजर्व करेंसी का फायदा है. इसी वजह से अमेरिकी सरकार को अभी भी भारी मात्रा में कर्ज लेने के बावजूद खरीदार मिल रहे हैं. Reuters ने भी बताया है कि अमेरिकी ट्रेजरी में अभी ऐसी स्थिति नहीं आई है, जिसे खरीदारों के पूरी तरह पीछे हटने के रूप में देखा जाए. हां, निवेशक ज्यादा जोखिम महसूस कर रहे हैं और लंबी अवधि के अमेरिकी बॉन्ड के लिए ज्यादा रिटर्न मांग रहे हैं.
असल खतरा धीरे-धीरे बढ़ती लागत का है. अगर सरकार की आय से ज्यादा हिस्सा ब्याज चुकाने में जाने लगे तो शिक्षा, स्वास्थ्य, इंफ्रास्ट्रक्चर, रक्षा या दूसरे कार्यक्रमों के लिए पैसा जुटाना कठिन हो सकता है. इसके अलावा सरकार को ज्यादा ब्याज देना पड़े तो निजी कंपनियों और आम लोगों के लिए भी कर्ज महंगा हो सकता है.
CBO का अनुमान बताता है कि मौजूदा नीतियां बनी रहीं तो 2036 तक जनता के पास मौजूद अमेरिकी संघीय कर्ज GDP के 120 फीसदी तक पहुंच सकता है और 2056 तक 175 फीसदी तक जाने का अनुमान है. CBO के मुताबिक लंबे समय तक बढ़ता कर्ज ब्याज लागत को और ऊपर ले जाएगा और सरकार को भविष्य में टैक्स बढ़ाने, खर्च घटाने या दोनों का रास्ता अपनाना पड़ सकता है.
आम आदमी की जेब पर क्या असर?
अमेरिका का 40 ट्रिलियन डॉलर कर्ज किसी भारतीय परिवार के घरेलू बजट की तरह नहीं है. लेकिन इसका असर दुनिया भर में महसूस हो सकता है. अगर अमेरिकी बॉन्ड पर यील्ड ऊंची रहती है तो दुनिया के दूसरे देशों के बॉन्ड और ब्याज दरों पर भी दबाव पड़ सकता है. डॉलर मजबूत या कमजोर होने के हिसाब से आयात, कच्चे तेल और दूसरी अंतरराष्ट्रीय वस्तुओं की कीमतों पर असर पड़ सकता है. भारत जैसे देश के लिए अमेरिकी ब्याज दरों और डॉलर की चाल का असर पूंजी प्रवाह, रुपये की विनिमय दर और आयात लागत तक पहुंच सकता है.
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लेकिन सबसे अहम बात ये है कि 40 ट्रिलियन डॉलर अपने आप में अमेरिकी दिवालियेपन का प्रमाण नहीं है. असली खतरा तब बढ़ेगा जब अमेरिकी अर्थव्यवस्था की विकास दर कर्ज की लागत से लगातार पीछे रहने लगे, निवेशक ज्यादा ब्याज मांगें और सरकार राजनीतिक कारणों से खर्च और राजस्व के बीच का अंतर कम करने में लगातार नाकाम रहे.
इसलिए 40 ट्रिलियन डॉलर की कहानी को "अमेरिका बर्बाद हो गया" वाली हेडलाइन में समेटना आसान जरूर है, लेकिन आर्थिक सच उससे कहीं ज्यादा पेचीदा है. अमेरिका अभी भी दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. मगर उसके सामने अब एक ऐसा हिसाब खड़ा है, जिसे जितना टाला जाएगा, उतना ही महंगा किया जा सकता है.
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