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दिल्ली मेट्रो की ये तस्वीर गलत वजहों से वायरल हो रही है

ये तस्वीर जो बता रही असली 'मर्द' कैसा होता है.

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फोटो - thelallantop
जब हमारे यहां मर्द किसी चीज में कमजोर पड़ जाते हैं तो उनसे कहा जाता है घर बैठ जाओ, मेहंदी लगा लो, चूड़ियां पहन लो. कहने का अर्थ ये कि जब मर्द कमज़ोर पड़ जाता है, तब वो औरत बन जाता है. जब कहते हैं कि एक मच्छर आदमी को हिजड़ा बना देता है, कहने का अर्थ होता है कि मच्छर जैसी छोटी चीज भी एक 'पुरुष' को 'नपुंसक' बना सकती है. शॉर्ट में कहें तो जो मजबूत और निडर हो, वही मर्द होता है.
कहते हैं जो असली मर्द होते हैं वो औरत को मोलेस्ट नहीं करते. कुछ साल पहले एक कैंपेन चला था. 'रियल मेन डोंट रेप'. वैसा ही कुछ आजकल दिल्ली मेट्रो में दिख रहा है. एक दोस्त को ये स्टिकर मेट्रो में लगा हुआ दिखा.
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अनिंद्या त्रिपाठी के फेसबुक से साभार

कितना आसान होता है मर्दों से ये कहना कि 'मर्द' हो तो रेप मत करो. कितना आसान होता है उनकी मर्दानगी पर सवाल उठाकर उनसे बात मनवा लेना. कितना आसान होता है मर्दों से कहना कि अगर वो लड़कियों को मोलेस्ट करते हैं तो उनमें पौरुष की कमी है.

तो जो मर्द 'मर्द' नहीं, वो कौन होते हैं?

नपुंसक? हिजड़े? जब हम कहते हैं कि मोलेस्ट करने वाले मर्द नहीं होते, हम सिर्फ उनकी मर्दानगी पर सवाल नहीं उठा रहे होते. हम साथ में ये भी कहते हैं कि जो मर्द नहीं होते (मर्दों का शरीर होते हुए भी), वो बुरे होते हैं. वो कायर होते हैं और इसीलिए औरतों को मोलेस्ट करते हैं. जो कमजोरों को मोलेस्ट करता है वो मर्द नहीं होता. इसलिए औरत कमजोर है. और वो राजकुमारी है जो एक टापू पर कैद है और उसे कैद करने वाला ही नहीं, कैद से मुक्त करवाने वाला भी एक पुरुष ही होगा.

पुरुष, पुरुष कब होता है?

या यूं कहें, कि आदर्श पुरुष कब होता है. जब वो लड़की को मोलेस्ट नहीं, उसकी रक्षा करे. उसका ध्यान रखे. उसका अभिभावक बनकर रहे. उसकी जरूरतें पूरी करे. जिस तरह पिता बच्चों की करते हैं. जीवन भर औरतें पुरुषों पर आश्रित रहें, अपनी जरूरतों, अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए.

जब हम किसी पुरुष को रियल मैन कहते हैं...

जब हम किसी पुरुष को रियल मैन कहते हैं, हम ये कह रहे होते हैं कि उसके अंदर पौरुष है. और उस पौरुष का सही इस्तेमाल औरतों की रक्षा करने के लिए होना चाहिए, उन्हें मोलेस्ट करने के लिए नहीं. दोनों ही परिस्थितियों में औरत कमज़ोर होती है. पुरुष की दया की भागी होती हैं. और ये विचार नहीं बदलता कि औरत पुरुष से कमज़ोर नहीं, उसके बराबर है.
जब हम किसी पुरुष को रियल मैन कहते हैं, हम असल में उसी पुरुषवादी सोच से घिरे होते हैं जो महिलाओं को पुरुषों से कमतर आंकती हैं.
जब हम ऐसा स्टिकर मेट्रो में लगाते हैं, हम एक सेक्सिस्ट अप्रोच को बढ़ावा देते हैं. जो औरतों और पुरुषों को एक दूसरे के विपरीत खड़ा करती है. जो ये मानती है कि चूंकि औरतें कमज़ोर होती हैं, उन्हें एक अलग कोच की जरूरत है.
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दिल्ली मेट्रो, माफ़ करना. औरतों को इसलिए अलग कोच की जरूरत नहीं कि दिल्ली में कोई सच्चा 'मर्द' नहीं बचा. औरतों को अलग कोच इसलिए दिया गया है क्योंकि उनका मोलेस्टेशन होता है. उन्हें घूरा जाता है, गलत तरह से छुआ जाता है. इस समाज में उन्हें असुरक्षित महसूस करवाया जाता है. ठीक उसी तरह जैसे उन लोगों को असुरक्षित महसूस करवाया जाता है जो आम परिभाषा में सच्चे 'मर्द' नहीं होते. समलैंगिक और हिजड़े भी. ठीक उसी तरह जब घर से बाहर निकलते वक़्त उन्हें टोका जाता है कि कपड़े ठीक से पहनो. घर के पुरुष उन्हें मोलेस्ट नहीं करते. 'सच्चे मर्द' होते हैं.
और हां, अगर सभी मर्द सच्चे 'मर्द' बन भी गए, तो औरतों को कमज़ोर मानना बंद नहीं करेंगे. पिता, पति और भाई बनकर उनकी 'रक्षा' करते रहेंगे. कभी ये न समझ पाएंगे कि औरतों को 'रक्षा' नहीं, 'सुरक्षा' की जरूरत है. और अलग लेडीज कोच की तो कतई नहीं.


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