रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका 100 फीसदी तक टैरिफ लगा सकता है. भारत और चीन जैसे देशों पर इसकी सीधी मार पड़ सकती है. लेकिन इसी अमेरिका को जब अपने न्यूक्लियर पावर प्लांट चलाने के लिए रूस के यूरेनियम की जरूरत पड़ती है, तो सारे नियम कायदे ताक पर रख दिए जाते हैं.
US बहुत चालू निकला, सब पर प्रतिबंध लगाने जा रहा, और रूस को लेकर खुद को खुली छूट दी
US sanction bill: अमेरिकी संसद ने रूस और ईरान पर नए प्रतिबंधों वाला बिल पास कर दिया है. इसमें रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर डॉनल्ड ट्रंप को 100 फीसदी टैरिफ लगाने की ताकत दी गई है. मगर इस बिल में अमेरिका को तेल से भी कहीं ज्यादा महंगी चीज रूस से खरीदने की छूट दी गई है. इसके पीछे की पूरी कहानी जान लीजिए.

अमेरिकी संसद ने रूस और ईरान पर नए प्रतिबंधों वाला Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 पास किया है. इस बिल में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को ऐसे देशों के सामान पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने की ताकत दी गई है, जो रूस से कच्चा तेल या गैस खरीदते हैं या रूस को प्रतिबंधों से बचने में मदद करते हैं. भारत और चीन जैसे रूस के बड़े ऊर्जा खरीदार इसी दायरे में आ सकते हैं.
इंडिया टुडे के मुताबिक, अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने 17 सितंबर को इस बिल को 262 वोट के मुकाबले 159 वोट से पास किया. इसके पक्ष में 58 डेमोक्रेट सांसद भी रिपब्लिकन सांसदों के साथ आए. इससे पहले सीनेट इसे 86-11 के वोट से पास कर चुकी थी. इसी बिल में रूस से यूरेनियम खरीद को लेकर कुछ खास छूट दी गई है.
न्यूक्लियर पावर प्लांट में बिजली बनाने के लिए सिर्फ यूरेनियम निकाल लेना काफी नहीं होता. यूरेनियम को कई स्टेप से गुजरना पड़ता है. पहले उसे प्रोसेस किया जाता है. फिर उसका एनरिचमेंट यानी उसमें काम आने वाले यूरेनियम की मात्रा बढ़ाई जाती है. इसके बाद इससे न्यूक्लियर फ्यूल बनाया जाता है. इस एनरिचमेंट के काम में रूस लंबे समय से बहुत बड़ा खिलाड़ी रहा है.
US एनर्जी इन्फॉर्मेशन प्रशासन के मुताबिक, 2025 में अमेरिका के सिविलियन न्यूक्लियर रिएक्टरों ने कुल 12.71 मिलियन सेपरटिव वर्क यूनिट (SWU) की एनरिचमेंट सर्विस खरीदीं. इनमें 3.284 मिलियन SWU रूस से आया. यानी करीब 26 फीसदी. SWU मतलब यूरेनियम एनरिचमेंट करने में लगी मेहनत या काम की एक यूनिट.
अमेरिका के अपने एनरिचमेंट फैसिलिटी की हिस्सेदारी करीब 23 फीसदी थी. बाकी हिस्सा फ्रांस, ब्रिटेन और नीदरलैंड जैसे देशों से आया. अब यहीं से समझ आता है कि अमेरिका के लिए रूस का न्यूक्लियर फ्यूल इतना अहम क्यों है. अमेरिका पहले ही रूस पर इस मामले में निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है.
मई 2024 में अमेरिका ने रूस से कम एनरिच (low-enriched) यूरेनियम यानी LEU के इंपोर्ट पर रोक लगाने वाला कानून बनाया था. लेकिन इसमें एक रास्ता रखा गया था. अगर किसी अमेरिकी न्यूक्लियर रिएक्टर को चलाने के लिए रूस के यूरेनियम का कोई दूसरा सोर्स मौजूद नहीं है या आयात, देश के हित में है, तो छूट दी जा सकती है. ये छूट 1 जनवरी 2028 तक चल सकती थी.
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नए बिल में क्या छूट मिली है?अब रूस के तेल खरीद से जुड़े नए प्रतिबंध वाले बिल में भी इसी तरह की छूट दिखाई देती है. बिल का सेक्शन 111 रूस के यूरेनियम इंपोर्ट पर पहले से मौजूद अमेरिकी प्रतिबंधों को लागू करने की बात करता है.
लेकिन Section 114 में दो बड़े एक्सेप्शन्स हैं. पहला, अमेरिका और रूस के बीच सिविलियन न्यूक्लियर कॉर्पोरेशन एग्रीमेंट के तहत होने वाली कुछ एक्टिविटीज पर ये सैंक्शन लागू नहीं होंगे. दूसरा, कुछ ऐसे low-enriched यूरेनियम इम्पोर्ट्स को भी छूट मिल सकती है, जो अमेरिकी न्यूक्लियर रिएक्टर के लिए इस्तेमाल होते हैं और पहले से मौजूद अमेरिकी कानून के दायरे में आते हैं.
यानी ऐसा नहीं है कि अमेरिका रूस से जुड़े हर न्यूक्लियर ट्रांसक्शन पर एक साथ पूरी तरह रोक लगा रहा है. बल्कि अमेरिका एक तरफ रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ा रहा है और दूसरी तरफ अपने न्यूक्लियर पावर सेक्टर को अचानक फ्यूल की कमी से बचाने के लिए कुछ रास्ते खुले रख रहा है.
हालांकि अमेरिका अपनी डिपेंडेंसी कम करने पर काम कर रहा है. अमेरिकी आंकड़ों के मुताबिक 2025 में अमेरिका में यूरेनियम का प्रोडक्शन 2.1 मिलियन पाउंड रहा. ये 2024 के मुकाबले तीन गुना से भी ज्यादा था और 2017 के बाद सबसे ज्यादा था.
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