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MP-MLAs की रिश्वतखोरी पर सुप्रीम कोर्ट की वो बातें जिन्हें हर नागरिक को जानना चाहिए

अब सांसदों और विधायकों को सदन में भाषण देने या वोट डालने के बदले रिश्वत लेने पर किसी तरह का कानूनी संरक्षण नहीं मिलेगा.

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सुप्रीम कोर्ट ने साल 1998 के अपने फैसले को पलट दिया. (फोटो- पीटीआई)

सुप्रीम कोर्ट ने सांसदों और विधायकों को मिलने वाले संसदीय विशेषाधिकार से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अब सांसदों और विधायकों को सदन में भाषण देने या वोट डालने के बदले रिश्वत लेने पर किसी तरह का कानूनी संरक्षण नहीं मिलेगा. यानी उनके खिलाफ ऐसे मामलों में मुकदमा चलाया जा सकेगा. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने साल 1998 के उस फैसले को भी पलट दिया, जिसमें कहा गया था कि ऐसे केस में सांसदों और विधायकों के खिलाफ मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है.

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4 मार्च को सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने ये फैसला दिया. चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली इस बेंच में कुल सात जज थे. सुप्रीम कोर्ट ने आज के फैसले में क्या-क्या कहा, उससे पहले समझते हैं कि कोर्ट में ये मामला पहुंचा कैसे.

मामला झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की विधायक सीता सोरेन का था. साल 2012 के राज्यसभा चुनाव में उन पर निर्दलीय उम्मीदवार से रिश्वत लेकर वोटिंग करने का आरोप लगा था. अपने खिलाफ दर्ज हुए केस को चुनौती देते हुए झारखंड हाई कोर्ट चली गईं. उन्होंने संविधान के अनुच्छेद-194(2) के प्रावधानों का हवाला दिया कि विधायकों को कानूनी संरक्षण मिला हुआ है. हालांकि हाई कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज दी. इस फैसले को चुनौती देते हुए सीता सोरेन सुप्रीम कोर्ट पहुंच गईं.

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मार्च 2019 में तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच ने कहा था कि ये मामला 1998 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की तरह है. उस समय कोर्ट ने 3-2 की बहुमत से फैसला दिया था. इसलिए इसे बड़ी बेंच के पास भेजना चाहिए. आखिरकार पिछले साल अक्टूबर में सात जजों की बेंच ने मामले पर सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था.

अब सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा कि संविधान के अनुच्छेदों 105 और 194 के तहत ऐसे मामलों में सांसद और विधायक कानूनी संरक्षण नहीं ले सकते. संविधान के अनुच्छेद 105(2) के तहत संसद में कुछ भी कहने या या किसी को वोट करने पर सांसदों को कानूनी कार्रवाई की छूट है. इसी तरह अनुच्छेद 194(2) के तहत विधायकों को इस तरह की छूट मिली हुई है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की बड़ी बातें --

# संविधान के अनुच्छेद 105 और 194 सदन के अंदर विचार-विमर्श का माहौल बनाए रखने के लिए हैं. अगर सदस्य घूस लेकर सवाल करें या वोट करें तो ये संविधान के अनुच्छेदों का अपमान होगा. संसदीय विशेषाधिकार सांसदों या विधायकों को सदन के भीतर सामूहिक कार्यप्रणाली के लिए दिया जाता है. रिश्वत लेने को इन अनुच्छेदों से नहीं ढका जा सकता है. इसलिए ये विशेषाधिकार के तहत नहीं आ सकता है.

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# भ्रष्टाचार और रिश्वत लेना गलत है. चाहे वो सदन के अंदर हो या बाहर. ऐसा करना सदन में वोट देने या भाषण देने के लिए जरूरतों की श्रेणी में नहीं आता. इसलिए सांसदों और विधायकों को विशेषाधिकार नहीं दिया जा सकता है.

# जब कोई जनप्रतिनिधि घूस लेता है उसी वक्त उस पर केस बन जाता है. ये मायने नहीं रखता कि उसके बदले, उसने वो भाषण दिया या नहीं या सवाल पूछा या नहीं.

# सांसदों या विधायकों का भ्रष्टाचार और घूसखोरी में शामिल होना भारत के संसदीय लोकतंत्र के आधार को कमजोर करता है. यह संविधान के मूल्यों और आदर्शों को बर्बाद करने जैसा है. और एक ऐसी राजनीति पैदा करती है, जो नागरिकों को एक जिम्मेदार, उत्तरदायी और आदर्श लोकतंत्र से वंचित करता है.

# विधायिका के किसी सदस्य द्वारा किया गया भ्रष्टाचार या रिश्वतखोरी, सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी को खत्म कर देती है.

# नरसिम्हा राव केस में 1998 का फैसला एक विरोधाभासी स्थिति पैदा करने वाला है. जिसके मुताबिक, अगर जनप्रतिनिधि रिश्वत लेकर वोट करता है तो कानूनी कार्रवाई से सुरक्षित है. इसलिए कोर्ट उस फैसले को खारिज करता है.

1998 का फैसला क्या था?

जुलाई 1993 में नरसिम्हा राव सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था. सरकार ने बहुमत साबित कर दिया. लेकिन तीन साल बाद इस अविश्वास प्रस्ताव के दौरान रिश्वतखोरी का मामला सामने आया. आरोप लगा कि JMM के सांसदों ने सरकार बचाने के एवज में रिश्वत ली है. शिबू सोरेन, साइमन मरांडी और शैलेन्द्र महतो के खिलाफ मुकदमा हुआ. सीबीआई ने मामला दर्ज किया था. आरोप लगा कि सांसदों को 3 करोड़ रुपये तक दिए गए. 

हालांकि 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेदों का हवाला देते हुए कहा था कि सांसदों ने जो किया उस अपराध की गंभीरता से वो परिचित है, लेकिन इसके बावजूद सांसद उस कानूनी संरक्षण के हकदार हैं जो उन्हें संविधान से मिला हुआ है.

सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले के बाद अब ऐसे मामलों में भ्रष्टाचार रोकथाम कानून के तहत सांसदों और विधायकों के खिलाफ कार्रवाई हो सकेगी.

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