The Lallantop

रूस में प्लेग की दहशत, निगरानी में 200 लोग, भारत में लौट सकता है 'काली मौत' का बरसों पुराना साया?

Russia Plague Scare & India: रूस में एक लैब रिसर्चर की मौत के बाद प्लेग एक बार फिर चर्चा में है. भारत में 1896 की मुंबई महामारी से लेकर 1994 के सूरत, 2002 के हिमाचल और 2004 के उत्तराखंड तक प्लेग के प्रकोप सामने आ चुके हैं. जानिए प्लेग क्या है, कैसे फैलता है, कितना खतरनाक है और इससे बचाव कैसे किया जा सकता है.

Advertisement
post-main-image
रूस में प्लेग ने डराया, भारत में कब-कब मचाया हाहाकार? (Courtesy- India Today)

Quick AI HighlightsClick here to view more

  • रूस के साइबेरिया में 28 साल की एक लैब रिसर्चर की मौत के बाद प्लेग संक्रमण की आशंका जताई गई है और कई लोगों को निगरानी में रखा गया है, लेकिन मौत का कारण अभी स्पष्ट नहीं है।
  • भारत में प्लेग का इतिहास 1896 में मुंबई से शुरू हुआ, जहां चूहों और पिस्सुओं के माध्यम से बीमारी तेजी से फैली और 1949 तक लाखों लोगों की मौत दर्ज हुई।
  • समय-समय पर भारत में प्लेग के छोटे प्रकोप आए हैं, इसलिए संक्रमण नियंत्रण, निगरानी और तत्काल चिकित्सा जांच को प्राथमिकता दी जाती है ताकि बड़े प्रकोप को रोका जा सके।

रूस के साइबेरिया में एक 28 साल की लैब रिसर्चर की मौत के बाद प्लेग का नाम एक बार फिर सुर्खियों में है. शेलेखोव स्थित एंटी-प्लेग रिसर्च इंस्टीट्यूट से जुड़ी इस घटना में बड़ी संख्या में लोगों को निगरानी में रखे जाने की खबर है. मीडिया रिपोर्ट्स में प्लेग संक्रमण की आशंका जताई गई है, हालांकि महिला की मौत की आधिकारिक वजह को लेकर अभी स्थिति पूरी तरह साफ नहीं है. 

Advertisement

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक मामला फिलहाल शक और जांच के दायरे में है. लेकिन इस घटना ने एक पुराना सवाल जरूर जिंदा कर दिया है. आखिर प्लेग जैसी बीमारी, जिसने कभी दुनिया में लाखों लोगों की जान ली, आज कितनी खतरनाक है और भारत में इसका इतिहास कितना भयावह रहा है?

इस सवाल का जवाब भारत के इतिहास में छिपा है. करीब 130 साल पहले मुंबई से शुरू हुआ प्लेग का प्रकोप देखते ही देखते देश के बड़े हिस्से तक पहुंच गया था. 19वीं सदी के आखिरी वर्षों और 20वीं सदी की शुरुआत में इस बीमारी ने भारत में इतनी बड़ी तबाही मचाई कि लाखों लोगों की मौत हो गई. लेकिन कहानी सिर्फ इतिहास तक सीमित नहीं है. 1994 में सूरत और महाराष्ट्र के बीड में प्लेग फिर सामने आया. इसके बाद 2002 में हिमाचल प्रदेश और 2004 में उत्तराखंड में भी इसके मामले सामने आए.

Advertisement

मुंबई से शुरू हुई थी तबाही

भारत में आधुनिक दौर के सबसे बड़े प्लेग प्रकोप की शुरुआत 1896 में बंबई यानी आज की मुंबई से हुई. उस समय शहर तेजी से बढ़ रहा था, बंदरगाह के जरिए बड़े पैमाने पर व्यापार होता था और शहर की आबादी घनी थी. ऐसे माहौल में चूहों और पिस्सुओं से जुड़ी बीमारी के फैलने के लिए अनुकूल परिस्थितियां मौजूद थीं.

1896 के बाद प्लेग धीरे-धीरे भारत के दूसरे हिस्सों तक पहुंचा. उपलब्ध ऐतिहासिक अध्ययनों के मुताबिक 1898 से 1949 के बीच ब्रिटिश भारत में प्लेग से जुड़ी 1.3 करोड़ से ज्यादा मौतें दर्ज की गईं. मुंबई इस तबाही के सबसे बड़े केंद्रों में रही. एक अध्ययन के अनुसार 1896 में प्लेग के पहुंचने के बाद अगले 16 वर्षों में अकेले मुंबई में करीब 1.46 लाख मौतें हुईं.

उस समय बीमारी की वैज्ञानिक समझ आज जैसी नहीं थी. संक्रमण रोकने के लिए घरों की तलाशी, संदिग्ध मरीजों को अलग करना, संक्रमित सामान को नष्ट करना और लोगों को जबरन अस्पतालों में भेजने जैसे कदम उठाए गए. इन कठोर उपायों ने बीमारी के डर के साथ-साथ प्रशासन के खिलाफ नाराजगी भी बढ़ाई.

Advertisement

यही वो दौर था जब प्लेग को 'काली मौत' यानी ब्लैक डेथ जैसे नामों से जोड़ा जाने लगा. हालांकि ऐतिहासिक ब्लैक डेथ और भारत में 1896 के बाद फैले प्लेग को एक ही घटना मानना सही नहीं है. दोनों का संबंध यर्सिनिया पेस्टिस नाम के एक ही बैक्टीरिया से जरूर है.

1994 में सूरत ने फिर याद दिलाया पुराना डर

लगभग तीन दशक तक भारत में बड़े मानव प्लेग प्रकोप की खबर नहीं आई. फिर 1994 में अचानक प्लेग का नाम पूरे देश में डर का पर्याय बन गया.

महाराष्ट्र के बीड जिले में ब्यूबोनिक प्लेग के मामले सामने आए, जबकि गुजरात के सूरत में न्यूमोनिक प्लेग की घटनाएं सामने आईं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के रिकॉर्ड के अनुसार उस समय भारत में 876 चिकित्सकीय रूप से पुष्ट मामले दर्ज हुए और 52 लोगों की मौत हुई.

लेकिन इस प्रकोप का असर सिर्फ अस्पतालों और मरीजों तक सीमित नहीं रहा. सूरत में बीमारी की खबर फैलते ही बड़े पैमाने पर अफरातफरी मच गई. करीब 5 लाख लोग शहर और आसपास के इलाकों से बाहर चले गए. कई जगह लोगों ने भारत के दूसरे शहरों की यात्रा तक रोक दी और देश के बाहर भी भारत से आने वाले यात्रियों को लेकर डर पैदा हुआ.

बाद की जांच से ये भी साफ हुआ कि बीमारी को लेकर फैली अफवाह और वास्तविक संक्रमण के बीच बड़ा अंतर था. फिर भी 1994 की घटना ने भारत को ये याद दिला दिया कि प्लेग पूरी तरह अतीत की बीमारी नहीं बना है.

2002 में हिमाचल और 2004 में उत्तराखंड

1994 के बाद अगला बड़ा घटनाक्रम फरवरी 2002 में हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के हाटकोटी गांव में सामने आया. यहां न्यूमोनिक प्लेग के मामले मिले. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कुल 16 मामले सामने आए और 4 लोगों की मौत हुई.

स्वास्थ्य अधिकारियों ने संक्रमित लोगों के संपर्क में आए लोगों की निगरानी की और बचाव के लिए दवाएं दीं. प्रभावित क्षेत्र में पिस्सुओं और चूहों पर नियंत्रण के उपाय भी किए गए. बीमारी को आगे फैलने से रोकने में ये कदम महत्वपूर्ण रहे.

इसके करीब दो साल बाद अक्टूबर 2004 में उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के डांगुड़ गांव में ब्यूबोनिक प्लेग का छोटा प्रकोप सामने आया. वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक इस घटना में 8 मामले सामने आए और 3 लोगों की मौत हुई. करीब 1,250 लोगों को संक्रमण से बचाने के लिए दवा दी गई और लगभग दो सप्ताह में प्रकोप पर नियंत्रण पा लिया गया.

2004 के बाद भारत में मानव प्लेग के किसी बड़े प्रकोप की रिपोर्ट सामने नहीं आई है.

प्लेग आखिर है क्या?

प्लेग एक जीवाणु संक्रमण है, जो यर्सिनिया पेस्टिस नाम के बैक्टीरिया से होता है. इसका प्राकृतिक चक्र मुख्य रूप से जंगली छोटे स्तनधारी जानवरों और उनके शरीर पर रहने वाले संक्रमित पिस्सुओं के बीच चलता है.

संक्रमित पिस्सू जब इंसान को काटता है तो बैक्टीरिया शरीर में पहुंच सकता है. संक्रमित जानवर के ऊतक या शरीर के तरल पदार्थ के संपर्क से भी संक्रमण हो सकता है. यानी प्लेग का मूल संबंध पर्यावरण, जानवरों, पिस्सुओं और इंसानों के बीच मौजूद संक्रमण चक्र से है.

प्लेग के तीन प्रमुख रूप होते हैं…

ब्यूबोनिक प्लेग: 

ये प्लेग का सबसे आम रूप है. इसमें तेज बुखार, कमजोरी और शरीर की लसीका ग्रंथियों में दर्दनाक सूजन हो सकती है. इस सूजन को बुबो कहा जाता है. ये आम तौर पर उस हिस्से के आसपास दिखाई देती है जहां से बैक्टीरिया शरीर में दाखिल हुआ है.

अगर समय पर इलाज न मिले तो बैक्टीरिया खून या फेफड़ों तक पहुंच सकता है और बीमारी ज्यादा गंभीर रूप ले सकती है.

न्यूमोनिक प्लेग सबसे ज्यादा संक्रामक

न्यूमोनिक प्लेग फेफड़ों को प्रभावित करता है. इसमें तेज बुखार, कमजोरी, सांस लेने में परेशानी, सीने में दर्द और खांसी जैसे लक्षण हो सकते हैं. इस रूप की सबसे बड़ी चिंता ये है कि संक्रमित व्यक्ति के खांसने या सांस लेने से निकली संक्रमित बूंदों के जरिए ये दूसरे व्यक्ति तक पहुंच सकता है. इसी वजह से न्यूमोनिक प्लेग के संदिग्ध मामलों में संक्रमण नियंत्रण और संपर्क में आए लोगों की निगरानी बेहद जरूरी होती है.

सेप्टिसेमिक प्लेग

जब यर्सिनिया पेस्टिस बैक्टीरिया सीधे खून में फैल जाता है तो इसे सेप्टिसेमिक प्लेग कहा जाता है. इसमें बेहद गंभीर संक्रमण हो सकता है और शरीर के कई अंग प्रभावित हो सकते हैं.

इसलिए प्लेग में सबसे जरूरी चीज बीमारी की जल्दी पहचान और तुरंत उपचार है.

क्या आज भी प्लेग से डरने की जरूरत है?

प्लेग गंभीर बीमारी है, लेकिन 19वीं सदी जैसी स्थिति आज नहीं है. सबसे बड़ा फर्क आधुनिक चिकित्सा, एंटीबायोटिक दवाओं, बेहतर स्वच्छता, बीमारी की निगरानी और संक्रमण नियंत्रण व्यवस्था का है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार ब्यूबोनिक प्लेग का इलाज न होने पर मृत्यु दर 30 से 60 प्रतिशत तक हो सकती है. न्यूमोनिक और सेप्टिसेमिक प्लेग इलाज के बिना तेजी से जानलेवा हो सकते हैं. लेकिन समय पर सही एंटीबायोटिक उपचार मिलने पर मरीज को बचाया जा सकता है.

यही वजह है कि प्लेग का संदेह होने पर प्रयोगशाला की अंतिम रिपोर्ट का इंतजार करके इलाज शुरू करने में देरी नहीं की जाती. डॉक्टर मरीज की स्थिति और संक्रमण के प्रकार के आधार पर उपयुक्त एंटीबायोटिक शुरू कर सकते हैं.

प्लेग से बचने के लिए क्या करें?

प्लेग से बचाव का पहला तरीका चूहों और पिस्सुओं के संपर्क को कम करना है. घर और आसपास कचरा जमा न होने दें. ऐसी जगहें न बनने दें जहां चूहे आसानी से पनप सकें.

अगर किसी इलाके में अचानक बड़ी संख्या में चूहे या दूसरे छोटे जानवर मरे हुए मिलें तो उन्हें नंगे हाथों से न छुएं और स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों को इसकी जानकारी दें.

पालतू कुत्तों और बिल्लियों में पिस्सुओं से बचाव भी जरूरी है. इसके लिए पशु चिकित्सक की सलाह से उचित पिस्सू नियंत्रण उपचार कराया जा सकता है.

अगर किसी क्षेत्र में न्यूमोनिक प्लेग का संदिग्ध मरीज सामने आता है तो उसके करीबी संपर्कों की निगरानी की जाती है. ऐसे मामलों में स्वास्थ्य अधिकारियों की सलाह का पालन करना और संक्रमित व्यक्ति से अनावश्यक निकट संपर्क से बचना जरूरी है.

रूस की घटना से भारत को क्या सीखना चाहिए?

रूस में सामने आई मौजूदा घटना को लेकर अभी अंतिम निष्कर्ष का इंतजार करना जरूरी है. लेकिन इससे एक बात साफ होती है कि यर्सिनिया पेस्टिस बैक्टीरिया दुनिया से खत्म नहीं हुआ है. ये प्रकृति में कुछ क्षेत्रों के जानवरों और पिस्सुओं के बीच अब भी मौजूद है.

भारत का इतिहास भी यही बताता है. 1896 की मुंबई महामारी से लेकर 1994 के सूरत और बीड, 2002 के हिमाचल और 2004 के उत्तरकाशी तक प्लेग ने अलग-अलग समय पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई.

आज भारत में प्लेग कोई रोजमर्रा का सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरा नहीं है. लेकिन इसे पूरी तरह भुलाया भी नहीं जा सकता. बीमारी की निगरानी, चूहों और पिस्सुओं पर नियंत्रण, स्वच्छता और संदिग्ध मामलों में तत्काल चिकित्सा जांच ही वो उपाय हैं जो किसी छोटे संक्रमण को बड़े प्रकोप में बदलने से रोक सकते हैं.

रूस की मौजूदा घटना इसलिए सिर्फ एक विदेशी खबर नहीं है. ये उस बीमारी की याद भी है, जिसने भारत के इतिहास के एक दौर को बदल दिया था. फर्क सिर्फ इतना है कि आज हमारे पास उस दुश्मन को पहचानने और उससे लड़ने के कहीं ज्यादा मजबूत हथियार मौजूद हैं.

वीडियो: चीन में मिले 'ब्यूबॉनिक प्लेग' को 'ब्लैक डेथ' क्यों कहते हैं?

Advertisement