दुनिया की वामपंथी राजनीति का बड़ा चेहरा और ब्राजील की राजनीति के सबसे असरदार नेताओं में से एक 80 साल के लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा ने ब्राजील का राष्ट्रपति चुनाव में जीत लिया है. इसी के साथ उन्होंने चौथी बार सत्ता में वापसी की है. उन्होंने दक्षिणपंथी नेता फ्लावियो बोल्सोनारो को हराया है. फ्लावियो, ब्राजील के पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के बड़े बेटे हैं. खास बात ये है कि पहले दौर में फ्लावियो आगे थे. लेकिन दूसरे दौर में लूला ने बाजी पलट दी.
ब्राजील में लूला दा सिल्वा ने चौंकाया, दक्षिणपंथी बोल्सोनारो को हराकर जीता राष्ट्रपति चुनाव
ब्राजील में लूला दा सिल्वा ने राष्ट्रपति चुनाव जीतकर चौथी बार सत्ता में वापसी की है. उन्होंने फ्लावियो बोल्सोनारो को हराया. अब महंगाई, बढ़ते कर्ज और रूढ़िवादी विपक्ष से निपटना उनकी बड़ी चुनौती होगी.

ब्राजील की क्षेत्रीय चुनाव अदालत Tribunal Regional Eleitoral-SP के मुताबिक, लूला को करीब 51.75 फीसदी वोट मिले, जबकि फ्लावियो को 48.25 फीसदी वोट मिले. यानी मुकाबला कड़ा था, लेकिन आखिरकार लूला अपनी कुर्सी बचाने में कामयाब रहे.
ब्राजील के न्यूज पोर्टल UOL Notícias के मुताबिक, वोटों की बात करें तो लूला को इस बार 6.42 करोड़ वोट मिले. पहले दौर में उन्हें 5.38 करोड़ वोट मिले थे. यानी उनके वोट करीब एक करोड़ बढ़े. वहीं, फ्लेवियो बोल्सोनारो के वोट पहले दौर के 5.61 करोड़ से बढ़कर 5.98 करोड़ हो गए.
लूला ब्राजील की राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं. उन्हें वामपंथी राजनीति का बड़ा चेहरा माना जाता है. वो 2003 से 2010 तक दो बार राष्ट्रपति रह चुके हैं. भ्रष्टाचार के मामलों में लूला अप्रैल 2018 से नवंबर 2019 तक जेल में रहे. हालांकि, उनकी सजा कन्विक्शन के बाद में रद्द कर दी गई. इसके बाद 2022 के चुनाव में उन्होंने जायर बोल्सोनारो को हराया और सत्ता में लौटे.
अब चौथी बार राष्ट्रपति बनकर उन्होंने एक और बड़ी वापसी की है. खास बात ये भी है कि ब्राजील में लोकतंत्र बहाल होने के बाद लूला पहले ऐसे उम्मीदवार बने हैं, जो चुनाव के पहले दौर में दूसरे नंबर पर रहे, लेकिन दूसरे दौर में जीत गए.
महंगाई और भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच जीतइंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, इस चुनाव में लूला के सामने कई चुनौतियां थीं. महंगाई, भ्रष्टाचार से जुड़े पुराने विवाद और सरकार के कामकाज को लेकर सवाल उठ रहे थे. युवा वोटरों और तेजी से बढ़ते असंगठित कामगारों के बीच भी उनकी पकड़ को लेकर चर्चा थी.
लूला ने अपने प्रचार में गरीबी और असमानता कम करने, रोजगार बढ़ाने और सामाजिक कल्याण की योजनाओं पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि उनकी सरकार गरीबों और कामगारों के हित में काम करेगी. दूसरी तरफ, फ्लावियो बोल्सोनारो ने अपने पिता की दक्षिणपंथी राजनीति को आगे बढ़ाने की कोशिश की. उनकी राजनीति में सख्त कानून-व्यवस्था और कारोबार को बढ़ावा देने जैसे मुद्दे प्रमुख रहे.
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ट्रंप और दक्षिणपंथी राजनीति को झटका?लूला की जीत का असर ब्राजील से बाहर भी पड़ सकता है. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का प्रशासन बोल्सोनारो परिवार की सत्ता में वापसी के पक्ष में था. ऐसे में लूला की जीत लैटिन अमेरिका में दक्षिणपंथी राजनीति के बढ़ते प्रभाव के बीच एक अहम रिजल्ट है. लेकिन जीत के बाद लूला के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं. उन्हें महंगाई, बढ़ते सरकारी कर्ज और अर्थव्यवस्था की रफ्तार पर काम करना होगा. सरकार का अनुमान है कि अगले साल देश की आर्थिक विकास दर 2.3 फीसदी रहेगी. वहीं, देश पर कर्ज बढ़कर GDP के 82 फीसदी से ज्यादा हो गया है. कोरोना महामारी के बाद से ये कर्ज का सबसे ऊंचा स्तर है. इन सब के साथ उन्हें संसद में मजबूत रूढ़िवादी विपक्ष के साथ भी तालमेल बिठाना पड़ेगा.
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