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क्या आपको 'भूल जाने का अधिकार' है? सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के लिए तैयार हो गया है

'Right To Be Forgotten' को आसान भाषा में ‘डिजिटल फुटप्रिंट’ को मिटाने की प्रक्रिया कह सकते हैं. मतलब कि इंटरनेट पर किसी मामले से अपना नाम हटवाना, जिससे किसी की छवि को नुकसान पहुंचता हो. इसे 'राइट टू प्राइवेसी' के अधिकार से जोड़ा जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने 'राइट टू प्राइवेसी' को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी है.

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भारत में 'Right To Be Forgotten' का मामला अनसुलझा है. (तस्वीर: AI/इंडिया टुडे)

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने एक ऐसे मामले की सुनवाई के लिए सहमति जताई है, जिससे भारत में ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ के अधिकार पर स्पष्टता आ सकती है. सुप्रीम कोर्ट को ये तय करना है कि ये किसी नागरिक का मौलिक अधिकार है या नहीं, और अगर है तो ये संविधान के अन्य मौलिक अधिकारों से कैसे संबंधित है. CJI डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ इस याचिका पर सुनवाई करेगी. इस याचिका में मद्रास हाई कोर्ट के एक फैसले को चुनौती दी गई है.

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2014 में हुए रेप और धोखाधड़ी के एक मामले में एक व्यक्ति का नाम आया था. बाद में उसे बरी कर दिया गया. ये शख्स ऑस्ट्रेलिया की नागरिकता लेना चाहता था. लेकिन उसे वहां की नागरिकता नहीं दी गई. क्योंकि कानूनी मामलों से जुड़े एक ऑनलाइन पोर्टल पर पब्लिश एक आर्टिकल में उसका नाम का जिक्र था. ये आर्टिकल उसी रेप और धोखाधड़ी मामले पर था, जिसमें शख्स को बरी किया गया था.

ऐसे में 2021 में उसने मद्रास हाई कोर्ट का रूख किया था. कोर्ट ने 27 फरवरी को पोर्टल से इस फैसले से जुड़ी जानकारी में से शख्स का नाम हटाने का निर्देश दिया था. इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा है.

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क्या है Right to be forgotten?

‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ को आसान भाषा में ‘डिजिटल फुटप्रिंट’ को मिटाने की प्रक्रिया कह सकते हैं. मतलब कि इंटरनेट पर किसी मामले से अपना नाम हटवाना, जिससे किसी की छवि को नुकसान पहुंचता हो. इसे 'राइट टू प्राइवेसी' के अधिकार से जोड़ा जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने 'राइट टू प्राइवेसी' को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी है.

ये भी पढ़ें: निजता के अधिकार के बावजूद भारत में कब और कौन आपका फोन टैप कर सकता है?

भारत में क्या प्रावधान है?

फिलहाल भारत में ऐसा कोई वैधानिक ढांचा नहीं है जो ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ को निर्धारित करता हो. ‘पुट्टस्वामी मामले’ में सुप्रीम कोर्ट ने 2017 के अपने फैसले में ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ का जिक्र किया था. तत्कालीन जस्टिस एसके कौल ने कहा था कि इस अधिकार का मतलब ये नहीं है कि पहले से मौजूद किसी सूचना के सभी पहलुओं को मिटा दिया जाए. उन्होंने कहा कि इसका मतलब केवल इतना है कि अगर कोई व्यक्ति खुद से जुड़ी किसी जानकारी को इंटरनेट से हटवाना चाहता है, तो उसे सिस्टम से हटाया जाना चाहिए, अगर वो सूचना अब आवश्यक या प्रासंगिक नहीं है.

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जस्टिस कौल ने उन मामलों की एक लिस्ट भी दी थी जिनमें ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ का उल्लंघन किया जा सकता है. ये मामले हैं,

  • अभिव्यक्ति और सूचना की स्वतंत्रता के अधिकार के प्रयोग से जुड़े मामले.
  • कानूनी दायित्वों के अनुपालन के लिए.
  • सार्वजनिक हित में किए गए काम के लिए.
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य के आधार पर दी गई सूचना.
  • वैज्ञानिक या ऐतिहासिक रिसर्च के लिए.
  • सांख्यिकीय उद्देश्यों के लिए.
  • कानूनी दावों की स्थापना, प्रयोग या बचाव के लिए.
'पर्सनल जानकारी इंटरनेट पर नहीं डाल सकते'

कई अलग-अलग याचिकाओं में व्यक्तिगत जानकारी को हटाने की अनुमति मांगी जाती रही है. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से अधिकतर मामलों में कोर्ट ने इसकी अनुमति दी है. राजगोपाल बनाम तमिलनाडु राज्य के मामले में 1994 के एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने “Right to be let alone" यानी "अकेले रहने के अधिकार” की बात की थी. कोर्ट ने कहा,

“नागरिक को अपनी, अपने परिवार, विवाह, मातृत्व, बच्चे पैदा करने और शिक्षा सहित अन्य मामलों की प्राइवेसी की रक्षा करने का अधिकार है. कोई भी व्यक्ति इन मामलों से संबंधित कुछ भी उसकी सहमति के बिना प्रकाशित नहीं कर सकता. चाहे वो सच हो या नहीं. ऐसा इसलिए है क्योंकि एक बार जब कोई मामला सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा बन जाता है, तो निजता का अधिकार खत्म हो जाता है. और ये प्रेस और मीडिया द्वारा टिप्पणी के लिए एक वैध विषय बन जाता है.”

कोर्ट की अलग-अलग राय

हालांकि अलग-अलग मामलों में कई अदालतों ने अलग-अलग फैसले दिए हैं. उदाहरण के लिए- धर्मराज भानुशंकर दवे बनाम गुजरात राज्य (2017) मामले में, याचिकाकर्ता ने गुजरात हाई कोर्ट से एक हत्या और अपहरण मामले में अपने बरी होने की सूचना को हटाने के लिए कहा था. याचिकाकर्ता ने कहा था कि ऑस्ट्रेलियाई वीजा के लिए आवेदन करते समय बैकग्राउंट जांच के दौरान उन्हें इस सूचना के सार्वजनिक होने का पता चला था. अदालत ने याचिकाकर्ता को राहत देने से इनकार कर दिया था और कहा था कि अदालत के आदेशों को सार्वजनिक डोमेन में रखने की अनुमति है.

वहीं, कर्नाटक हाई कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में 2017 में कहा था कि ये सुनिश्चित किया जाए कि याचिकाकर्ता का नाम कहीं ना लिखा जाए. कोर्ट ने कहा था कि ये फैसला पश्चिमी देशों में चलन में है. वहां इसे नियम माना जाता है. खासकर, महिलाओं से जुड़े संवेदनशील मामले में.

2021 में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक मामले में एक याचिकार्ता के नाम को सर्च इंजन से हटाने का फैसला सुनाया था. अमेरिकी कानून के छात्र जोरावर सिंह मुंडी को नशीले पदार्थों से जुड़े एक मामले में बरी कर दिया गया था. कोर्ट ने कहा था कि अगर याचिकाकर्ता का नाम नहीं हटाया गया तो उसके सामाजिक जीवन और उसके करियर को नुकसान हो सकता है. हालांकि, कोर्ट ने ये भी कहा कि प्रैक्टिकल तौर पर ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ एक पेचीदा विषय है. जो अभी भारत में अनसुलझा है.

विदेश में क्या नियम है?

लक्जमबर्ग स्थित यूरोपीय संघ न्यायालय (CJEU), यूरोपीय संघ की कानून व्याख्या से संबंधित मामलों में सर्वोच्च न्यायालय है. मई 2014 में इस कोर्ट ने पुष्टि की थी कि ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ यूरोप में अस्तित्व में है. इस मामले को ‘Google Spain Case’ के नाम से जाना जाता है. न्यायालय ने स्पेनिश वकील मारियो कोस्टेजा गोंजालेज की याचिका पर फैसला सुनाया था. 1998 में एक कर्जे के कारण वकील की संपत्ति की जबरन बिक्री की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध थी. कोर्ट ने इस जानकारी को हटाने के लिए कहा था. CJEU ने फैसला सुनाया कि सर्च इंजन्स को ऐसे व्यक्तिगत अनुरोधों को पूरा करना होगा, जिनमें किसी अप्रासंगिक जानकारी को हटाने की मांग की गई हो.

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