
ये बात कई बार साबित हुई है कि अगर जेब में पैसा होने पर इंसान सेहत के नाम पर कुछ बेहतर करे न करे, मार्केट का गुलाम जरूर बन जाता है. इस रॉ वॉटर ट्रेंड का भी यही हाल है.
जानलेवा हो सकता है ये 'जिंदा पानी' स्वास्थ्य विशेषज्ञ कह रहे हैं कि इस कच्चे पानी से जान भी जा सकती है. ऐसा इसलिए कि ज्यादातर इंसानों को फिल्टर्ड पानी पीने की आदत हो गई है. अगर आप नदी-झरने का बिना फिल्टर किया पानी पिएं, तो उसमें घुले कई नए तरह के जीवाणु शरीर में घुसकर आपको कई तरह की बीमारियां दे सकते हैं. पुरानी-पुरानी बीमारियां, जैसी हमारी दादी-नानी और उससे भी पहली की पीढ़ी को हुआ करती होंगी. चूंकि हमारे शरीर के लिए वो जीवाणु अजनबी हैं, सो उनसे लड़ने की ताकत हमारे सिस्टम में नहीं है. मगर खरीददारों को ये समझदारी की बातें समझ नहीं आ रही हैं. सिलिकन वैली से शुरू होकर अब ये ट्रेंड और आगे पसरता जा रहा है. अमेरिका का सबसे बड़ा अखबार है न्यू यॉर्क टाइम्स. उसमें एक खबर छपी. उसने ये 'कच्चा पानी' बेचने वाली एक कंपनी लाइव वॉटर से बात की. जवाब में कंपनी के मालिक ने कहा:
नल का पानी? आप पीने का पानी नहीं पीते, बल्कि टॉइलट में इस्तेमाल होने वाला पानी पीते हैं. और उसमें गर्भनिरोधक दवाएं मिली रहती हैं. क्लोरामाइन, फ्लोराइड और भी जाने क्या-क्या. आप चाहें जो कहें, लेकिन ये दवाएं और केमिकल आपके दिमाग पर काबू कर लेती हैं.

ये Tourmaline Spring कंपनी द्वारा बेचा जा रहा रॉ वॉटर है. कई कंपनियां इसे 'लाइव वॉटर' के नाम से भी बेच रही हैं.
हर महंगी चीज अच्छी नहीं होती और पैसा खर्च करके सेहतमंद नहीं होते अब इसको पीकर इंसान सिर न पीटे तो क्या करे? दिमाग में इतनी साजिश भरी हो, तो आदमी को खुली आंखों से ही चांद पर चरखा कातती बुढ़िया भी दिख जाती है. खैर. ये कच्चा पानी कई वैरायटी का बिक रहा है. एक है झरने का शुद्ध पानी, जो बोतल में भरकर आता है. एक वैरायटी बड़ी दिलचस्प है. इसका नाम है- सोर्स. इसमें छत पर कोई मशीन लगाते हैं. ये मशीन पानी खींचती है. जमीन से नहीं, आस-पास के वातावरण से. इसको बेचने वाले कह रहे हैं कि पानी तो वातावरण से ही आता है. वो जो वाष्प की शक्ल में रहता है. तो ये मशीन उसी से पानी बनाती है. हर दिन बस 10 लीटर पानी. बस. इस मशीन की कीमत है करीब तीन लाख रुपये. बाकी जैसे लोग गैलन में पानी खरीदते हैं, वैसे ही बिक रहा है ये 'कच्चा' पानी. इस पानी को जल्द से जल्द खत्म करना होता है. क्योंकि एक महीने में ये खराब हो जाता है. इंसान की जेब में पैसा हो, तो ये कंपनियां उसे जो न बेच दें वो कम. और ये सच भी है कि जेब में पैसा रहने पर इंसान असल में सेहतमंद रहने के लिए कुछ करे न करे, सो फालतू चीजें खरीदकर हेल्दी रहने के जुगाड़ में जरूर लगा रहता है.
जैसे हमारे यहां RO जरूरत कम, स्टेटस सिंबल ज्यादा है हमारे भारत तो अभी लोग RO में ही जुटे हैं. जरूरत से कहीं ज्यादा लोगों का स्टेटस सिंबल तय होता है इससे. कई लोग ऐसे होते हैं. किसी के घर जाते हैं और पानी दिए जाने पर कहते हैं, RO का है न. अगर किसी के घर में साफ पानी का इंतजाम हो, मगर RO न लगा हो, तो रिश्तेदार भी मुंह बिचका लेते हैं. कइयों को नया पता चला कि RO सही नहीं रहता है, तो अब वो लोग RO फिल्टर हटाकर UV वाला फिल्टर लगवा रहे हैं. ये नया ट्रेंड है. शायद थोड़े दिनों में ये 'कच्चे पानी' का चोंचला अमेरिका की देखा-देखी हमारे यहां भी पहुंच जाएगा.
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