इस वक्त दुनिया के दो बेहद अहम तेल और ट्रेड समुद्री रास्तों पर तनाव चल रहा है- स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज और बाब अल-मंडेब. इसी बीच होती है चीन की एंट्री. साथ ही आई है एक अपील. यमन के हूती विद्रोहियों की बढ़ती सैन्य गतिविधियों को लेकर चीन ने ईरान से उन्हें काबू में करने के लिए कहा है.
परेशान सऊदी अरब भागकर चीन के पास पहुंचा, अब हूती-ईरान फंस जाएंगे?
पिछले करीब एक हफ्ते में हूतियों ने यमन के रेड सी कोस्ट और बाब अल-मंडेब के आसपास तेजी से कब्ज़ा किया है. सऊदी अरब के लिए चिंता और भी बड़ी है. हूतियों की बढ़ती मिलिट्री प्रजेंस से सऊदी के तेल एक्सपोर्ट और उसके आसपास के समुद्री रास्तों की सेफ़्टी पर खतरा बढ़ गया है.

रॉयटर्स की एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने ईरान से कहा है कि वो हूती विद्रोहियों पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करे और उन्हें विद्रोह करने से रोके. बताया गया कि सऊदी अरब ने हूतियों की बढ़ती गतिविधियों के बाद चीन से मदद मांगी थी. इसी के बाद चीन ने ईरान के सामने ये मुद्दा उठाया.
पूरा मामला क्या है?पिछले करीब एक हफ्ते में हूतियों ने यमन के रेड सी कोस्ट और बाब अल-मंडेब के आसपास तेजी से कब्ज़ा किया है. ये इलाका इसलिए बेहद अहम है क्योंकि बाब अल-मंडेब दुनिया के सबसे जरूरी मरीन चोकपॉइंट में से एक है. इसके जरिए जहाज रेड सी से गुजरते हैं और आगे सुएज कनाल के रास्ते यूरोप तक पहुंचते हैं. अगर इस रास्ते पर जहाजों को लगातार खतरा रहता है, तो इसका सीधा असर शिपिंग, तेल की सप्लाई और पूरी ग्लोबल सप्लाई चेन पर पड़ सकता है.
सऊदी अरब के लिए चिंता और भी बड़ी है. हूतियों की बढ़ती मिलिट्री प्रजेंस से सऊदी के तेल एक्सपोर्ट और उसके आसपास के समुद्री रास्तों की सेफ़्टी पर खतरा बढ़ सकता है. यही वजह है कि रियाद ने चीन का रुख किया.
चीन पहले से ईरान के साथ मजबूत आर्थिक और रणनीतिक रिश्ते रखता है. ऐसे में बीजिंग के पास तेहरान से बात करने की एक गुंजाइश है. चीन ने सार्वजनिक तौर पर अब तक संयम, बातचीत और सुरक्षित समुद्री आवाजाही बहाल करने की बात कही है. लेकिन पर्दे के पीछे उसका संदेश ज्यादा सीधा बताया जा रहा है.
चीन के विदेश मंत्रालय ने रॉयटर्स को दिए जवाब में कहा कि वो क्षेत्रीय तनाव को यमन और रेड सी तक फैलते हुए नहीं देखना चाहता. चीन ने सभी देशों की संप्रभुता और सुरक्षा का सम्मान करने की अपील की.
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चीन के लिए मामला ज़रूरी क्यों?ईरान चीन का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है और चीन ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार भी है. 2025 में ईरान के समुद्र के रास्ते होने वाले तेल निर्यात का 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा चीन ने खरीदा था. ऑन एवरेज ये करीब 14 लाख बैरल तेल प्रतिदिन था. यानी ईरान और मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव चीन की एनर्जी सिक्योरिटी को सीधे इफेक्ट कर सकता है.
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ पर्शियन गल्फ को अरेबियन-सी से जोड़ता है. वहीं बाब अल-मंदेब रेड सी को गल्फ ऑफ एडेन से जोड़ता है. दुनिया के एनर्जी ट्रेड के लिए दोनों रास्ते बेहद जरूरी हैं. अगर दोनों जगह लंबे समय तक तनाव बना रहता है, तो इसका असर मिडिल ईस्ट के साथ-साथ दुनिया के कई हिस्सों पर पड़ सकता है, क्योंकि तेल की कीमतें, शिपिंग कॉस्ट और महंगाई सब पर असर डालती हैं.
चीन पहले भी ईरान और सऊदी अरब के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा चुका है. 2023 में बीजिंग की मध्यस्थता के बाद दोनों देशों ने सालों की दुश्मनी के बाद अपने डिप्लोमेटिक रिश्ते फिर से ठीक किए थे. लेकिन इस बार मामला थोड़ा पेचीदा है.
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