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पेट्रोल पंप और सपेरा? मोदी पर घिनौने कार्टून से भारत का अपमान, यही है नॉर्वे की 'प्रेस फ्रीडम'?

PM Modi Cartoon: पीएम मोदी की हालिया नार्वे यात्रा काफी चर्चा में रही थी. इस दौरान पीएम मोदी के एक कार्टून ने काफी सुर्खियां भी बटोरी थीं. क्या वाकई में इसे अभिव्यक्ति की आजादी माना जाना चाहिए?

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PM Modi पर नार्वे में छपा घिनौना कार्टून, यही है उनकी प्रेस फ्रीडम?

कार्टून का काम होता है लोगों को हंसाना, खासकर राजनीतिक कार्टून अक्सर थोड़े मज़ाक और तंज के ज़रिए आज की सच्चाई दिखाने की कोशिश करते हैं. लेकिन क्या हो जब किसी कार्टून को देखकर लोगों को हंसी नहीं, बल्कि गुस्सा आए? क्या हो जब मजाक और व्यंग्य के नाम पर किसी देश की पुरानी और नस्लवादी छवि दोबारा परोसी जाने लगे? कुछ ऐसा ही देखने को मिला है PM मोदी के नॉर्वे दौरे के वक़्त.

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नॉर्वे के बड़े अखबार Aftenposten ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक कार्टून छापा. इस कार्टून में मोदी को एक सपेरे की तरह दिखाया गया. फर्क सिर्फ इतना था कि उनके हाथ में बीन की जगह पेट्रोल पंप की पाइप थी, जिसे सांप की तरह दिखाया गया था. ये कार्टून एक लेख के साथ छपा, जिसकी हेडलाइन थी, ‘A clever and slightly annoying man’, मानें “एक चालाक लेकिन परेशान करने वाला आदमी.”

सवाल सिर्फ एक कार्टून का नहीं है. सवाल ये है कि आखिर दुनिया का एक हिस्सा भारत को देखता कैसे है? क्या वो भारत को Chandrayaan-3 वाले देश की तरह देखता है? उस देश की तरह जिसने चांद के साउथ पोल पर पहुंचकर इतिहास बनाया? उस देश की तरह जिसने दुनिया को सबसे सस्ता Mars Mission दिया? या फिर वह अब भी भारत को उसी पुराने औपनिवेशक चश्मे से देखा जाता है जहां भारत का मतलब था सपेरे, सांप, भीड़ और गरीबी?

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यही वजह है कि इस कार्टून की वजह से भारतीय में गुस्सा है. लोगों ने कहा कि ये कोई मज़ाक नहीं, बल्कि वही पुराना नस्लवादी स्टीरियोटाइप है, जिसे पश्चिम बार-बार दोहराता रहता है. पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने X पर एक पोस्ट में लिखा-

“एक बेहद परेशान करने वाला कार्टून” है, जिसे ऐसे आत्मसंतुष्ट देश ने छापा है जिसकी आबादी सिर्फ़ 56 लाख है और जिसे न तो किसी बड़ी सभ्यता की गहराई का अनुभव है, न ही 140 करोड़ लोगों वाले जटिल और विविध समाज को संभालने की समझ. भारत को “सांप सपेरे” की छवि में दिखाना सिर्फ अपमानजनक नहीं, बल्कि साफ तौर पर नस्लवादी सोच को दिखाता है. भारत को नॉर्वे के तेल की कोई ज़रूरत नहीं है. भारत के आसपास ही कई बड़े तेल उत्पादक देश मौजूद हैं. भारत को किसी को “सांप की तरह वश में” करने की ज़रूरत भी नहीं, क्योंकि भारत खुद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तेल आयातक और एक बहुत बड़ा बाज़ार है.”

दिलचस्प बात ये रही कि इस कार्टून की आलोचना सिर्फ भारत में नहीं हुई. अमेरिकी कमेंटेटर कार्ल व्हेलेस ने भी इसे “औपनिवेशिक दौर का नस्लवाद” बताया. उन्होंने कहा कि भारत की बढ़ती ताक़त कुछ लोगों को हज़म नहीं हो रही, इसलिए वे अब भी वही पुराने स्टीरियोटाइप निकाल लेते हैं. लेकिन देखा जाए, तो ये कोई नई बात नहीं है. भारत जैसे-जैसे विज्ञान, तकनीक और अंतरिक्ष की दुनिया में आगे बढ़ा है, वैसे-वैसे कुछ पश्चिमी कार्टूनिस्टों की कल्पना भी और अजीब होती गई है.

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2024 में अमेरिका में ऐसा ही एक कार्टून वायरल हुआ था. मामला बाल्टिमोर ब्रिज हादसे का था.  तब डाली नाम का कंटेनर जहाज़ पुल से टकरा गया था. उस जहाज़ पर भारतीय क्रू मौजूद था. हादसे से ठीक पहले उन्हीं भारतीय कर्मचारियों ने मेडे कॉल भेजकर अधिकारियों को चेतावनी दी थी, जिससे कई लोगों की जान बच गई. यानी जिन भारतीयों ने संकट टालने में मदद की, उन्हीं को बाद में नस्लवादी तरीके से दिखाया गया.

अमेरिकी वेब कॉमिक फॉक्सफोर्ड कॉमिक्स ने एक कार्टून पोस्ट किया था, जिसमें कुछ लोगों को सिर्फ लंगोट पहने जहाज़ के अंदर घबराते हुए दिखाया गया था. तब सोशल मीडिया पर लोगों ने पूछा था कि क्या यही तरीका है भारतीयों को दिखाने का?

इससे पहले 2023 में जर्मन मैगजीन Der Spiegel ने एक कार्टून छापा था. उस समय भारत दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बना था. कार्टून में एक तरफ चीन की चमचमाती बुलेट ट्रेन दिखाई गई और दूसरी तरफ भारत की भीड़ से भरी ट्रेन, जिसकी छत पर लोग बैठे थे. मानो यह दिखाया जा रहा हो कि चीन भविष्य है और भारत अब भी पुरानी दुनिया में फंसा हुआ है. 
तब केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने जवाब दिया था, “कुछ सालों में भारत की अर्थव्यवस्था जर्मनी से बड़ी होगी.” सूचना मंत्रालय के सलाहकार कंचन गुप्ता ने इस कार्टून को खुलेआम नस्लवादी बताया था.  

लेकिन शायद सबसे दिलचस्प उदाहरण 2014 का है. भारत ने पहली ही कोशिश में मंगल ग्रह की कक्षा में अपना यान पहुंचा दिया था. दुनिया के कई बड़े देश जहां बार-बार असफल हुए, वहां भारत ने बेहद कम बजट में मार्स मिशन सफल कर दिया. यह विज्ञान और अंतरिक्ष तकनीक की दुनिया में ऐतिहासिक उपलब्धि थी.

लेकिन New York Times ने इस उपलब्धि को दिखाने के लिए जो कार्टून छापा, उसमें एक किसान और गाय को एलीट स्पेस क्लब के दरवाज़े पर दस्तक देते दिखाया गया. यानी संदेश यह था कि ‘गांव वाला भारत’ अब स्पेस क्लब में घुस गया है. सोचिए, जिस देश ने Mars Orbiter Mission सफल किया, जो दर्जनों देशों के सैटेलाइट लॉन्च करता है, जो दुनिया के सबसे सस्ते स्पेस मिशन चलाता है, उसे अब भी कुछ लोग गाय और किसान वाले स्टीरियोटाइप से देखते हैं.

विरोध इतना बढ़ा कि द न्यूयॉर्क टाइम्स को माफी मांगनी पड़ी थी. अखबार के एडिटोरियल पेज एडिटर एंड्र्यू रोसेंथल ने कहा था कि कार्टूनिस्ट का मकसद भारत का अपमान करना नहीं था. उनका कहना था कि वह सिर्फ यह दिखाना चाहते थे कि अब स्पेस रिसर्च सिर्फ अमीर पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं रही.

लेकिन सवाल फिर वही आता है, अगर भारत, अमेरिका या यूरोप जैसा पश्चिमी देश होता, तब भी क्या उसे ऐसे ही दिखाया जाता? 2022 में स्पेन के अखबार La Vanguardia ने भारत की अर्थव्यवस्था पर रिपोर्ट छापी थी. हेडलाइन थी, “भारतीय अर्थव्यवस्था का समय.” लेकिन साथ में फिर वही सपेरे का कार्टून. यानी भारत अगर दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था भी बन जाए, तब भी कुछ लोगों की नज़र में भारत की पहचान वही “सांप वाला देश” रहेगी.

Zerodha के CEO नितिन कामथ ने इसे भारत का अपमान बताया था. लेखक रजत सेठी ने कहा था कि दुनिया भारत की आर्थिक ताकत को मान रही है, लेकिन भारत को “सपेरों का देश” दिखाने की आदत अब भी खत्म नहीं हुई.

नॉर्वे ऐसे तो खुद को प्रेस फ्रीडम के मामले में दुनिया का नंबर वन देश बताते हुए सीना चौड़ा करता है, लेकिन वही पत्रकार, पत्रकारिता, क्रिएटिवटी और स्टीरियोटाइप के बीच की लाइन भूल जाते हैं. भारत की प्रेस आज़ादी और यहां के प्रधानमंत्री पर सवाल उठाते-उठाते वो ये भूल जाते हैं कि लाइन कहां खींचनी है.

ये सिर्फ़ एक कार्टून की कहानी नहीं है. यह उस मानसिकता की कहानी है, जो भारत को बदलते हुए देख तो रही है, लेकिन स्वीकार नहीं कर पा रही. आज का भारत वह नहीं है, जिसे कभी “तीसरी दुनिया” कहकर देखा जाता था. आज भारत चांद पर उतरता है. मंगल तक पहुंचता है. दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल पेमेंट सिस्टम चलाता है. दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीन ड्राइव करता है और AI से लेकर स्पेस टेक्नोलॉजी तक अपनी जगह बना रहा है. भारत आज सितारों को छू रहा है, पर पश्चिम की नज़रें आज भी सांपों की पुरानी रस्सियों में ही उलझी हैं.

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