कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी EPFO ने दशकों पुराने 1952 के नियमों को अलविदा कहकर नया 'EPF Scheme 2026' लागू कर दिया है. इन नये बदलावों के बाद सैलरीड क्लास के लिए क्या बदला है, पेंशन सेटलमेंट में देरी पर अधिकारियों पर शिकंजा कैसे कसेगा और कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों के लिए क्या नए नियम आए हैं. इन सारे सवालों का जवाब एक-एक करके जानते हैं.
बदल गया PF का कानून! 'EPF स्कीम 2026' के बड़े बदलाव, आपकी सैलरी, निकासी और पेंशन पर सीधा असर
PF Rules Changed: श्रम मंत्रालय ने नया EPF Scheme 2026 लागू कर दिया है. जानिए पीएफ निकासी, पेंशन सेटलमेंट और कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों के लिए क्या नए नियम आए हैं.

EPF के नए बदलाव
श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने नए लेबर कोड यानी Code on Social Security के तहत ऐतिहासिक कदम उठाते हुए 'कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 2026' यानी EPF Scheme 2026 को आधिकारिक तौर पर लागू कर दिया है. चूंकि ये बदलाव इसी जुलाई महीने से पूरी तरह प्रभाव में आया है और देश के करोड़ों नौकरीपेशा लोगों के पीएफ, पेंशन तथा डिजिटल क्लेम से जुड़ा है, इसलिए इसकी जमीनी और कानूनी पड़ताल करना बेहद जरूरी हो गया है.
74 साल पुराना कानून बदला
इस पूरे बदलाव में सबसे खास बात ये है कि 74 साल पुराना कानून बदल चुका है. साल 1952 के बाद ये पहली बार है जब पीएफ के पूरे प्रशासनिक और कानूनी ढांचे को नए सिरे से समेकित और आधुनिक डिजिटल युग के अनुरूप ढाला गया है. इसके अलावा लापरवाह अधिकारियों पर सीधा एक्शन लेने का प्रावधान किया गया है.
पीआईबी की अधिसूचना के मुताबिक नए नियमों में पेंशन क्लेम में देरी पर अधिकारियों की जवाबदेही तय की गई है कि अगर बिना वैध कारण देरी हुई, तो अधिकारी की सैलरी से 12 प्रतिशत ब्याज वसूला जाएगा. साथ ही कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों के लिए पहली बार 'प्रिंसिपल एम्प्लॉयर' यानी मुख्य नियोक्ता के कॉन्सेप्ट को स्पष्ट किया गया है, जिससे ठेकेदारों के अधीन काम करने वाले लाखों कर्मचारियों का पीएफ हक सुरक्षित हो सके.
क्या बदला और क्या नहीं
अब बात करते हैं कि इस नए बदलाव में क्या बदला और क्या पुराना रहा. ‘इकोनॉमिक टाइम्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक कर्मचारियों और नियोक्ताओं का योगदान यानी 12 प्रतिशत कर्मचारी और 12 प्रतिशत नियोक्ता का शेयर और वैधानिक वेतन सीमा जो कि 15,000 रुपये है, वो पहले जैसी ही है. बदलाव मुख्य रूप से डिजिटल अनुपालन यानी डिजिटल कंप्लायंस, तेज सेवाओं और पारदर्शी गवर्नेंस को लेकर है ताकि कागजी कार्रवाई का झंझट खत्म हो सके.
‘मनी कंट्रोल’ के मुताबिक निकासी यानी विड्रॉल और एडवांस के नियमों में भी बड़ी स्पष्टता आई है. बीमारी, बच्चों की शिक्षा या शादी जैसे विशेष मौकों पर फंड निकासी के नियमों को नए ढांचे में और अधिक व्यवस्थित किया गया है. बेरोजगारी के मामलों में पूरे पैसे निकालने के प्रावधानों को भी बहुत सुव्यवस्थित किया गया है ताकि नौकरी जाने के मुश्किल वक्त में किसी भी कर्मचारी को दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें और पैसा सीधे बैंक खाते में पहुंचे.
पेंशन के नियम भी बदले
पेंशनभोगियों के लिए इस कानून में बहुत बड़ी राहत और सख्त टाइमलाइन तय की गई है. ‘मीडिया रिपोर्ट्स’ के मुताबिक ईपीएस यानी कर्मचारी पेंशन योजना के तहत अब पूरी तरह से भरे हुए पेंशन क्लेम को 20 दिनों के भीतर निपटाना अनिवार्य कर दिया गया है. अगर बिना किसी ठोस वजह के देरी होती है, तो संबंधित EPFO अधिकारी पर जुर्माने का प्रावधान पहली बार जोड़ा गया है, जिससे सालों से लंबित रहने वाले मामलों में तेजी आएगी.
‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ के मुताबिक कॉन्ट्रैक्ट और असंगठित क्षेत्र से जुड़े वर्कर एंगल पर भी इस कानून ने कड़ा प्रहार किया है. बड़ी कंपनियों और छोटे ठेकेदारों के बीच पिसने वाले लाखों अनुबंधित कर्मचारियों के लिए ये नया कानून एक मजबूत सुरक्षा चक्र मुहैया कराता है, क्योंकि अब मुख्य कंपनी यानी प्रिंसिपल एम्प्लॉयर की कानूनी जिम्मेदारी तय कर दी गई है कि अगर ठेकेदार पीएफ जमा नहीं करता, तो मुख्य कंपनी को भुगतान करना होगा.
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अंत में एमनेस्टी स्कीम 2026 का नया पेंच भी समझना जरूरी है. ‘लाइव मिंट’ की रिपोर्ट के मुताबिक उन कंपनियों और प्राइवेट ट्रस्टों के लिए सरकार द्वारा 6 महीने की विशेष माफी योजना यानी एमनेस्टी स्कीम लाई गई है, जो दशकों से कानून के दायरे में तो थीं लेकिन EPFO के नियमों के तहत औपचारिक छूट यानी एक्जेम्पशन नहीं पा सकी थीं. इस योजना के जरिए वे बिना किसी पेनाल्टी के खुद को नए सिस्टम में ढाल सकती हैं.
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