दुनिया के किसी एक हिस्से में मची उथल-पुथल सिर्फ उसी जगह तक सीमित नहीं रहती. उसका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है. मसलन, गाजा में इजरायल की बमबारी अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध में तब्दील हो गई. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद हो गया, जिसने तेल-गैस की ग्लोबल सप्लाई की कमर तोड़ दी. अब पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुए डिफेंस पैक्ट का दायरा भी केवल सुरक्षा कवच तक सीमित नहीं रहेगा. इसके युद्ध से इतर भी नतीजे निकलेंगे, जिनमें एक आर्थिक असर भी है. हथियारों की बिक्री से फलने-फूलने वाली इकोनॉमी भी है. अमेरिका, फ्रांस, इजरायल और चीन जैसों देशों के लिए उनके हथियारों की बिक्री बहुत मायने रखती है.
पाकिस्तान, सऊदी और तुर्की की डिफेंस डील कैसे अमेरिका-इजरायल का तगड़ा नुकसान कराएगी?
Islamic NATO: दुनिया भर में सैन्य हथियारों की बिक्री करने वाले अमेरिका, फ्रांस और इजरायल जैसे देशों के लिए पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की की डिफेंस डील संकट पैदा कर सकती है. इसके युद्ध से इतर नतीजे निकलेंगे, जिनमें सबसे बड़ा असर आर्थिक मोर्चे पर हो सकता है.

पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की का रक्षा समझौता इसी ग्लोबल डिफेंस बाजार को बड़ा डेंट लगा सकता है. सबसे बड़ा खतरा अमेरिका, फ्रांस और इजरायल जैसे बड़े डिफेंस एक्सपोर्टर्स के लिए है. वहीं, तुर्की और चीन के पास फायदा उठाने का पूरा मौका रहेगा.
तीनों मुस्लिम देशों के डिफेंसिव गठजोड़ को 'इस्लामिक नाटो' का नाम दिया जा रहा है. माने, इस्लामी दुनिया का 'नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन' (NATO) टाइप सैन्य संगठन. NATO के आर्टिकल 5 (अनुच्छेद 5) के तहत अगर नाटो के किसी भी एक सदस्य देश पर सशस्त्र हमला होता है, तो उसे संगठन के सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाता है.
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के डिफेंस पैक्ट में भी आर्टिकल 5 जैसा ही सिद्धांत है. तीनों में से किसी एक देश पर सैन्य हमला हुआ, तो तीनों देशों पर हमला माना जाएगा. इसकी तफ्सील किसी और दिन. ये संगठन बना तो युद्ध जैसे संकट से बचने के लिए है. लेकिन, 'शांति के समय' यानी जंग ना होने के हालात में भी ये कथित 'इस्लामिक नाटो' कई देशों के लिए चिंता का सबब बन सकता है.
अमेरिका से फ्रांस तक क्यों टेंशन?दुनिया भर में सैन्य हथियारों की बिक्री करने वाले अमेरिका, फ्रांस और इजरायल जैसे देशों के लिए तीनों देशों का गठजोड़ संकट पैदा कर सकता है. अमेरिका के 'मिडिल ईस्ट फोरम' के इमरान खुर्शीद ने पिछले महीने एक एनालिसिस में लिखा,
"चीन, पाकिस्तान का इस्तेमाल हथियारों को बढ़ावा देने और इस इलाके के डिफेंस सेक्टर में एंट्री करने के लिए एक गेटवे के तौर पर कर रहा है... इसके अलावा, अगर पाकिस्तान और तुर्की समेत कई देशों के बीच चर्चा में चल रहा संभावित 'इस्लामिक नाटो' हकीकत का रूप लेता है, तो चीन को लग सकता है कि उसे एक बड़ा मार्केट मिल गया है."
इमरान खुर्शीद ने आगे कहा कि चीन ने खाड़ी में अपने हथियारों के सिस्टम का जोर-शोर से प्रचार किया है. चीन ने अपने डिफेंस सिस्टम के बारे में नैरेटिव गढ़े हैं. इसमें पिछले साल 'ऑपरेशन सिंदूर' में भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान JF-17 फाइटर जेट और दूसरे चीनी हथियारों की कामयाबी के दावे भी शामिल हैं.
पाकिस्तान के कंधे पर बंदूक रखकर चीन सीना ठोककर दावा कर सकता है कि चीनी हथियार और प्लेन ऑलरेडी टेस्टेड हैं. असल जंग में चीनी हथियारों से निर्णायक नतीजे मिल चुके हैं. पाकिस्तान, भारत के खिलाफ सैन्य संघर्ष में उन्हें इस्तेमाल कर चुका है.

पाकिस्तान ने भी बार-बार दावा किया कि चीन निर्मित J-10 फाइटर जेट (Chengdu J-10C) और PL-15 मिसाइल से उसने इंडियन एयर फोर्स के फ्रांस मेड Rafale फाइटर जेट मार गिराए. भारत आधिकारिक तौर पर इन दावों का कई बार खारिज कर चुका है.

अमेरिका से लेकर फ्रांस तक के आर्म्स एक्सपोर्ट्स की टेंशन, इन तीनों देशों की अपनी खासियत भी है. जैसे-
पाकिस्तान - पाकिस्तान के पास बड़ी आर्मी है और दुनिया का इकलौता न्यूक्लियर पावर वाला मुस्लिम देश है. वो बड़े पैमाने पर सैन्य हथियार खरीदता है. भारत, अफगानिस्तान, ईरान के अलावा अंदरूनी बलूचिस्तान में झड़पों से दुनिया उसकी मिलिट्री कैपेबिलिटीज को आंकती है.
सऊदी अरब - हथियार खरीदने के लिए पैसा चाहिए. सऊदी अरब के पास पैसे की कोई कमी नहीं है. सऊदी केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरे साथी देशों और हथियारबंद ग्रुप्स के लिए भी पर्दे के पीछे से बड़े पैमाने पर हथियार खरीदता है. अगर सऊदी की चीन और तुर्की के हथियारों पर नजर इनयात हुई, तो अमेरिका जैसे देश नुकसान में रहेंगे.
तुर्की - तुर्की के पास भी ताकतवर आर्मी है. उसकी एडवांस और सस्ती डिफेंस टेक्नोलॉजी जगजाहिर है. तुर्की मेड Bayraktar TB2 और Akıncı ड्रोन को कई देश खरीदते हैं.

कभी विदेशी हथियार बनाने वाली कंपनियों पर बहुत ज्यादा निर्भर रहने वाला तुर्की अब लगभग 40 देशों को हथियार सप्लाई करता है. इजरायली अखबार द जेरूशल पोस्ट की खबर के मुताबिक, टर्किश आर्म्स के खरीदारों में खाड़ी, अफ्रीका, एशिया और यूरोप के कई देश शामिल हैं.
तुर्की के हथियार क्यों फायदेमंद?कई खरीदार देश तुर्की के इन हथियारों को दूसरे ऑप्शंस की तुलना में सस्ता, जल्दी मिलने वाला और ज्यादा आसानी से इस्तेमाल में लाया जा सकने वाला मानते हैं. अगर दुनिया में चीन और तुर्की के हथियारों की खपत बढ़ी, तो शॉर्ट-टर्म के साथ-साथ लॉन्ग-टर्म में भी अमेरिकी-यूरोप डिफेंस एक्सपोर्टर्स के लिए नुकसान साबित होगा.
इमरान खुर्शीद का कहना है कि हथियारों की खरीदारी के समझौतों से लंबे समय तक चलने वाली पार्टनरशिप भी बनती है. क्योंकि इनमें “आमतौर पर रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स, ट्रेनिंग और लॉजिस्टिकल सपोर्ट से जुड़े लंबे समय के कमिटमेंट शामिल होते हैं.” इससे चीनी सिस्टम यूज करने वाले देशों की मिलिट्री में उसकी जड़ें और मजबूत होती जाएंगी. तुर्की के लिए भी यही रुख अपनाया जा सकता है.
अटलांटिक काउंसिल में साउथ एशिया मामलों के सीनियर फेलो माइकल कुगेलमैन का रुख थोड़ा अलग है. चीनी अखबार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, माइकल कुगेलमैन ने बताया कि डिफेंस पैक्ट पर साइन करने वाले तीनों देशों ने "इस बात का खास ध्यान रखा है कि इसे NATO-जैसे गठबंधन के तौर पर ना दिखाया जाए".
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माइकल कुगेलमैन ने कहा कि गठजोड़ में शामिल देश खुद को चीनी हथियार खरीदने के लिए जोश के साथ अपने रिसोर्स खपाने वाले नहीं दिखाना चाहते. उन्होंने कहा,
"इसलिए, ऐसे सौदे चुपचाप और कम मात्रा में किए जाएंगे... तुर्की शायद पाकिस्तान और सऊदी अरब को वही चीजें बेहतर कीमत पर दे सकता है जो चीन दे सकता है."
पाकिस्तान के साथ चीन के करीबी रिश्ते और वेस्ट एशिया में उसकी बड़ी स्ट्रेटेजिक इच्छाओं का मेल बीजिंग को खाड़ी देशों के रक्षा ढांचे में घुसने का एक इनडायरेक्ट रास्ता जरूर दे सकता है. जो अमेरिका, फ्रांस और इजरायल जैसे देशों की कीमत पर होगा.
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