पंजाब की सियासत में कुछ रिश्ते सिर्फ चुनावी गठबंधन नहीं होते. उनके पीछे जातीय, धार्मिक, क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरणों की पूरी कहानी होती है. अकाली दल और बीजेपी का रिश्ता भी कुछ ऐसा ही रहा है. एक तरफ शिरोमणि अकाली दल का मजबूत ग्रामीण और सिख वोट आधार था, तो दूसरी तरफ बीजेपी की पकड़ पंजाब के शहरी और खासकर हिंदू मतदाताओं के बीच थी. दोनों साथ आते थे तो एक ऐसा चुनावी समीकरण बनता था, जिसने करीब दो दशक तक पंजाब की सत्ता की दिशा तय की.
पंजाब में फिर से हाथ मिलाएंगे अकाली दल और बीजेपी? 1996 से अब तक की 'यारी-तकरार' का पूरा इतिहास
Punjab SAD BJP alliance: पंजाब में अकाली दल और बीजेपी का गठबंधन एक बार फिर चर्चा में है. 1996 के मोगा घोषणा पत्र से शुरू हुए इस राजनीतिक रिश्ते ने 2007 और 2012 में सत्ता दिलाई, लेकिन 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर दोनों दल अलग हो गए. लेकिन परिसीमन के मुद्दे पर दोनों दलों की नजदीकियां कई संभावनाओं की तरफ इशारा करती हैं.

लेकिन 2020 में कृषि कानूनों को लेकर दोनों दलों के बीच ऐसा टकराव हुआ कि दशकों पुराना रिश्ता टूट गया. अकाली दल ने एनडीए छोड़ दिया और पंजाब की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हो गया. सवाल अब ये है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले क्या पुरानी दोस्ती की कोई नई शुरुआत हो सकती है?
मौजूदा घटनाक्रम इस सवाल को फिर से चर्चा में ले आया है. जून 2026 में बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन ने पंजाब दौरे के दौरान साफ किया था कि फिलहाल पार्टी सभी 117 विधानसभा सीटों पर संगठन मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रही है. साथ ही उन्होंने गठबंधन पर फैसला चुनाव के करीब परिस्थितियों का आकलन करने के बाद करने की बात कही थी. यानी दरवाजा पूरी तरह बंद भी नहीं किया गया था.
1996 में बना वो फॉर्मूला जिसने पंजाब की राजनीति बदल दी
अकाली दल और बीजेपी के रिश्ते को समझने के लिए 1996 के मोगा घोषणा पत्र को समझना जरूरी है. अकाली दल ने मोगा में अपनी राजनीति को सिर्फ सिख पहचान तक सीमित रखने के बजाय पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत की व्यापक राजनीति के तौर पर पेश करने की कोशिश की. इसी दौर में अकाली दल और बीजेपी का चुनावी गठबंधन मजबूत हुआ.
इस गठबंधन की सबसे बड़ी ताकत यही थी कि दोनों पार्टियां एक दूसरे के खाली हिस्से को भरती थीं. अकाली दल ग्रामीण पंजाब, किसान राजनीति और सिख मतदाताओं के बीच मजबूत था. बीजेपी के पास शहरों में व्यापारियों, मध्यम वर्ग और हिंदू मतदाताओं का अपना आधार था.
यानी चुनावी गणित कुछ ऐसा था कि अकाली दल गांवों में मजबूत था और बीजेपी शहरों में. अकाली दल सिख वोट को साथ लाता था तो बीजेपी हिंदू वोटों का एक हिस्सा गठबंधन की तरफ खींचती थी. ये सिर्फ सीटों का बंटवारा नहीं था, बल्कि पंजाब की सामाजिक संरचना के हिसाब से तैयार किया गया चुनावी मॉडल था.
1997 के विधानसभा चुनाव में इस गठबंधन को बड़ी सफलता मिली. अकाली दल ने 75 सीटें और बीजेपी ने 18 सीटें जीतीं. गठबंधन की कुल सीटें 93 रहीं. अलग-अलग स्रोतों में गठबंधन के घटक और सहयोगियों को लेकर आंकड़ों की प्रस्तुति में थोड़ा अंतर मिलता है, लेकिन चुनाव में SAD और BJP की संयुक्त ताकत ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने में निर्णायक भूमिका निभाई.
2007 से 2012 तक आया गठबंधन का स्वर्ण काल
अगर अकाली दल और बीजेपी के रिश्ते का सबसे सफल दौर तलाशना हो तो 2007 से 2012 का समय सबसे ऊपर आएगा. 2007 में SAD ने 48 सीटें और बीजेपी ने 19 सीटें जीतीं. दोनों की संयुक्त संख्या 67 रही और गठबंधन ने सरकार बनाई.
पांच साल बाद 2012 में कहानी और दिलचस्प हो गई. SAD ने 56 सीटें जीतीं और बीजेपी ने 12 सीटें. दोनों मिलकर 68 सीटों तक पहुंचे. कांग्रेस 46 सीटों पर रुक गई. इस जीत के साथ अकाली बीजेपी गठबंधन ने पंजाब की राजनीति में एक बड़ा रिकॉर्ड बनाया, क्योंकि 1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद पहली बार कोई सत्तारूढ़ दल या गठबंधन लगातार दूसरी बार सत्ता में लौटा था.
यहीं से इस गठबंधन की ताकत समझ आती है. अकाली दल अकेले ग्रामीण और सिख वोटों पर निर्भर था और बीजेपी अकेले पूरे पंजाब में विस्तार करने की स्थिति में नहीं थी. लेकिन दोनों साथ थे तो एक तरफ पंजाब की क्षेत्रीय पहचान और दूसरी तरफ बीजेपी की शहरी पकड़, दोनों एक मंच पर दिखाई देती थीं.
लेकिन राजनीति में कोई भी गठबंधन हमेशा के लिए नहीं चलता. 2017 आते आते तस्वीर बदल चुकी थी. दस साल की सरकार के बाद सत्ता विरोधी माहौल, ड्रग्स का मुद्दा, धार्मिक भावनाओं से जुड़े विवाद और सरकार के खिलाफ बढ़ती नाराजगी ने गठबंधन को कमजोर किया. 2017 के चुनाव में कांग्रेस 77 सीटों के साथ सत्ता में लौटी, जबकि SAD 15 और बीजेपी 3 सीटों पर सिमट गईं.
यानी जिस गठबंधन ने कभी 67 और 68 सीटों के साथ सरकार बनाई थी, वो विपक्ष में भी कमजोर हो चुका था.
2020 में कृषि कानूनों ने तोड़ दिया दशकों पुराना रिश्ता
फिर आया 2020. केंद्र सरकार के कृषि कानून पंजाब की राजनीति के लिए सिर्फ एक नीतिगत मुद्दा नहीं रहे. पंजाब में किसान आंदोलन ने राजनीतिक माहौल पूरी तरह बदल दिया.
अकाली दल की नेता हरसिमरत कौर बादल पहले ही केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे चुकी थीं. इसके बाद 26 सितंबर 2020 को SAD ने बीजेपी नेतृत्व वाले एनडीए से अलग होने का फैसला कर लिया. इंडियन एक्सप्रेस ने उस समय रिपोर्ट किया था कि अकाली दल का ये फैसला कृषि कानूनों को लेकर पंजाब में चल रहे किसान विरोध के बीच आया था.
इसके साथ बीजेपी और अकाली दल के बीच दशकों पुराना गठबंधन औपचारिक रूप से खत्म हो गया. इसके बाद दोनों पार्टियों ने पंजाब में अलग अलग रास्ता अपनाया.
2022 में इसका असर साफ दिखा. विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 92 सीटें जीतकर सरकार बनाई. कांग्रेस को 18, SAD को 3 और बीजेपी को 2 सीटें मिलीं. यानी कभी सत्ता की धुरी रहे दोनों दल अलग अलग लड़कर विधानसभा में बेहद कमजोर स्थिति में पहुंच गए.
अब फिर क्यों उठ रही है गठबंधन की चर्चा?
यहीं से 2026 की कहानी शुरू होती है. बीजेपी अब पंजाब में खुद को सिर्फ सहयोगी दल की भूमिका तक सीमित नहीं रखना चाहती. पार्टी ने संगठन को सभी 117 विधानसभा सीटों पर मजबूत करने की रणनीति बनाई है. नितिन नबीन ने जून में पंजाब दौरे के दौरान नेताओं से गठबंधन पर सार्वजनिक बयानबाजी से बचने और संगठन को मजबूत करने को कहा था.
लेकिन दूसरी तरफ राजनीति में विकल्प खुले रखना भी रणनीति का हिस्सा होता है. नबीन ने खुद कहा कि गठबंधन पर फैसला बाद में परिस्थितियों का आकलन करके किया जाएगा. इसलिए अभी ये कहना कि बीजेपी और अकाली दल फिर साथ आ गए हैं, गलत होगा. लेकिन ये कहना भी सही नहीं होगा कि दोनों के बीच संभावित बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद है.
लल्लनटॉप के राजनीतिक संपादक पंकज झा भी इसी पेचीदगी की तरफ इशारा करते हैं. उनके मुताबिक,
सूत्रों की मानें तो पिछले दिनों बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की पंजाब यात्रा के दौरान पंजाब भाजपा के कुछ बड़े नेताओं ने मुलाकात करके अनुरोध किया था कि आगामी विधानसभा चुनावों में पार्टी को अकालियों के साथ गठबंधन करना चाहिए. अब परिसीमन के मुद्दे पर अकाली दल का एनडीए को समर्थन देना ये इशारा करता है कि किसी भी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता.
यहां एक सावधानी जरूरी है. परिसीमन पर SAD का मौजूदा रुख भी अप्रैल की तुलना में बदला है. अप्रैल में सुखबीर सिंह बादल ने प्रस्तावित जनसंख्या आधारित परिसीमन को पंजाब के लिए नुकसानदेह बताते हुए इसका विरोध किया था. लेकिन 8 अगस्त 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के एक दिन बाद SAD ने महिला आरक्षण के तत्काल क्रियान्वयन और "fair and equitable" परिसीमन का समर्थन किया. ये राजनीतिक बदलाव निश्चित तौर पर बीजेपी और SAD के बीच संवाद की संभावना को लेकर चर्चा बढ़ाता है, हालांकि इसे चुनावी गठबंधन की घोषणा नहीं माना जा सकता.
पंकज झा फिलहाल तुरंत गठबंधन की संभावना को लेकर बहुत आशावादी नहीं हैं. वो कहते हैं,
1996 से भाजपा और अकालियों का साथ रहा है. बीच बीच में दूरियां आईं जरूर मगर इतिहास गवाह है कि दूरियां मिटी भी हैं. वैसे भी सियासत में सब मुमकिन है.
दोनों साथ आए तो किसे क्या मिलेगा?
बीजेपी के लिए अकाली दल के साथ लौटने का सबसे बड़ा फायदा पंजाब के ग्रामीण और सिख वोटरों तक पहुंच हो सकता है. बीजेपी ने पिछले कुछ वर्षों में अपना संगठन विस्तार जरूर किया है, लेकिन अकाली दल के पास पंजाब की ग्रामीण राजनीति का जो पुराना नेटवर्क रहा है, उसे तुरंत दोहराना आसान नहीं है.
दूसरी तरफ अकाली दल के लिए बीजेपी के साथ गठबंधन का मतलब केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी के साथ राजनीतिक तालमेल और हिंदू शहरी वोटों तक दोबारा पहुंच हो सकता है. अकेले चुनाव लड़ने पर SAD को अपने पुराने वोट आधार को दोबारा मजबूत करना होगा.
लेकिन समस्या भी उतनी ही बड़ी है. 2020 के किसान आंदोलन की याद अभी पूरी तरह मिट नहीं गई है. अकाली दल अगर बीजेपी के साथ जाता है तो उसे अपने उस राजनीतिक फैसले की व्याख्या करनी होगी, जब उसने कृषि कानूनों के विरोध में एनडीए छोड़ा था.
बीजेपी के सामने भी यही सवाल रहेगा कि क्या वो फिर से उसी पुराने सीट बंटवारे वाले मॉडल पर लौटेगी, जिसमें अकाली दल बड़े हिस्से में चुनाव लड़ता था और बीजेपी अपेक्षाकृत कम सीटों पर. आज की बीजेपी 2007 वाली बीजेपी नहीं है. पार्टी अब पंजाब में अपने दम पर विस्तार का दावा कर रही है. जून 2026 में नबीन ने भी 117 सीटों पर संगठन मजबूत करने की बात कही थी.
AAP और कांग्रेस के बीच तीसरा रास्ता तलाश पाएंगे?
2027 के चुनाव में असली सवाल सिर्फ बीजेपी और अकाली दल का गठबंधन नहीं होगा. सवाल ये भी होगा कि AAP और कांग्रेस के बीच विरोधी वोट किस तरह बंटते हैं और SAD तथा BJP उसमें कितना हिस्सा खींच पाते हैं.
2022 में AAP ने 92 सीटें जीतकर बहुत बड़ा जनादेश हासिल किया था. लेकिन 2027 में मुकाबला वैसा ही रहेगा, ये मान लेना जल्दबाजी होगी. कांग्रेस के पास अब भी संगठन है और SAD अपने पुराने आधार को फिर से खड़ा करने की कोशिश में है. बीजेपी भी पहले की तुलना में ज्यादा आक्रामक तरीके से पंजाब में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है.
ऐसे में SAD और BJP का साथ आना एक चार कोणीय मुकाबले को और जटिल बना सकता है. दोनों अलग लड़ते हैं तो उनके वोटों का बंटवारा कुछ सीटों पर निर्णायक हो सकता है. साथ आते हैं तो सवाल होगा कि क्या 1996 वाला सामाजिक समीकरण 2027 के पंजाब में उसी ताकत के साथ काम करेगा?
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तो क्या फिर बनेगी अकाली बीजेपी की जोड़ी?
अभी जवाब है, पक्का नहीं. लेकिन संभावना को खारिज भी नहीं किया जा सकता.
इतिहास बताता है कि SAD और BJP के बीच राजनीतिक दूरी पहले भी बनी है और फिर खत्म भी हुई है. 1996 से 2017 तक का सफर दोनों की साझेदारी की ताकत दिखाता है. 2020 ने ये दिखाया कि राजनीतिक हित और पंजाब की भावनात्मक राजनीति जब टकराती है तो दशकों पुराना गठबंधन भी टूट सकता है.
2026 में तस्वीर फिर बदल रही है. बीजेपी पंजाब में अपने दम पर बढ़ना चाहती है. अकाली दल अपने पुराने राजनीतिक आधार को वापस पाने की कोशिश में है. हालिया मुलाकातें और मुद्दों पर बदले हुए रुख ने बातचीत की गुंजाइश जरूर पैदा की है.
लेकिन गठबंधन की घोषणा और गठबंधन की संभावना में जमीन आसमान का फर्क होता है. अभी दोनों दल अपने अपने संगठन को मजबूत कर रहे हैं. इसलिए 2027 के चुनाव से पहले असली कहानी सीट शेयरिंग की मेज पर नहीं, बल्कि पंजाब की जमीन पर लिखी जाएगी.
और शायद यही वजह है कि पंकज झा की एक बात इस पूरे घटनाक्रम पर सबसे सटीक बैठती है, “सियासत में सब मुमकिन है.”
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