भाजपा ऐसा करने वाली अकेली पार्टी नहीं है. राज्य की सबसे बड़ी पार्टी नागा पीपल्स फ्रंट और कांग्रेस समेत कुल 11 पार्टियां 27 फरवरी को होने वाले चुनावों के बहिष्कार में शामिल हैं. इन सभी पार्टियों ने 29 जनवरी को कोर कमिटी ऑफ नागालैंड ट्राइबल होहोज़ एंड सिविल ऑर्गनाइज़ेशन्स (CCNTHCO) और 7 नागा गुटों के साथ कोहिमा के होटल जपफु में एक शपथपत्र पर दस्तखत किए. इसके मुताबिक ये पार्टियां न टिकट बांटेंगी, न पर्चा भरेंगी.
नागा होहो नागा कबीलों की शीर्ष संस्था है और इसका नागालैंड में बहुत प्रभाव है.

नागालैंड में इससे पहले भी कई बार पूरे राज्य में चुनाव बहिष्कार की घोषणा हो चुकी है. पिछले दिनों निकाय चुनावों का बहिष्कार हुआ था.
कोई चुनाव लड़ना क्यों नहीं चाहता?
नागालैंड में कुछ अलगाववादी गुट हैं, जो भारत से अलग होने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. फिर कुछ गुट हैं, जो भारत के साथ रहना तो चाहते हैं, लेकिन ग्रेटर नागालैंड (जिसमें आस-पास के राज्यों के इलाके भी आते हैं) चाहते हैं. लेकिन पड़ोसी राज्य ग्रेटर नागालैंड के लिए ज़मीन देना नहीं चाहते. इस सब को लेकर लंबे समय से लड़ाई चल रही है. केंद्र नागा गुटों से बात कर रहा है, कुछ समझौते भी हुए हैं, लेकिन समझौते की बातें आम लोग नहीं जानते. नागा गुटों का इस बात पर ज़ोर है कि पहले एक ठोस नतीजे पर पहुंचा जाए, उसके बाद ही चुनाव हों.
एक विधानसभा, कई सरकारें
नागा होहो की मांग तब समझ आती है, जब हम नागालैंड की स्थितियों पर गौर करते हैं. नागालैंड की राज्य सरकार के अलावा वहां एक नागा गुटों की 'सरकार' भी है, जो कैंप हेब्रॉन से काम करती है. कुछ और अंडरग्राउंड सरकारें भी हैं. ये सब टैक्स वसूलती हैं और अपने नियम लागू करती हैं. इसलिए राज्य में किसी एक नतीजे पर पहुंचने की मांग ज़ोरों से की जाती रही है.
नागा होहो ने अपनी बात मनवाने के लिए भावनात्मक अपील वाला कार्ड खेल दिया है. वो कह रहे हैं कि राज्य में जो भी (राजनैतिक पार्टियां और अलगाववादी गुट) उनके निर्णय के खिलाफ जाएगा, वो 'नागा विरोधी' करार दिया जाएगा. पूर्वोत्तर में जातीय स्वाभिमान बहुत मायने रखता है. इसलिए किसी के लिए भी 'नागा विरोधी' कहलाने की शर्त पर चुनाव में उतरना आसान नहीं है.

प्रधानमंत्री मोदी के साथ नागा होहो के सदस्य (2015, फोटोःप्रधानमंत्री कार्यालय)
भाजपा VS भाजपा
भाजपा चुनाव बहिष्कार से पहले बुलाई गई दो सर्वदलीय बैठकों में शामिल नहीं हुई थी. लेकिन 29 तारीख को जारी हुए शपथपत्र पर नागालैंड भाजपा की राज्य कार्यकारिणी के सदस्य और पूर्व मंत्री खेटो सेमा ने दस्तखत किए हैं. लेकिन भाजपा के पूर्वोत्तर प्रभारी राम माधव ने एक अखबार से ये कहा कि राज्य भाजपा ने किसी को भी किसी कागज़ पर दस्तखत करने को अधिकृत नहीं किया है.
नागा गुट कह रहे हैं कि खेटो सेमा ने राज्य भाजपा अध्यक्ष और गृहराज्यमंत्री को जानकारी में रखकर ही ये कदम उठाया है. CCNTHCO के संयोजक थेजा थेरिएह तो यहां तक कह रहे हैं कि जब कोर कमिटी के सदस्य चुनाव बहिष्कार के लिए समर्थन मांगने NPF अध्यक्ष शुरोज़िले से मिलने गए थे, तब केंद्र में गृहराज्य मंत्री किरण रिजुजू नागालैंड सीएम टीआर ज़ीलियांग के घर पर मौजूद थे. रिजुजू भाजपा के लिए नागालैंड चुनाव प्रभारी हैं.
टीआर ज़ीलियांग और अमित शाह. भाजपा विधानसबा में ज़ीलियांग की NPF सरकार के साथ है. (फोटोःपीटीआई)भाजपा के चुनाव लड़ने, न लड़ने से फर्क क्या पड़ता है?
बहुत. भाजपा के फिलहाल चार विधायक हैं विधानसभा में. लेकिन अगर वो सभी सीटों से पर्चा भर दे, तो वो कई सीटें इसलिए जीत जाएगी क्योंकि उसे कोई मुकाबला मिलेगा ही नहीं. ये एक तरह से 1998 का दोहराव होगा. तब भी नागा होहो और नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड - ईसाक मुईवा (NSCN-IM) ने चुनाव बहिष्कार का ऐलान किया था. लेकिन तब कांग्रेस ने चुनाव लड़ा था और 53 सीटें लाकर सरकार बना ली थी. NPF की मान्यता रद्द हो गई थी और उसका चुनाव चिह्न वापस ले लिया गया था. इसीलिए चुनाव बहिष्कार में सभी का शामिल होना, नागा होहो के लिए बड़ा मसला है.
शपथपत्र के बाद धमकी की बारी है
नागा होहो अपील की भाषा में बात करता है. लेकिन सभी नागा गुट ऐसे नहीं हैं. उग्रवादी गुट NSCN -IM ने राज्य की पार्टियों को धमकी दे दी है कि विधानसभा चुनाव से नागा शांति वार्ता पर असर पड़ेगा इसलिए वो चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा न लें. नागा होहो भी 1 फरवरी से राज्यव्यापी बंद का ऐलान कर दिया है.
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