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ट्रंप के हाथ लगा ठेंगा, शांति का नोबेल पुरस्कार भारतीय मूल की नावी पिल्लै को मिला

Nobel peace prize 2026: दक्षिण अफ्रीका की नावी पिल्लै को 2026 का नोबेल पीस प्राइज दिया गया है. उन्होंने रंगभेद के दौर में राजनीतिक कैदियों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी है. नावी पिल्लै का जन्म दक्षिण अफ्रीका के डरबन में हुआ था. उनका परिवार भारतीय मूल का है.

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नावी पिल्लै का जन्म दक्षिण अफ्रीका के डरबन में हुआ था. (Courtesy- NobelPrize/PTI)

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  • 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार दक्षिण अफ्रीका की नावी पिल्लै को उनके युद्ध अपराधों और नरसंहार से जुड़े मामलों में न्याय सुनिश्चित करने वाले कार्य के लिए दिया गया है।
  • नावी पिल्लै ने रंगभेद की व्यवस्था के समय राजनीतिक कैदियों के अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी और बाद में अंतरराष्ट्रीय न्यायपालिका में विभिन्न पदों पर काम किया।
  • नावी पिल्लै को नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद उनकी भूमिका विश्व स्तर पर मानवाधिकारों व न्याय के क्षेत्र में और अधिक सम्मानित हुई तथा उनके कार्यों का व्यापक प्रभाव माना जा रहा है।

2026 का नोबेल पीस प्राइज दक्षिण अफ्रीका की नावी पिल्लै को देने का दिया गया है. यानी अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को एक बार फि‍र न‍िराशा हाथ लगी है. भारतीय मूल की नावी पिल्लै ने रंगभेद के दौर में राजनीतिक कैदियों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी. युद्ध अपराधों और नरसंहार के मामलों में न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में अहम भूमिका निभाई.

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नावी पिल्लै कौन हैं?

नावी पिल्लै का पूरा नाम नावनेथम पिल्लै है. उनका जन्म 23 सितंबर 1941 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन में हुआ था. उनका परिवार भारतीय मूल का है. ऐसे दौर में जब दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की व्यवस्था लागू थी, पिल्लै ने कानून की पढ़ाई की और न्याय के लिए अपनी लड़ाई शुरू की.

साल 1963 में नेटाल यूनिवर्सिटी से बीए और 1965 में एलएलबी की डिग्री हासिल की. पढ़ाई के दौरान ही वे रंगभेद के खिलाफ सक्रिय आंदोलन से जुड़ गईं. साल 1967 में उन्होंने अपनी लॉ फर्म शुरू की. ऐसा करने वाली वे दक्षिण अफ्रीका की पहली अश्वेत महिला बनीं.

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नेल्सन मंडेला से जुड़ा है संघर्ष

नावी पिल्लै के करियर का एक अहम पड़ाव साल 1973 में आया. उन्होंने याचिका दायर कर रॉबेन आइलैंड जेल में बंद राजनीतिक कैदियों को वकीलों की मदद लेने का अधिकार दिलाने की लड़ाई लड़ी. इन कैदियों में नेल्सन मंडेला भी शामिल थे. हालांकि, पिल्लै की मंडेला से जेल में कभी मुलाकात नहीं हुई.

बाद में जब मंडेला दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बने, तो उन्होंने 1995 में पिल्लै को देश के हाई कोर्ट में जज नियुक्त करने की सिफारिश की. इस तरह रंगभेद के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने वाली पिल्लै ने न्यायपालिका में भी अहम मुकाम हासिल किया.

नरसंहार और यौन हिंसा के खिलाफ ऐतिहासिक भूमिका

साल 1999 में पिल्लै को रवांडा के लिए बने इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट में जज नियुक्त किया गया. बाद में वे इसकी अध्यक्ष भी बनीं. अपने कार्यकाल के शुरुआती सालों में नावी पिल्लै इस कोर्ट की इकलौती महिला जज थीं.

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यहां उन्होंने युद्ध अपराधों और नरसंहार से जुड़े मामलों में काम किया. उनके योगदान का एक अहम पहलू था. उन्होंने यौन हिंसा को नरसंहार से जुड़े अपराधों के संदर्भ में समझने और उसके लिए जवाबदेही तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. फरवरी 2003 में पिल्लै को इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट की शुरुआती जजों की टीम में चुना गया. उन्हें इसकी अपील डिविजन में नियुक्त किया गया.

UN में भी निभाई अहम जिम्मेदारी

2008 से 2014 तक नावी पिल्लै ने संयुक्त राष्ट्र में बतौर ह्यूमन राइट्स हाई कमिश्नर के रूप में काम किया. इस दौरान उन्होंने दुनिया भर में मानवाधिकारों की रक्षा और अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने की दिशा में काम किया.

हाल के सालों में उन्होंने फिलिस्तीनी क्षेत्र से जुड़े मामलों की जांच करने वाले UN के स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग की अध्यक्षता भी की. अंतरराष्ट्रीय न्याय और मानवाधिकारों के क्षेत्र में उनके लंबे योगदान को देखते हुए उन्हें 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चुना गया है.

नोबेल पीस प्राइज ओस्लो में ही क्यों दिया जाता है?

नोबेल के ज्यादातर पुरस्कार स्वीडन में दिए जाते हैं, लेकिन शांति का नोबेल नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में दिया जाता है. इसके पीछे करीब 130 साल पुराना इतिहास है.

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अल्फ्रेड नोबेल ने 1895 में अपनी वसीयत में तय किया था कि शांति पुरस्कार का फैसला नॉर्वे की संसद की ओर से चुनी गई समिति करेगी. उस समय स्वीडन और नॉर्वे एक ही राजा के अधीन थे, लेकिन दोनों की अपनी संसद और अलग राजनीतिक व्यवस्थाएं थीं. नोबेल की इसी व्यवस्था के कारण आज भी शांति पुरस्कार का ऐलान नॉर्वे में होता है और पुरस्कार समारोह ओस्लो में आयोजित किया जाता है.

ट्रंप को क्यों थी नोबेल की उम्मीद?

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप लंबे समय से नोबेल शांति पुरस्कार पाने की इच्छा जाहिर करते रहे हैं. उनका दावा है कि उन्होंने कई देशों के बीच संघर्ष खत्म कराए और दुनिया में शांति स्थापित करने के लिए असाधारण काम किया है.

7 अक्टूबर को ओवल ऑफिस में भी ट्रंप ने अपनी दावेदारी दोहराई थी. उन्होंने कहा था, 

“मैं शेखी नहीं मार रहा, मैं बस आपको सच बता रहा हूं. शायद ही किसी राष्ट्रपति ने कभी कोई युद्ध समाप्त किया हो. मैंने आठ युद्ध समाप्त किए हैं.”

ट्रंप का ये दावा ऐसे समय आया, जब 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार के ऐलान का वक्त करीब था. लेकिन पुरस्कार के लिए उनकी उम्मीद इस बार भी पूरी नहीं हुई.

मचाडो ने ट्रंप को सौंपा था मेडल

जनवरी 2026 में वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो ने ट्रंप को अपने 2025 के नोबेल शांति पुरस्कार का मेडल सौंप दिया था. मचाडो ने वेनेजुएला के प्रति अमेरिकी समर्थन के लिए आभार जताते हुए ऐसा किया था.

हालांकि, नोबेल पुरस्कार किसी दूसरे व्यक्ति को ट्रांसफर नहीं किया जा सकता. मेडल सौंपने से पुरस्कार का आधिकारिक विजेता नहीं बदलता. 2025 का नोबेल शांति पुरस्कार मचाडो को ही मिला था.

अब 2026 के पुरस्कार के लिए नावी पिल्लै का नाम घोषित हुआ है. रंगभेद के खिलाफ कानूनी संघर्ष से लेकर अंतरराष्ट्रीय न्याय और मानवाधिकारों की रक्षा तक, उनका सफर बताता है कि शांति का मतलब सिर्फ युद्ध रोकना नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना और पीड़ितों को न्याय दिलाना भी है.

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