इरोम शर्मिला की पार्टी से कैंडिडेट और मणिपुर की पहली मुस्लिम महिला कैंडिडेट नजीमा बीबी को मैतेई पंगल के मौलवियों की ओर से धमकी मिली है कि उन्हें अपने गांव में कब्र भी नसीब नहीं होगी. मैतेई पंगल मणिपुर के मैतेई मुसलमानों को कहा जाता है. ये मौलवी नजीमा के चुनाव लड़ने से नाखुश हैं. नजीमा मणिपुर वाबगाई सीट से चुनाव लड़ रही है.
मणिपुर में मुसलमान अल्पसंख्यक हैं. लेकिन वाबगाई एक मुस्लिम बहुल इलाका है. इसके अलावा 3 और सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक हैं. इस हिसाब से 60 सीटों वाली मणिपुर विधानसभा में केवल 4 सीटों पर ही संभावना है कि कोई मुस्लिम जीत पाए.

नजीमा बीबी
28 जनवरी को नजीमा, इरोम शर्मिला के साथ मणिपुर की राज्यपाल नजमा हेपतुल्ला से मिलीं और मौलवियों की हरकत के बारे में उन्हें बताया. बकौल हिंदुस्तान टाइम्स नजीमा के गांव संथेल ममंग लेइकाई में लोगों को उनसे बात तक करने से टोका जा रहा है. नजीमा का कहना है कि ये सब मौलवियों के इशारे पर हो रहा है जो खासतौर पर इस बात से नाखुश हैं कि वो एक महिला होकर चुनाव लड़ रही हैं.
ये पहली बार नहीं है कि नजीमा इस तरह मौलवियों के निशाने पर हैं. नजीमा बीबी काफी लंबे समय से सोशल एक्टिविस्ट हैं. 2001 से वे महिला अधिकारों के लिए काम कर रही हैं. मणिपुर अलायंस फॉर चाइल्ड राईट्स एंड सस्टेनेबल लाइवलीहुड फोरम, यूनाइटेड मणिपुर मुस्लिम वुमन डेवलपमेंट ऑरगनाज़ेशन और वुमन इन गवर्नेंस (विंग) जैसी संस्थाओं के साथ जुड़ी रही हैं. ये एनजीओ समाज और सरकार में औरतों की भागीदारी बढ़ाने पर ज़ोर देते हैं. कट्टरपंथ मौलवियों को ये नागवार गुज़रा और उन्हें किसी न किसी बहाने से नजीमा को रोकने, उन्हें परेशान करने की कोशिश की.
इरोम की पार्टीः

इरोम शर्मिला.
पीपल्स रिसर्जेंस एंड जस्टिस अलायंस ( PRJA) इरोम शर्मिला की पार्टी है. मणिपुर में 59 सालों से लागू सश्स्त्र सेना विशेषाधिकार अधिनियम (आफ्स्पा) हटवाने के लिए इरोम ने 16 साल तक भूख हड़ताल की. सबसे लंबा अनशन. लेकिन कुछ न होते देख पिछले साल 10 अगस्त को उन्होंने अपना अनशन खत्म कर दिया. ऐलान किया कि वो अब अपनी लड़ाई चुनावी राजनीति के ज़रिए आगे ले जाएंगी. फिर अक्टूबर 2016 को उन्होंने PRJA बनाई. नजीमा बीबी PRJA की ट्रेजरर (कोषाध्यक्ष) हैं.
कौन हैं मैतेई पंगल?
मैतेई पंगल मणिपुरी मुस्लिम हैं और बरसों बरस से मणिपुर में रह रहे हैं. मैतेई संस्कृति में घुलमिल गए हैं, इसलिए इन्हें मियां मैतेई भी कहते हैं. लेकिन मणिपुर के बहुसंख्यक मैतेई (जो ज़्यादातर हिंदू हैं) और इनके बीच कम बनती है. कई दंगे भी हुए हैं. पूरे पूर्वोत्तर की तरह मणिपुर में भी 'बाहरी' वाला मुद्दा ज्वलंत है. चूंकि 'बाहरी' ज़्यादातर मुस्लिम बहुल बांग्लादेश से आते हैं, इसलिए मुसलमान निशाने पर रहते हैं और मणिपुर में हाशिये पर हैं. इस समाज में औरतों के हाल वही हैं जो बाकी हिंदुस्तान में हैं. इसपर अलग से कुछ लिखने की ज़रूरत नहीं.
तो नजीमा एक बेहद मुश्किल हालात में जी रहे समाज में से भी सबसे निचले दर्जे का प्रतिनिधित्व करती हैं. नजीमा को सिर्फ चुनाव लड़ना ही नहीं होगा. उनको कट्टरपंथ को भी हराना पड़ेगा.
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