'उन्हें हिंदू धर्म को बचाना होगा. वो अररिया को दूसरा पाकिस्तान नहीं बनने दे सकते. हम देश को टूटने नहीं देंगे. आप यादव वोट देख लेना.'भाजपा के पूर्व सांसद के इस बयान के मायने क्या हैं? भाजपा के पूर्व सांसद के इस बयान को जातीय और सांप्रदायिक माना गया. माना गया कि वे इस तरह का बयान देकर लोगों को गोलबंद करना चाहते हैं. उनकी भावनाएं भड़का रहे हैं. इस बयान के वायरल होते ही इलेक्शन कमीशन ने फौरन एक्शन लिया. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी प्रवीण कुमार गुप्ता ने इस बाबत यू-ट्यूब को चिट्ठी लिखी. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक 12 अप्रैल को उन्होंने गूगल के ग्रीवांस रिड्रेसल अफसर को लेटर लिखा. इसमें उन्होंने कहा कि इस वीडियो को तुरंत हटाया जाना चाहिए. ये रिप्रजेंटेशन ऑफ़ पीपल एक्ट का उल्लंघन करता है. ये वीडियो 'धार्मिक भावनाएं भड़काने और दो समुदायों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने' वाला है. इस पर गूगल ने ये वीडियो हटा दिया. मगर ऑडियो क्लिप फिर भी यूट्यूब पर चलती रही. खास बात ये है कि ये विवादित ऑडियो क्लिप अब भी यूट्यूब पर उपलब्ध है. इस पर एक बार फिर चुनाव आयोग ने यूट्यूब से जवाब मांगा है. गूगल की ओर से अब तक कोई जवाब नहीं आया है.
कैसे हटाई गई पूर्व सांसद की वीडियो क्लिप? इंटरनेट की दुनिया में सब ठीक ठाक चले, इसके लिए एक ग्रुप बना है. नाम है-इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया. इस एसोसिएशन में फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब और वॉट्सऐप जैसी कंपनियों के प्रतिनिधि शामिल हैं. इन सभी ने मिलकर एक सब कमेटी बनाई है. ये कमेटी चुनाव में विवादित कंटेट को रोकने में चुनाव आयोग की मदद करने के लिए बनाई गई है. इस कमेटी के मुताबिक अगर चुनाव आयोग की तरफ से उसे कोई शिकायत मिलती है, तो उसे 3 घंटे के भीतर उस कंटेंट को हटा दिया जाएगा.
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक प्रदीप कुमार सिंह का वीडियो हटाना भी इसी पहल का हिस्सा है. 10 मार्च यानी चुनाव की तारीखों के ऐलान के बाद से फेसबुक अब तक करीब 574 पोस्ट हटा चुका है. ये सब इलेक्शन कमीशन के कहने पर किया गया है. फेसबुक से हटाए गए इन पोस्ट में से 34 भड़काऊ भाषण थे. ट्विटर अब तक 49 पोस्ट हटा चुका है. वॉट्सऐप 3 यूजर्स के अकाउंट सस्पेंड कर चुका है.
भाजपा के पूर्व सांसद ने ऐसा क्यों कहा? साल 2014 के चुनाव में प्रदीप कुमार सिंह करीब 2 लाख वोटों से चुनाव हार गए थे. लालू की पार्टी आरजेडी के तस्लीमुद्दीन चुनाव जीते थे. अररिया में कोई 41 फीसदी मुस्लिम वोट हैं. यहां करीब 10 फीसदी यादव वोटर हैं. ये दोनों राष्ट्रीय जनता दल के कोर वोटर माने जाते हैं. प्रदीप कुमार सिंह इसी को जेहन में रखकर शायद ऐसा बयान दे रहे हैं. उनको ये लगा होगा कि यादव वोट आरजेडी के खाते में गए तो उनकी जीत मुश्किल हो जाएगी.
साल 2014 के चुनाव में भाजपा और नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था. तब बीजेपी के प्रदीप कुमार सिंह को 2.61 लाख और जेडीयू को 2.22 लाख वोट मिले थे. इसको बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी के एक बयान से और अच्छे से समझा जा सकता है. 8 मार्च, 2018 को रानीगंज में एक सभा को संबोधित करते हुए सुशील मोदी ने कहा था की वो 2014 में इसलिए हारे क्योंकि बीजेपी और जेडीयू अलग-अलग चुनाव लड़े थे. अगर ऐसा न होता तो हमारे वोट तस्लीमुद्दीन को मिले वोटों से 70 हजार ज्यादा होते.

अररिया के पूर्व सांसद मोहम्मद तस्लीमुद्दीन.
अररिया में इस बार प्रदीप कुमार सिंह का मुकाबला तस्लीमुद्दीन के बेटे सरफराज आलम से है. तस्लीमुद्दीन की इस सीट पर तगड़ी पकड़ मानी जाती थी. साल 2014 के चुनाव में जबरदस्त मोदी लहर में भी उन्होंने जीत हासिल की थी. 2017 में बीमारी के चलते उनकी मौत हो गई थी. 2018 में हुए उपचुनाव में आरजेडी से उनके बेटे सरफराज आलम चुनाव जीते थे.
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