प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद जजों ने जस्टिस दीपक मिश्रा के नाम लिखा एक खत भी जारी किया, जिसमें चीफ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं. दी लल्लनटॉप इस खत की खास बातें आपको बता रहा है और साथ में ये भी कि इस खत में लिखी बातों के निहितार्थ क्या हैं. पढ़िए -
प्रधान न्यायाधीश महोदय,
बड़ी पीड़ा के साथ हम आपको ये खत लिख रहे हैं. इस खत के माध्यम से हम इस अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के उन फैसलों की ओर आपका ध्यान आकर्षित कराना चाहते हैं, जिनकी वजह से देश की न्याय व्यवस्था के काम में रुकावट पैदा हुई है. हाईकोर्ट की स्वतंत्रता प्रभावित हुई है और भारत के मुख्य न्यायाधीश के प्रशासनिक काम पर भी असर पड़ा है.

जस्टिस चेलमेश्वर लेटर जारी करने से पहले हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में.
बंबई, कलकत्ता और मद्रास में चार्टर्ड हाईकोर्ट की स्थापना के बाद से भारत की न्याय व्यवस्था में कुछ प्रथाओं ने अपने लिए जगह बनाई. इनमें से एक प्रथा ये है कि देश के मुख्य न्यायाधीश 'मास्टर ऑफ रोस्टर' होंगे. वही तय करेंगे कि किस मामले की सुनवाई कौन-सा जज या बेंच करे. ये सिद्धांत इसलिए बनाया गया ताकि सुप्रीम कोर्ट सुचारु ढंग से काम कर सके. इसका मतलब ये नहीं है कि चीफ जस्टिस अपने साथी जजों से किसी भी तरह से श्रेष्ठ या कानूनी तौर पर ज़्यादा शक्तिशाली हैं. वो केवल 'फर्स्ट अमंग ईक्वल्स' हैं. माने साथी जजों के बराबर, लेकिन प्रथम. वो न इससे ज़्यादा कुछ हैं, न इससे कम.
इस प्रथा से एक और प्रथा निकलती है. वो ये, कि सुप्रीम कोर्ट के सभी जज बेंच और मामले तय करने में मुख्य न्यायाधीश के फैसले का सम्मान करेंगे. ये दोनों प्रथाएं हैं. नियम नहीं. लेकिन इनका पालन किसी नियम की तरह इसलिए किया जाता है ताकि सुप्रीम कोर्ट के काम करने के तरीके पर या निष्ठा पर कोई सवाल न खड़ा हो.

ये पूछने पर कि क्या प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे जज सीजेआई पर महाभियोग की कारवाई चाहते हैं, उन्होंने कहा कि ये फैसला देश करेगा.
बड़े दुख के साथ हमें कहना पड़ रहा है कि पिछले कई दिनों से इन दो प्रथाओं का पालन ठीक ढंग से नहीं हो रहा. देश पर गहरा असर डालने वाले कई मामलों में सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने अपनी पसंद के जजों को नियुक्त किया है. इस पसंद के पीछे ठोस कारण नहीं दिए गए.
ये हर हाल में रुकना चाहिए.
हम इस बात की एक-एक जानकारी यहां नहीं दे रहे हैं ताकि सुप्रीम कोर्ट को शर्मिंदगी न उठानी पड़ी. लेकिन ये जानिए कि सुप्रीम कोर्ट की छवि को काफी ठेस पहले ही पहुंच गई है. लेकिन हम एक मिसाल यहां देना चाहते हैं. सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने 27 अक्टूबर, 2017 को आर पी लूथरा बनाम भारत संघ के मामले में 'मेमोरैंडम ऑफ प्रोसीजर' का ज़िक्र किया. जबकि सुप्रीम कोर्ट की एक संवैधानिक बेंच सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड असोसिएशन बनाम भारत संघ वाले मामले में मेमोरैंडम ऑफ प्रोसीजर पर पहले से विचार कर रही थी. इसलिए ये समझ से बाहर है कि किसी दूसरी बेंच ने इस मसले पर टिप्पणी कैसे की?

जजों ने ज़ोर देकर कहा कि उनके पास अपनी बात देश के सामने रखने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था.
मार्च 2017 में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों ने (जिनमें आप भी शामिल थे) भारत सरकार को 'मेमोरैंडम ऑफ प्रोसीजर' भेजा था. लेकिन भारत सरकार ने इस बारे में कोई जवाब नहीं दिया. इसका मतलब यही है कि सुप्रीम कोर्ट को अपने तईं मेमोरैंडम ऑफ प्रोसीजर पर फैसला ले लेना चाहिए. ये मामला हमेशा के लिए लटका नहीं रह सकता.
4 जुलाई, 2017 को सुप्रीम कोर्ट के 7 जजों की बेंच ने जस्टिस करणन के मामले में ये तय किया था कि सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर दोबारा विचार की ज़रूरत है. किसी गलती की सूरत में जजों पर कार्रवाई के लिए महाभियोग के अलावा दूसरे तरीकों पर भी विचार की ज़रूरत है. (महाभियोग वो तरीका है, जिसके तहत हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जजों को बर्खास्त किया जा सकता था. ये एक बेहद जटिल प्रक्रिया है और इसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की ज़रूरत होती है.)

सवालों के घेरे में. CJI जस्टिस दीपक मिश्रा.
मेमोरैंडम ऑफ प्रोसीजर पर कोई भी फैसला यदि न्यायपालिका की तरफ से होना है, तो वो संवैधानिक बेंच को ही लेना चाहिए. भारत का मुख्य न्यायाधीश होने के नाते आपकी ये ज़िम्मेदारी है कि आप इन मुद्दों पर ध्यान दें. आर पी लूथरा वाले मामले में दिए कोर्ट के आदेश से पैदा हुई स्थिति पर जब आप अपने विवेक से कार्रवाई कर लेंगे, तब हम आपको ऐसे अन्य मामलों के बारे में भी सिलसिलेवार तरीके से बताएंगे जिनमें इसी तरह की कार्रवाई की ज़रूरत है.
भवदीय,
जे चेलमेश्वर रंजन गोगोई मदन बी लोकुर कुरियन जोसफ
इस चिट्ठी में सुप्रीम कोर्ट में चले दो मामलों और एक जुमले 'मेमोरैंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग' का ज़िक्र हुआ है. इन्हें समझने के लिए हमने सुप्रीम कोर्ट में वकालत कर रहे एडवोकेट उमेश शर्मा से बात की. उन्होंने समझाया,
''मेमोरैंडम ऑफ प्रोसीजर' के तहत वो नियम बनने हैं, जिनके तहत कोई वकील हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में जज बनता है. अभी ये व्यवस्था है कि बार कुछ नाम कोलेजियम को देता है और वो फैसला लेता है कि कौन जज बनेगा और कौन नहीं. यदि मेमोरैंडम ऑफ प्रोसीजर अगर तय हो जाए तो बार के बाहर के वकील भी काबिलियत के दम पर जज बन पाएंगे. अगर ऐसा हुआ, तो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जज बनाने पर बार और कोलेजियम की मोनोपॉली खत्म हो जाएगी. इसीलिए मेमोरैंडम ऑफ प्रोसीजर बहुत संवेदनशील मुद्दा है.
अब हुआ ये कि 2016 में सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड असोसिएशन बनाम भारत संघ वाले मामले में एक 'मेमोरैंडम ऑफ प्रोसीजर' को लेकर एक अंतरिम ऑडर दिया. लेकिन इस ऑडर को सुप्रीम कोर्ट की एक दूसरी बेंच ने वेकेट कर दिया (माने खारिज कर दिया). ये बेंच आर पी लूथरा बनाम भारत संघ वाले मामले की सुनवाई कर रही थी. यदि इस बेंच को किसी दूसरे मामले में दिए ऑर्डर को वेकेट करना था, तो उसे कायदे से उस मामले को अपने पास ले लेना चाहिए था. जो कि नहीं हुआ.

CJI को लिखी चिट्ठी में मेमोरैंडम ऑफ प्रोसीजर का ज़िक्र बार-बार आया है.
सरकार मेमोरैंडम ऑफ प्रोसीजर वाले मामले में पड़ना नहीं चाहती. लेकिन सच यही है कि न्यायपालिका में नियुक्तियों को लेकर कोई भी नया नियम विधायिका के अधिकार क्षेत्र में है. तब तक गेंद सुप्रीम कोर्ट के पाले में है. इसी के चलते ये विवाद खड़ा हुआ है. कुछ जज जो चल रहा है, उसके पक्ष में हैं, और कुछ ये चाहते हैं कि चीज़ें बदलें.''ये चिट्ठी अपने आप में ऐतिहासिक है. न्यायपालिका आज भी अपनी तमाम खामियों के बावजूद लोगों की आखिरी आस बनी हुई है. इसमें इतने बड़े स्तर की गड़बड़ परेशान करती है. खासकर इस चिट्ठी का आखिरी हिस्सा, जिसका मतलब ये है कि अभी सिर्फ एक मामला सामने आया है और न जाने ऐसे कितने ही मामले दबे पड़े हैं.
पूरे मामले पर सीजेआई दीपक मिश्रा ने बस इतना कहा है कि सुप्रीम कोर्ट में सभी जज बराबर हैं और सुप्रीम कोर्ट में सभी जजों को काम का बंटवारा बराबरी से ही किया जा रहा है.
वीडियोः देश के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के चार जजों को प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों करनी पड़ी?
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