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जस्टिस दीपक मिश्रा की पूरी कहानी, जिन्होंने आधी रात को 'कर्नाटक सर्कस' के लिए कोर्ट खुलवाई

येदियुरप्पा ने 17 मई को कर्नाटक के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले ली थी. लेकिन इससे पहले वाली रात में यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया था. कांग्रेस की तरफ से अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्रार को केस की अर्जी दी थी. रजिस्ट्रार रात को चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा से मिले थे. जस्टिस मिश्रा ने तीन जजों- जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस सीकरी और जस्टिस बोबड़े की बैंच गठित की थी. और रात को 2 बजे सुनवाई शुरू हुई थी.

लेकिन मास्टर ऑफ रोस्टर की पावर चीफ जस्टिस के पास थी. वो कभी भी इस केस को अपने पास ले सकते थे. उसम समय कांग्रेस ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ राज्यसभा में महाभियोग की कार्यवाही भी शुरू की थी, जो पूरी नहीं हो सकी थी.

जस्टिस मिश्रा का बैकग्राउंड और उनके फैसले बड़े चर्चित हैं. जानिए जस्टिस दीपक मिश्रा को –

इनके बाबा एक कवि, संपादक, प्रखर समाजवादी और स्वतंत्रता सेनानी थे. देश की आजादी से पहले भी उनका बड़का वाला राजनीतिक कद था. इसे ऐसे समझिए कि 1937 से लेकर मरते दम तक (एक टर्म को छोड़कर) वो ओडिशा विधानसभा के सदस्य रहे. महात्मा गांधी से प्रभावित होकर कांग्रेसी बन गए. फिर 1939 में सुभाष चंद्र बोस के साथ चल दिए तो फिर कांग्रेस में नहीं लौटे. 1952 में निर्दलीय ही लड़े और विधानसभा पहुंचे. नाम है गोदाबरीश मिश्रा.

अब बात इस शख्सियत के चाचा की. जो देश के 21वें चीफ जस्टिस बने. 25 सितंबर 1990 से 24 नवंबर 1991 तक. वो नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन के पहले चेयरमैन भी रहे. फिर 1998 से 2004 तक कांग्रेस की मदद से राज्यसभा सदस्य रहे. नाम है रंगनाथ मिश्रा. अब इस परिवार की ताकत के नए चेहरे हैं जस्टिस दीपक मिश्रा. 2017 के अगस्त में वो भारत के 45वें चीफ जस्टिस बन गए. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 28 अगस्त को उन्हें शपथ दिलवाई. जस्टिस मिश्रा ने जस्टिस जेएस खेहर की जगह ली. 03 अक्टूबर 1953 को ओडिशा में जन्मे जस्टिस दीपक मिश्रा 14 महीने देश के चीफ जस्टिस थे. उनका कार्यकाल 28 अगस्त 2017 से लेकर 2 अक्टूबर 2018 तक का था.

जस्टिस मिश्रा ओडिशा से आने वाले तीसरे ऐसे जज थे, जो चीफ जस्टिस बने थे. उनसे पहले उनके चाचा रंगनाथ मिश्रा और जीबी पटनायक चीफ जस्टिस बने थे.

गोदाबरीश मिश्रा(बाएं) और रंगनाथ मिश्रा
गोदाबरीश मिश्रा(बाएं) और रंगनाथ मिश्रा

राष्ट्रपति ने जस्टिस मिश्रा को दिलवाई थी शपथ

जस्टिस मिश्रा के अहम फैसले

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1.सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान

30 नवंबर 2016. इसी दिन मूवी से ठीक पहले सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य किया गया था. फैसला सुप्रीम कोर्ट की डबल बेंच में मौजूद जस्टिस दीपक मिश्रा और अमितवा रॉय ने सुनाया था. आदेश में कहा गया था कि राष्ट्रगान के दौरान स्क्रीन पर राष्ट्रीय ध्वज भी दिखाना होगा. लोगों को इसके सम्मान में खड़ा होना भी अनिवार्य होगा. बेंच ने कहा- अब वक्त आ गया है जब देश के लोगों को समझना होगा कि वो एक राष्ट्र में रहते हैं और राष्ट्रगान को सम्मान देना उनका कर्तव्य है.

2. निर्भया गैंगरेप केस

5 मई 2016. इसी दिन 2012 के निर्भया गैंगरेप केस में तीन दोषियों को फांसी की सजा दी गई थी. फैसला सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच ने सुनाया था. बेंच में जस्टिस दीपक मिश्रा के साथ ही जस्टिस आर भानुमती और जस्टिस अशोक भूषण थे. कोर्ट ने कहा- इस अपराध की किस्म और इसके तरीके ने सामाजिक भरोसे को नष्ट कर दिया और यह रेयरेस्ट ऑफ द रेयरेस्ट की श्रेणी में आता है. इसमें मौत की सजा ही दी जानी चाहिए.

3. FIR वेबसाइट पर अपलोड हों

7 सितंबर 2016. जस्टिस मिश्रा ने इस दिन सभी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों को आदेश दिया कि वो FIR दर्ज करने के 24 घंटे के अंदर उसे वेबसाइट पर अपलोड करें. दुर्गम इलाकों को 72 घंटे का वक्त दिया गया. हालांकि संवेदनशील मामलों में एफआईआर कॉपी अपलोड नहीं की जाएंगी. सुप्रीम कोर्ट की इस बेंच में उनके साथ जस्टिस सी नागप्पन भी थे.

4. याकूब मेमन को फांसी

1993 के मुंबई ब्लास्ट मामले में दोषी याकूब मेमन को फांसी की सजा जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने ही सुनाई थी. ये फैसला इसलिए भी ऐतिहासिक था क्योंकि आजाद भारत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट में रात में सुनवाई की गई थी. तारीख थी 29 जुलाई 2015. रात के 3:18 से 4:50 बजे तक सुनवाई चली थी. बेंच ने दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद याकूब की माफी की अर्जी खारिज कर दी थी. कहा था- मौत के फरमान पर रोक न्याय का मजाक होगा. इसे स्वीकार करके हम अपने कर्तव्य में विफल होंगे. इसलिए याचिका खारिज की जाती है.

फिर 30 जुलाई को तड़के याकूब को फांसी पर चढ़ा दिया गया था. इसी मामले में सुनवाई के दौरान जस्टिस मिश्रा को जान से मारने की धमकी भी मिली थी.

5. बीसीसीआई पर लगाम

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30 जनवरी 2017. इस दिन बीसीसीआई पर सुप्रीम कोर्ट का डंडा चला था. सभी नेताओं को किनारे लगाके चार प्रशासकों को बीसीसीआई की कमान सौंप दी गई थी. ये 4 लोग विनोद राय, डायना इडल्जी, रामचंद्रा गुहा और विक्रम लिमयी थे. इन चारों पर लोढ़ा समिति की सिफारिशें लागू करने की भी जिम्मेदारी होगी. इस मामले में सुनवाई कर रही ट्रिपल बेंच को भी जस्टिस दीपक मिश्रा ही लीड कर रहे थे.

6. प्रमोशन में रिजर्वेशन

28 अप्रैल 2012. इस दिन यूपी सरकार का एक बड़ा फैसला सुप्रीम कोर्ट ने नकार दिया था. बात प्रमोशन में रिजर्वेशन की है. सुनवाई जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस दलवीर भंडारी कर रहे थे. इन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया था जिसमें कहा गया था कि प्रमोशन में आरक्षण तभी दिया जा सकता है जब जरूरतमंद की पहचान करने के लिए सभी जरूरी डेटा मौजूद हों. जबकि यूपी सरकार जरूरी डेटा देने में नाकामयाब रही थी. बीएसपी सुप्रीमो मायावती तब से ही प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए संविधान संशोधन की मांग कर रही हैं.

7. मानहानि पर सजा बरकरार रखी

मामला मई 2016 का है. राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल और सुब्रमण्यम स्वामी साहब इस बार एक तरफ थे. उनकी दलील थी कि मानहानि के मुकदमे में दोषी पाए जाने पर 2 साल कैद की सजा नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इससे उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में बाधा पहुंचती है. सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि ये धारा जारी रहेगी. हालांकि वादियों को 8 हफ्ते के अंदर उच्च न्यायालय जाने की छूट रहेगी. इस बेंच की अगुआई भी जस्टिस दीपक मिश्रा कर रहे थे.

8.अयोध्या विवाद पर कर रहे सुनवाई

ayodhya

अयोध्या का राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद. 30 सितंबर 2010 को मामले में हाईकोर्ट से एक फैसला आया. लखनऊ बेंच के तीन जजों ने मेजॉरिटी से फैसला दिया कि विवादित जमीन को तीन भागों में बांट दिया जाए और सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला को इनका मालिकाना हक दे दिया जाए. पर किसी को एक इंच कम जमीन भी कहां मंजूर थी सो पहुंच गए सुप्रीम कोर्ट. अब सात वर्ष बाद 11 अगस्त, 2017 से सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई शुरू कर दी है. सुप्रीम कोर्ट के 3 जजों की स्पेशल बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है, जिसकी अगुआई जस्टिस मिश्रा कर रहे हैं.

जब दिया सुप्रीम कोर्ट के इतिहास का सबसे लंबा ओपनिंग सेंटेंस

मामला मार्च 2015 का है. एक केस में सुनवाई के बाद जस्टिस मिश्रा इतना नाराज हो गए कि उन्होंने पहला वाक्य ही 192 शब्दों का लिख डाला. इसमें उन्होंने ऐसे लोगों को चेताया जो कोर्ट का गलत तरीके से इस्तेमाल कर किसी को फंसाने की कोशिश करते हैं. फिर कोर्ट के बाहर सेटलमेंट कर लेते हैं या दबाव बनाकर सामने वाली पार्टी से पैसा निकलवा लेते हैं. उन्होंने अपने 10 पेज के जजमेंट में कहा कि अब देश में ये स्थिति आ गई है कि किसी के खिलाफ केस दायर करने वाले से एक एफिडेविट भी लिया जाए कि अगर आपके आरोप गलत निकले तो आपके खिलाफ भी जांच की जा सके. इससे केस दायर करने वाले ज्यादा सतर्क रहेंगे और किसी को फंसाने की नीयत से केस नहीं करेंगे. ओपनिंग सेंटेंस भी पढ़ लीजिए-

justice

इंग्लिश लिटरेचर पसंद है

लिटरेचर से जस्टिस मिश्रा का प्यार स्वाभाविक है. उनके दादाजी गोदाबरीश मिश्रा तो बड़े कवि थे और ओड़िया लिटरेचर को आगे बढ़ाने में उन्होंने हर संभव प्रयास किया. हालांकि जस्टिस मिश्रा का इंट्रेस्ट ओड़िया नहींं, इंग्लिश लिटरेचर में है. उन्हें अंग्रेजी में कविता लिखने का भी शौक है. उन्हें फिलॉसफी और इतिहास में भी काफी इंट्रेस्ट है. यही कारण है कि अकसर जस्टिस मिश्रा कोर्टरूम में शास्त्रों का जिक्र करना नहीं भूलते हैं.

जस्टिस दीपक के करियर की अहम तारीखें

Mega Lok Adalat In Delhi High Court Premises

# 14 फरवरी 1977. इसी दिन जस्टिस दीपक मिश्रा रजिस्टर्ड वकील हो गए थे. माने ओडिशा हाईकोर्ट में वकील के तौर पर उनका नाम दर्ज हो गया था. वकालत आगे बढ़ी और 17 जनवरी, 1996 को बतौर एडिशनल जज उनको ओडिशा हाईकोर्ट में नियुक्त कर दिया गया.

#03 मार्च,1997 को उन्हें अपना घर यानी ओडिशा को अलविदा कहना पड़ा. उनका ट्रांसफर हो गया था मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में. इसी साल 19 दिसम्बर को उन्हें परमानेंट जज बना दिया गया.

#23 दिसम्बर, 2009. यानी करीब 12 साल बाद फिर ट्रांसफर का वक्त आया, मगर इस बार बड़ी जिम्मेदारी के लिए. उन्हें पटना हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बना दिया गया.

#24 मई, 2010 को दिल्ली उनसे दूर नहीं रही. जस्टिस मिश्रा को दिल्ली हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बना दिया गया.

#10 अक्टूबर, 2011. जस्टिस साहब अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुके थे वो भी जज बनकर.

#8 अगस्त, 2017. इस दिन जस्टिस दीपक मिश्रा के चीफ जस्टिस बनने की घोषणा हुई.


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