अगर आप हिंदू हैं, तो मुझे वोट दो और अगर आप मुसलमान हैं, तो कांग्रेस को.
हिंदू हो, तो हमें वोट दो, मुसलमान हो तो कांग्रेस को: BJP सांसद कैंडीडेट
जसवंत यादव को चुनाव लड़ने से बैन कर देना चाहिए.
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अलवर लोकसभा उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी जसवंत यादव. दाईं तरफ उनके खिलाफ अलवर ज़िला कांग्रेस की शिकायत है.
राजस्थान में लोकसभा सीटों के लिए उपचुनाव होने हैं. और चुनाव बिना ड्रामे के पूरे नहीं होते. सो वो पर्याप्त हो रहा है. लेकिन इस ड्रामे के बीच एक चीज़ ऐसी हो गई है, जो कतई हज़म नहीं की जानी चाहिए. अलवर से भाजपा प्रत्याशी जसवंत यादव ने एक रैली में कहा है,
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'कथित' तौर पर इसलिए नहीं कहा क्योंकि इस बात का वीडियो 'दी लल्लनटॉप' के पास मौजूद है, जिसकी तस्दीक एक स्थानीय पत्रकार ने भी की है. जसवंत फिलहाल राजस्थान में कैबिनेट मिनिस्टर हैं. माने विधायक हैं, सांसद बनकर प्रमोशन पाने की उम्मीद में हैं. इस उम्मीद में जगह-जगह रैलियां कर रहे हैं. इसी चक्कर में अलवर ज़िले के दुघेड़ा गांव पहुंचे थे.
वहां अपना भाषण समेटते हुए जसवंत ने कहा,

जसवंत सिंह यादव के खिलाफ कांग्रेस पार्टी की आधिकारिक शिकायत.

जसवंत यादव उपचुनाव के लिए जगह-जगह जाकर प्रचार कर रहे हैं. (फोटोः डॉ जसवंत सिंह यादव फेसबुक पेज से)
जसवंत की ये बात हर लिहाज़ से गलत है. और हम नैतिक वजहों से ऐसा नहीं कह रहे हैं. हम ठोस कानूनी वजहों की बात करेंगे. जसवंत ने धर्म के आधार पर वोट मांगा है. ये रेप्रेज़ेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट की धारा 123 (3) का उल्लंघन है. इसके मुताबिक कोई भी कैंडिडेट या उसका एजेंट धर्म के आधार पर वोट नहीं मांग सकता. न सिर्फ अपना धर्म, बल्कि विरोधी कैंडिडेट, उसके एजेंट या चुनाव में वोट डालने वाली जनता के धर्म, नस्ल, संप्रदाय, जाति और भाषा के आधार पर अपील नहीं की जा सकती.
123 (3), एक भाजपा कैंडिडेट और एक सर्वनाम का किस्सा
जसवंत की गलती इसलिए भी बड़ी है कि चुनाव में धार्मिक आधार पर वोट मांगना सही है कि नहीं, ये बात एक भाजपा कैंडिडेट के चलते ही साफ हुई थी.
1992 में बंबई हाईकोर्ट का एक फैसला आया. इसमें 1990 के चुनाव में महाराष्ट्र विधानसभा के लिए चुने गए भाजपा कैंडिडेट अभिरम सिंह का निर्वाचन रद्द कर दिया गया था. माने अभिरम की विधायकी चली गई थी. कारण - अभिरम ने हिंदू धर्म के आधार पर वोट मांगा था. अभिरम सुप्रीम कोर्ट गए. मामला पहले तीन जजों की बेंच के पास गया. फिर पांच जजों की संविधान बेंच के पास. यहां मालूम चला कि ठीक ऐसा मामला भाजपा के एक और नेता सुंदरलाल पटवा के खिलाफ भी चल रहा है. इन दोनों मामलों को मिलाकर 7 जजों की एक और बड़ी संवैधानिक बेंच के पास भेजा गया.

सुंदरलाल पटवा. धर्म के आधार पर वोट मांगने का एक मुकदमा इन पर भी चला था. ये अविभाजित मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे थे.
सारी बात आकर अटक गई रेप्रेज़ेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट की धारा 123 (3) और एक अंग्रेज़ी सर्वनाम 'his' पर. 123 (3) के तहत वो बातें लिखी हैं, जिन्हें चुनाव में भ्रष्टाचार माना जाएगा. कोर्ट ने इस बात पर खूब माथापच्ची की कि 123 (3) में 'his' जिस तरह इस्तेमाल हुआ है, उससे चुनाव में किसी भी तरह की धार्मिक या जातीय अपील पर पूरी तरह रोक लगती है कि नहीं. बेंच ने 2 जनवरी, 2017 को 4:3 के बहुमत से फैसला दिया कि धारा 123 (3) के तहत धार्मिक आधार पर वोट नहीं मांगे जा सकते क्योंकि धर्म एक व्यक्ति और उसके ईश्वर के बीच निजी मुद्दा है और चुनाव एक धर्मनिरपेक्ष प्रक्रिया है, जिससे धर्म को दूर रखा जाना चाहिए.

इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के बावजूद सांसदी खो दी, क्योंकि उन्होंने नियम तोड़ा था.
'आइरन लेडी' से लेकर 'सरकार' तक सब नपे हैं इससे पहले
सुप्रीम कोर्ट का फैसला (संविधान बेंच का भी) देश में कानून की तरह होता है. इस हिसाब से जसवंत ने कानून तोड़ा है. और अगर जसवंत को लगता हो कि कुछ दिन मामला रफा-दफा हो जाएगा, तो ये उनका भ्रम है. हमारे यहां चुनाव आयोग के नियम तोड़े जाने पर प्रधानमंत्रियों तक की सांसदी गई है. 1971 के चुनाव में एक सरकारी अधिकारी यशपाल कपूर ने इंदिरा गांधी के लिए रायबरेली में बतौर इलेक्शन एजेंट काम किया था. सरकारी अधिकारी सेवा में रहते किसी पार्टी से नहीं जुड़ सकते. इसकी शिकायत हुई, मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट गया. जस्टिस जगमोहनलाल सिन्हा ने फैसला सुनाया तो इंदिरा गांधी की न सिर्फ सांसदी गई, बल्कि छह साल तक चुनाव लड़ने पर भी रोक लग गई.
ऐसा ही किस्सा बाल ठाकरे का भी है. 80 के दशक में शुरू हुआ बाल ठाकरे का बुखार 90 के दशक में पूरी मुंबई को चपेट में ले चुका था. मुंबई उनके जूते की नोक पर थी. ऐसे में 28 जुलाई, 1999 को एक गज़ट नोटिफिकेशन निकाल कर बाल ठाकरे के छह साल चुनाव लड़ने पर रोक लगाई गई. उनका नाम वोटर लिस्ट से भी हटा लिया गया. कारण - उन्होंने 1986 के विधानसभा चुनावों में भड़काऊ भाषण दिए थे. ये चुनाव आयोग के नियमों का उल्लंघन है. महाराष्ट्र कैबिनेट में मंत्री रहे कांग्रेस नेता प्रभाकर कुंते ने इसकी शिकायत बंबई हाईकोर्ट में की थी. बाल ठाकरे यहां केस हारे और सुप्रीम कोर्ट भी. इसके बाद चुनाव आयोग की सलाह पर राष्ट्रपति के आर नारायणन ने बाल ठाकरे को 11 दिसंबर, 1995 से लेकर 10 दिसंबर, 2001 तक चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने से बैन कर दिया था.

बाल ठाकरे 90 के दशक में मुंबई का रिमोट अपने हाथ में रखते थे. पर नियम तोड़ने पर वोटर लिस्ट से नाम कटा, तो कटा.
जसवंत के खिलाफ अलवर ज़िला कांग्रेस अध्यक्ष टीकाराम जूली ने दो शिकायतें चुनाव आयोग के पास दर्ज कराई हैं. एक शिकायत धार्मिक आधार पर वोट मांगने के बारे में है और दूसरी हज़ारों की संख्या में गाड़ियां पर्चा भरने के लिए लाने बाबत. ये जानने के लिए कि चुनाव आयोग अपनी ओर से या फिर टीकाराम जूली की शिकायत पर क्या एक्शन लेगा, हमने चुनाव आयोग को फोन मिलाया. हमारी बात अचल कुमार ज्योति (मुख्य चुनाव आयुक्त) के दफ्तर में हुई, जहां से हमें उप चुनाव आयुक्त सुदीप जैन के दफ्तर फोन करने को कहा गया. हमने वहां फोन किया तो हमें प्रमोद कुमार शर्मा के दफ्तर बात करने को कहा गया, क्योंकि राजस्थान का प्रभार उन्हीं के पास है. प्रमोद कुमार शर्मा ने कहा कि उन्हें फिलहाल आधिकारिक शिकायत नहीं मिली है. बाकी वो ''मीडिया से इंटरऐक्ट नहीं कर सकते.'' फिर हमें निर्वाचन आयोग में मीडिया एंड कम्यूनिकेशन के डायरेक्टर जनरल धीरेंद्र ओझा के दफ्तर का नंबर मिला. अंततः धीरेंद्र के दफ्तर फोन मिला तो वो छुट्टी पर निकले.
खैर, हम इतना तय जानते हैं कि जसवंत यादव ने देश का कानून तोड़ा है. और उन पर वैधानिक कार्रवाई बनती है.

EIC - चुनाव से संबंधित सारे SOP यहीं बनते बिगड़ते हैं.
नोटः
#1. राजस्थान की अलवर और अजमेर लोकसभा सीटों पर 29 जनवरी को उपचुनाव होने हैं. ये खाली हुई थीं जब भाजपा के संवर लाल जाट ( अजमेर) और महंत चंदनाथ (अलवर) का पिछले साल देहांत हो गया था.
#2. यदि हम आगे चुनाव आयोग का पक्ष मालूम कर पाए तो इस खबर को संपादित किया जाएगा.
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वहां अपना भाषण समेटते हुए जसवंत ने कहा,
''मैं मेवात में गया था वोट मांगने. गांव-गांव में मेरा स्वागत हुआ, नोटों की माला डाली गई. तो मैंने पूछा वोट? तो बोले साहब वोट तो नहीं देंगे. क्यों? तो बोले कि आप काम करते हैं. जब भी आपके पास गए, आपने हमारी अच्छे-बुरे में मदद की. तो मैंने कहा, बीजेपी का देश के अंदर राज है, ऊपर भी, नीचे भी... तो बोले साहब बीजेपी का नाम मत लो.

जसवंत सिंह यादव के खिलाफ कांग्रेस पार्टी की आधिकारिक शिकायत.
मैंने पूछा बीजेपी का नाम क्यों न लूं, फिर वोट मुझे कैसे दोगे? तो बोले तेरे नाम पर देंगे, बीजेपी के नाम पर नहीं देंगे. बीजेपी के नाम पर क्यों नहीं दोगे, तो बोले बीजेपी हिंदुओं की पार्टी है. इसका मतलब कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है. तो हिंदू हो तो मुझे वोट दो, मुसलमान हो तो कांग्रेस को वोट दो. फैसला कर लो अपना. राम राम.''

जसवंत यादव उपचुनाव के लिए जगह-जगह जाकर प्रचार कर रहे हैं. (फोटोः डॉ जसवंत सिंह यादव फेसबुक पेज से)
जसवंत की ये बात हर लिहाज़ से गलत है. और हम नैतिक वजहों से ऐसा नहीं कह रहे हैं. हम ठोस कानूनी वजहों की बात करेंगे. जसवंत ने धर्म के आधार पर वोट मांगा है. ये रेप्रेज़ेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट की धारा 123 (3) का उल्लंघन है. इसके मुताबिक कोई भी कैंडिडेट या उसका एजेंट धर्म के आधार पर वोट नहीं मांग सकता. न सिर्फ अपना धर्म, बल्कि विरोधी कैंडिडेट, उसके एजेंट या चुनाव में वोट डालने वाली जनता के धर्म, नस्ल, संप्रदाय, जाति और भाषा के आधार पर अपील नहीं की जा सकती.
123 (3), एक भाजपा कैंडिडेट और एक सर्वनाम का किस्सा
जसवंत की गलती इसलिए भी बड़ी है कि चुनाव में धार्मिक आधार पर वोट मांगना सही है कि नहीं, ये बात एक भाजपा कैंडिडेट के चलते ही साफ हुई थी.
1992 में बंबई हाईकोर्ट का एक फैसला आया. इसमें 1990 के चुनाव में महाराष्ट्र विधानसभा के लिए चुने गए भाजपा कैंडिडेट अभिरम सिंह का निर्वाचन रद्द कर दिया गया था. माने अभिरम की विधायकी चली गई थी. कारण - अभिरम ने हिंदू धर्म के आधार पर वोट मांगा था. अभिरम सुप्रीम कोर्ट गए. मामला पहले तीन जजों की बेंच के पास गया. फिर पांच जजों की संविधान बेंच के पास. यहां मालूम चला कि ठीक ऐसा मामला भाजपा के एक और नेता सुंदरलाल पटवा के खिलाफ भी चल रहा है. इन दोनों मामलों को मिलाकर 7 जजों की एक और बड़ी संवैधानिक बेंच के पास भेजा गया.

सुंदरलाल पटवा. धर्म के आधार पर वोट मांगने का एक मुकदमा इन पर भी चला था. ये अविभाजित मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे थे.
सारी बात आकर अटक गई रेप्रेज़ेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट की धारा 123 (3) और एक अंग्रेज़ी सर्वनाम 'his' पर. 123 (3) के तहत वो बातें लिखी हैं, जिन्हें चुनाव में भ्रष्टाचार माना जाएगा. कोर्ट ने इस बात पर खूब माथापच्ची की कि 123 (3) में 'his' जिस तरह इस्तेमाल हुआ है, उससे चुनाव में किसी भी तरह की धार्मिक या जातीय अपील पर पूरी तरह रोक लगती है कि नहीं. बेंच ने 2 जनवरी, 2017 को 4:3 के बहुमत से फैसला दिया कि धारा 123 (3) के तहत धार्मिक आधार पर वोट नहीं मांगे जा सकते क्योंकि धर्म एक व्यक्ति और उसके ईश्वर के बीच निजी मुद्दा है और चुनाव एक धर्मनिरपेक्ष प्रक्रिया है, जिससे धर्म को दूर रखा जाना चाहिए.

इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के बावजूद सांसदी खो दी, क्योंकि उन्होंने नियम तोड़ा था.
'आइरन लेडी' से लेकर 'सरकार' तक सब नपे हैं इससे पहले
सुप्रीम कोर्ट का फैसला (संविधान बेंच का भी) देश में कानून की तरह होता है. इस हिसाब से जसवंत ने कानून तोड़ा है. और अगर जसवंत को लगता हो कि कुछ दिन मामला रफा-दफा हो जाएगा, तो ये उनका भ्रम है. हमारे यहां चुनाव आयोग के नियम तोड़े जाने पर प्रधानमंत्रियों तक की सांसदी गई है. 1971 के चुनाव में एक सरकारी अधिकारी यशपाल कपूर ने इंदिरा गांधी के लिए रायबरेली में बतौर इलेक्शन एजेंट काम किया था. सरकारी अधिकारी सेवा में रहते किसी पार्टी से नहीं जुड़ सकते. इसकी शिकायत हुई, मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट गया. जस्टिस जगमोहनलाल सिन्हा ने फैसला सुनाया तो इंदिरा गांधी की न सिर्फ सांसदी गई, बल्कि छह साल तक चुनाव लड़ने पर भी रोक लग गई.
ऐसा ही किस्सा बाल ठाकरे का भी है. 80 के दशक में शुरू हुआ बाल ठाकरे का बुखार 90 के दशक में पूरी मुंबई को चपेट में ले चुका था. मुंबई उनके जूते की नोक पर थी. ऐसे में 28 जुलाई, 1999 को एक गज़ट नोटिफिकेशन निकाल कर बाल ठाकरे के छह साल चुनाव लड़ने पर रोक लगाई गई. उनका नाम वोटर लिस्ट से भी हटा लिया गया. कारण - उन्होंने 1986 के विधानसभा चुनावों में भड़काऊ भाषण दिए थे. ये चुनाव आयोग के नियमों का उल्लंघन है. महाराष्ट्र कैबिनेट में मंत्री रहे कांग्रेस नेता प्रभाकर कुंते ने इसकी शिकायत बंबई हाईकोर्ट में की थी. बाल ठाकरे यहां केस हारे और सुप्रीम कोर्ट भी. इसके बाद चुनाव आयोग की सलाह पर राष्ट्रपति के आर नारायणन ने बाल ठाकरे को 11 दिसंबर, 1995 से लेकर 10 दिसंबर, 2001 तक चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने से बैन कर दिया था.

बाल ठाकरे 90 के दशक में मुंबई का रिमोट अपने हाथ में रखते थे. पर नियम तोड़ने पर वोटर लिस्ट से नाम कटा, तो कटा.
तो जब इंदिरा गांधी और बाल ठाकरे पर चुनाव आयोग के बनाए नियमों को तोड़ने पर इतनी सख्त सज़ा हो सकती है, तो जसवंत सिंह पर तो कड़ी कार्रवाई करने में कोई अड़चन नहीं आनी चाहिए.लेकिन चुनाव आयोग को शिकायत ही नहीं मिली!
जसवंत के खिलाफ अलवर ज़िला कांग्रेस अध्यक्ष टीकाराम जूली ने दो शिकायतें चुनाव आयोग के पास दर्ज कराई हैं. एक शिकायत धार्मिक आधार पर वोट मांगने के बारे में है और दूसरी हज़ारों की संख्या में गाड़ियां पर्चा भरने के लिए लाने बाबत. ये जानने के लिए कि चुनाव आयोग अपनी ओर से या फिर टीकाराम जूली की शिकायत पर क्या एक्शन लेगा, हमने चुनाव आयोग को फोन मिलाया. हमारी बात अचल कुमार ज्योति (मुख्य चुनाव आयुक्त) के दफ्तर में हुई, जहां से हमें उप चुनाव आयुक्त सुदीप जैन के दफ्तर फोन करने को कहा गया. हमने वहां फोन किया तो हमें प्रमोद कुमार शर्मा के दफ्तर बात करने को कहा गया, क्योंकि राजस्थान का प्रभार उन्हीं के पास है. प्रमोद कुमार शर्मा ने कहा कि उन्हें फिलहाल आधिकारिक शिकायत नहीं मिली है. बाकी वो ''मीडिया से इंटरऐक्ट नहीं कर सकते.'' फिर हमें निर्वाचन आयोग में मीडिया एंड कम्यूनिकेशन के डायरेक्टर जनरल धीरेंद्र ओझा के दफ्तर का नंबर मिला. अंततः धीरेंद्र के दफ्तर फोन मिला तो वो छुट्टी पर निकले.
खैर, हम इतना तय जानते हैं कि जसवंत यादव ने देश का कानून तोड़ा है. और उन पर वैधानिक कार्रवाई बनती है.

EIC - चुनाव से संबंधित सारे SOP यहीं बनते बिगड़ते हैं.
नोटः
#1. राजस्थान की अलवर और अजमेर लोकसभा सीटों पर 29 जनवरी को उपचुनाव होने हैं. ये खाली हुई थीं जब भाजपा के संवर लाल जाट ( अजमेर) और महंत चंदनाथ (अलवर) का पिछले साल देहांत हो गया था.
#2. यदि हम आगे चुनाव आयोग का पक्ष मालूम कर पाए तो इस खबर को संपादित किया जाएगा.
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