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'जो सांड को काबू में लाएगा, उसे इनाम में 21 साल की लड़की मिलेगी'

जल्लीकट्टू के एक मुकाबले में ये मुनादी की गई.

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पोंगल के त्योहार के साथ जुड़ी हुई है जलीकट्टू की परंपरा. इसकी शुरुआत संगम पीरियड में हुई थी.
पोंगल बीत चुका है. जल्लीकट्टू शुरू हो चुका है. इसकी वजह से मरने वाले खबरों का हिस्सा बनने लगे हैं. ये सब ऐसा ही है, जैसा हर साल होता है. मगर इस साल इस खेल में कुछ नई चीजें भी जुड़ रही हैं. जैसे- जीतने वाले को इनाम के तौर पर लड़की देने का वादा. पारंपरिक तौर पर इनाम में पैसा दिया जाता था. वेष्ठी (तमिल पुरुषों का पारंपरिक पोशाक) दी जाती थी. ये लड़की देने का वादा करना जल्लीकट्टू की नई 'उपलब्धि' है.
जिन सांडों और बैलों का इस खेल में इस्तेमाल किया जाता है, उन्हें उत्तेजित करने लिए उन्हें यातनाएं दी जाती हैं. शराब पिलाई जाती है. ड्रग्स दिया जाता है.
जिन सांडों और बैलों का इस खेल में इस्तेमाल किया जाता है, उन्हें उत्तेजित करने लिए उन्हें यातनाएं दी जाती हैं. शराब पिलाई जाती है. ड्रग्स दिया जाता है.

'जीतने वाले को इनाम में 21 साल की लड़की मिलेगी' तमिलनाडु में एक गांव है. पेरिया अनइकाराइपट्टी. यहां जल्लीकट्टू का एक बड़ा आयोजन होना था. सांड और इंसानों के बीच होने वाले इस 'सांस्कृतिक' खेल की मुनादी करने वाले एक शख्स ने शायद नशा कर लिया था. खुलेआम बोला कि जो जीतेगा, उसे बतौर इनाम एक लड़की दी जाएगी. लड़की की उम्र भी बताई गई. ठीक-ठीक 21 साल. हालांकि बाद में आयोजकों ने कहा कि ऐसा कोई ऑफर नहीं है. मगर अनाउंसर ने इस तरह का घटिया ऑफर यूं खुलेआम देने की हिम्मत की, ये हैरान करने वाली बात है. ऐसे वाकये तो इतिहास में और किस्से-कहानियों में मिलते हैं. कि राजा ने मुनादी पिटवाई. जो भी जंग जीतने का रास्ता सुझाएगा, उसके साथ अपनी बेटी की शादी करवा देगा. कि राजा ने घोषणा कराई कि जो भी उसकी बीमारी ठीक कर देगा, उसके हाथ में अपनी बेटी का हाथ दे देगा. या फिर ये कि फलां साम्राज्य में बहादुर योद्धाओं को जीत की निशानी के तौर पर इतनी दासियां दी जाती थीं. कहने को हम भले ही 21वीं सदी में हों, सोच का स्तर वो ही आदिम है. जब महिलाओं को ट्रॉफी और ट्रीट समझा जाता था.
हर साल जल्लीकट्टू के दौरान कई सारे लोग मारे जाते हैं. जिन सांडों के साथ ये खेल खेला जाता है, उनमें से ज्यादातर इतने घायल हो जाते हैं कि मर जाते हैं.
हर साल जल्लीकट्टू के दौरान कई सारे लोग मारे जाते हैं. जिन सांडों के साथ ये खेल खेला जाता है, उनमें से ज्यादातर इतने घायल हो जाते हैं कि मर जाते हैं.

सांड पर काबू करना, यानी असली मर्द होने का सर्टिफिकेट! जल्लीकट्टू बहुत पुराना खेल है. इसमें सांड से कुश्ती की जाती है. उसे काबू करने वाला विजेता माना जाता है. जीतने वाले के लिए ये उसकी ताकत का सर्टिफिकेट होता है. देखने वालों को इसमें मनोरंजन मिलता है. खेल को और उत्तेजक मनाने के लिए सांड को नशा दिया जाता है. शराब, ड्रग्स, सब. उससे भी नहीं संतुष्ट होते हैं, तो सांड को चोट पहुंचाते हैं. ताकि वो और भड़के. इतने भड़के हुए और मजबूत सांड पर काबू पाने वाला 'असली मर्द' माना जाता है. जानवरों की परवाह करने वाले कुछ संगठन इस खेल पर बैन लगाने की मांग करने सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे. कोर्ट ने बैन लगा भी दिया था. तमिलनाडु के लोग नहीं माने मगर. सड़कों पर उतर आए. हिंसा होने लगी. जल्लीकट्टू मरने-मारने का सवाल बन गया. ये संस्कृति और आस्था का सवाल बन गया. कमल हसन और रजनीकांत जैसे तमिल सुपरस्टार्स भी इसी बोली में बोल रहे थे. स्थितियां इतनी बिगड़ गईं कि जल्लीकट्टू को फिर हरी झंडी मिल गई.


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