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ISRO के INSAT-3DS को अंतरिक्ष में ले गया 'नॉटी बॉय' क्या है? दोनों मिलकर बड़ी तकलीफ दूर करेंगे

INSAT-3D और INSAT-3DR सैटेलाइट को कुछ साल पहले ISRO ने अंतरिक्ष में लॉन्च किया था. अब INSAT-3DS इन दोनों सैटेलाइट्स के साथ मिलकर दोनों सैटेलाइट्स की काम करने की क्षमता को बढ़ाने और बेहतर करने में मदद करेगा.

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GSLV-F14 रॉकेट को 'नॉटी बॉय' नाम से भी जाना जाता है. (फोटो: आजतक)

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने 17 फरवरी को मौसम की सटीक जानकारी देने के लिए एक सैटेलाइट लॉन्च किया है. INSAT-3DS. आंध्र प्रदेश के श्री हरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से शाम 5:35 पर इसे लॉन्च किया गया. इस सैटेलाइट को अपनी मंजिल तक पहुंचाया है ISRO के 'नॉटी बॉय' GSLV-F14 ने. GSLV का पूरा नाम Geosynchronous Launch Vehicle है. ISRO के इस मिशन को फंड किया था मिनिस्ट्री ऑफ अर्थ साइंसेज ने. जनवरी में PSLV-C58 मिशन के बाद ये ISRO का इस साल का ये दूसरा मिशन है. इससे पहले INSAT सीरीज के आखिरी सैटेलाइट को साल 2016 में लॉन्च किया गया था. इस रिपोर्ट में हम जानेंगे,

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1- ये मिशन क्या है? 
2- नॉटी बॉय क्यों है GSLV-F14?
3-INSAT-3DS अंतरिक्ष में क्या करेगा? 
4- कौन सी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है?

#सैटेलाइट का काम क्या है?

पहले बात इस मिशन की. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस मिशन के तहत ISRO का टारगेट मौसम की सटीक जानकारी जुटाना है. इस मिशन के तहत ये सैटेलाइट मिनिस्ट्री ऑफ अर्थ साइंसेज, भारतीय मौसम विभाग(IMD), राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान(NIOT), राष्ट्रीय मध्यम अवधि मौसम पूर्वानुमान केंद्र और भारतीय राष्ट्रीय समुद्र सूचना सेवा केंद्र को अपनी सर्विस देगा. हालांकि INSAT-3DS से पहले भी ISRO ने मौसम की जानकारी जुटाने के लिए सैटेलाइट लॉन्च किए हैं. फिर इसकी जरूरत क्या है?

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#INSAT-3DS क्या करेगा?

INSAT-3D और INSAT-3DR सैटेलाइट को कुछ साल पहले ISRO ने लॉन्च किया था. अब INSAT-3DS इन दोनों सैटेलाइट्स के साथ मिलकर दोनों सैटेलाइट्स की काम करने की क्षमता को बढ़ाने और बेहतर करने में मदद करेगा. इसके साथ मौसम का अनुमान और बेहतर तरीके से लगाया जा सकेगा. साथ ही तटीय क्षेत्रों जैसे महासागरीय सतहों पर नजर रखकर प्राकृतिक आपदा को लेकर भी बेहतर जानकारी जुटा लोगों को पहले वार्निंग देने में मदद करेगा. इस सैटेलाइट का ऑर्बिट 170 पेरिजी और 36647 एपोजी होगा. ये अंडाकार जियो ट्रांसफर ऑर्बिट कक्षाओं में चक्कर लगाएगा.

अब पेरोजी और एपोजी को चंदा मामा से समझिये. चांद धरती का प्राकृतिक सैटेलाइट है. INSAT भी सैटेलाइट है, जो इंसानों द्वारा बनाया गया है.चांद जब धरती के सबसे पास होता है तो उस पॉइंट को पेरोजी कहते हैं. वहीं जब चांद धरती से सबसे दूर होता है तो उसे एपोजी कहते हैं. इसी तरह से INSAT धरती से सबसे करीब 170 किलोमीटर पर रहेगा. वहीं सबसे दूर 36647 किलोमीटर पर. 

INSAT-3DS - Wikipedia
INSAT-3DS
#INSAT-3DS में टेक्नोलॉजी

पहले इसके वजन और टेक्नोलॉजी के बारे में जानते हैं. इस सैटेलाइट का वजन 2274 किलोग्राम है.

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1- इसमें कुल 6 चैनल इमेजर हैं. किसी भी सैटेलाइट में मौजूद चैनल इमेजर धुंध और धूल को डिटेक्ट करता है.

2- 19 चैनल साउंडर. साउंडर का काम इलाके-इलाके के हिसाब से तापमान और नमी को माप कर उसे यूजर तक 3D डायग्राम बनाकर पहुंचाना होता है.

3- साथ ही सैटेलाइट में कम्यूनिकेशन पेलोड्स(Communication Payloads) के साथ डेटा रिले ट्रांसपोंडर भी मौजूद है. कम्युनिकेशन पेलोड का काम डेटा रिसीव करना और पहुंचाना होता है. वहीं डेटा रिले ट्रांसपोंडर नदी, नहर और पोखर में होने वाली गतिविधियों पर नजर रखकर डाटा जमा करता है.

4- SAS&R ट्रांसपोंडर का फुल फॉर्म- एडवांस एडेड सर्च एंड रेस्क्यू. इसका काम, मुश्किल में पड़े यूजर्स से डिस्ट्रेस सिग्नल्स को रेस्क्यू सेंटर्स तक पहुंचाना है.

#ISRO का बच्चा नॉटी बॉय क्यों?

इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के मुताबिक ISRO के पास तीन रॉकेट हैं तो सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष तक पहुंचाने में मदद करते हैं. GSLV-F14, PSLV, LVM3(पहले इसे GSLV-Mk3 के नाम से जाना जाता था). INSAT-3DS को अपनी ऑर्बिटल कक्षा तक पहुंचाया है GSLV-F14 ने. ये GSLV-F14 का 16वां मिशन था. अच्छी बात है. लेकिन इस रॉकेट के साथ एक चीज और जुड़ी है. फेलियर रिकॉर्ड. ISRO के सभी रॉकेट्स में सबसे ज्यादा फेल होने का रिकॉर्ड इसी के पास है. इसका फेलियर रेट 40 प्रतिशत है. अपने पंद्रह मिशन में से छह मिशन में ये फेल हो चुका है. आखिरी बार अगस्त 2021 में EOS-03 सैटेलाइट को अंतरिक्ष में ले जाते वक्त ये अंडमान समुद्र में गिर गया था. हालांकि पिछले साल मई में इसने एक मिशन को अच्छे से पूरा किया था.

Isro begins countdown to GSLV-F14 launch with INSAT-3DS mission - India  Today
GSLV-F14(फोटो: आजतक)

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#इतना फेल क्यों होता है?

GSLV PSLV से ज्यादा क्षमता रखता है. PSLV के मुकाबले GSLV 2200 किलो ज्यादा वजन उठाकर जियोस्टेशनरी ऑर्बिट्स में पहुंचाने के काबिल है और 6000 किलो वजन लो अर्थ ऑर्बिट तक पहुंच सकता है. लेकिन इसकी फेलियर का सबसे बड़ा कारण हैं क्रायोजेनिक इंजन. लेकिन GSLV में इस्तेमाल किया गया क्रायोजेनिक इंजन रसियन डिजाइन पर रिवर्स इंजीनियर किया गया है. रिवर्स इंजीनियरिंग करने के पीछे इतिहास है. साल 1980 के ISRO और रूस के बीच क्रायोजेनिक इंजन सप्लाई करने पर डील हुई थी. लेकिन ये डील अमेरिका के प्रेशर में आ गई थी. अमेरिका का दावा था कि ये डील मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम की अवहेलना कर रही है. इसके चलते इस डील को तोड़ दिया गया था. लेकिन तब तक रूस कुछ क्रायोजेनिक इंजन भारत तक पहुंचा चुका था. लेकिन इसमें इस्तेमाल होने वाली टेक्नोलॉजी नहीं पहुंचा पाया. जिसके चलते भारत ने खुद से रिवर्स इंजीनियरिंग के जरिए अपने खुद के क्रायोजेनिक इंजन बनाने की कोशिश की. जिनमें से एक GSLV में इस्तेमाल किया जाता है और वो ही इसके फेलियर की वजह बना हुआ है.

क्रायोजेनिक इंजन तीसरी और आखिरी स्टेज की उड़ान को पॉवर करता है. चूंकि हाइड्रोजन को रॉकेट के लिए सबसे मुफीद फ्यूल माना जाता है. तो इसके इंजन में लिक्विड हाइड्रोजन, फ्यूल के तौर पर इस्तेमाल की जाती है. लेकिन इसे लिक्विड के मुकाबले प्राकृतिक गैस की फॉर्म में होल्ड करना काफी मुश्किल है, लेकिन इसे लिक्विड फॉर्म में लाने के लिए काफी कम टेंपरेचर की जरूरत होती है. करीब -250 डिग्री सेल्सियस. और यही पेंच है. पेंच ये कि इसे जलाने के लिए चाहिए ऑक्सीजन, वो भी लिक्विड फॉर्म में. ऑक्सीजन को लिक्विड स्टेट में लाने के लिए चाहिए -90 डिग्री तापमान. दोनों के मेल्टिंग और फ्रीजिंग प्वाइंट अलग होने की वजह से इसमें दिक्कतें आना भी एक वजह हो सकती है.

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