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हिंदुओं के ये ठेकेदार 26 जनवरी को काला दिवस क्यों मनाते हैं?

मेरठ में हर साल ये लोग गणतंत्र दिवस को मातम मनाते हैं. इनके हिसाब से इस दिन 'हिंदुओं' का अपमान हुआ था.

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फोटो - thelallantop
हम भारत के लोग... इन शब्दों के साथ शुरू होने वाले भारत के संविधान ने देश को पिछले 67 सालों में एक गणतंत्र के तौर पर काफी कुछ दिया है. बंटवारे की भीषण त्रासदी और चार युद्धों के बावजूद आज हम मंगल पर पहुंच गए. जबकि हमारे साथ आज़ाद हुआ पड़ोसी अभी बॉर्डर पार पहुंचने की जुगत में ही फंसा है. हमारे संविधान की मैच्योरिटी ही है कि दो साल पहले राजपथ पर प्रदर्शन करने वाले मुख्यमंत्री को इस बार वीआईपी के तौर पर बुलाया जाता है. असहमत होने की सहमति दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की विविधता बनाए रखने का ज़रूरी तत्व है. मगर हिंदुस्तान में एक समूह ऐसा भी है जो हर साल इस राष्ट्रीय पर्व का विरोध करता है. हिंदू महासभा से जुड़े कई लोग गणतंत्र दिवस को काले दिवस के तौर पर मनाते हैं.
उत्तर प्रदेश की न्यूज़ देने वाली कई वेबसाइट्स ने खबर की है कि हिंदू महासभा के कार्यकर्ताओं ने गणतंत्र दिवस से एक दिन पहले की शाम को मेरठ में काले झंडे फहराए. हिंदू महासभा के कार्यकर्ताओं के हिसाब से इस दिन हिंदू धर्म को बहुत बड़ा नुकसान हुआ था. देश को धर्म निरपेक्ष बना दिया गया था. कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रपति को एक ज्ञापन देते हुए भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग की. पुलिस की मौजूदगी के कारण ये प्रदर्शन अपनी हदों में सिमटा रहा.
वैसे संविधान और धर्मनिरपेक्षता पर सवाल उठाने वाले ये लोग पहली बार ऐसा नहीं कर रहे हैं. द हिंदू के मुताबिक हिंदू महासभा हर साल ऐसा करती है. 2016 में भी ये प्रदर्शन हुआ था. तब महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पंडित अशोक शर्मा ने इस प्रोटेस्ट का आयोजन किया था.
शर्मा ने द हिंदू से कहा भी था कि वो संविधान में विश्वास नहीं करते. उनके जीवन का उद्देश्य भारत को वापस हिंदू राष्ट्र बनाना है. वो जीवन के 51 सालों में लगातार धर्मनिरपेक्षता का विरोध करते रहे हैं. वैसे आपको बता दें कि ये वही लोग हैं जिन्होंने नाथूराम गोडसे को शहीद बताते हुए मेरठ में भूमि पूजन किया था.
साथियों के साथ अशोक शर्मा.
साथियों के साथ अशोक शर्मा.

हिंदुस्तान के संविधान पर सवाल खड़े करने वाले और गणतंत्र दिवस का विरोध करने वाले इन लोगों पर तरस आना चाहिए. अभिव्यक्ति की आज़ादी और संविधान का विरोध करने के लिए ये लोग राष्ट्रपति को ज्ञापन देते हैं जो कि अपने आप में संविधान की एक प्रक्रिया है. खैर, हिंदुस्तान का संविधान लोगों को सवाल उठाने की इजाज़त देता है. जब तक लोग बिना समुदायों को भड़काए और देश के बुनियादी ढांचे को नुक्सान पहुंचाए अपनी बात कहते हैं, उन्हें ऐसा करने देना चाहिए. मगर इसके पीछे उनके उद्देश्य और ऐसे लोगों को सियासी फायदों के लिए इस्तेमाल करने वालों पर भी सवाल उठाने चाहिए.


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