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वॉट्सऐप पर किसी को 'गुड मॉर्निंग' भेजने से पहले जान लो कि ये कितना खतरनाक है

दोबारा किसी को 'गुड मॉर्निंग' का मेसेज न भेजोगे, न किसी को भेजने दोगे.

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हर सुबह बिना नागा वॉट्सऐप पर 'गुड मॉर्निंग' और 'शुभ प्रभात' वाले मेसेजों की सुनामी ठेलने वालों को ये खबर पक्का पढ़नी चाहिए. मालूम तो लगे उन्हें कि उन्होंने क्या कारनामा कर दिखाया है.
फोन पर आए नोटिफिकेशन्स की आवाज ने मुर्गे की बांग को रिप्लेस कर दिया है. आप जगते बाद में हैं, आपके वॉट्सऐप में 'गुड मॉर्निंग' का मेसेज पहले आ जाता है. हो सकता है कि आप इस 'गुड मॉर्निंग' प्रथा के सताये हुए हों. हो सकता है कि आप खुद भी इसके फलने-फूलने में पूरा साथ देते हों. जो भी वजह हो, ये खबर पढ़िए. और जानिए, वॉट्सऐप का ये आतंक अब अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन गया है.
मेरे वॉट्सऐप पर कुल 112 लोग हैं. इनमें से बस दो-तीन हैं जिन्हें मैं पढ़ती हूं. एक दफ्तर का ग्रुप है. जहां काम की बातें होती हैं. बाकी एक-दो दोस्त हैं. जिनसे अक्सर बात होती है. ज्यादातर काम के सिलसिले में. लिंक वगैरह भेजते हैं हम लोग एक-दूसरे को. बस. बाकी तीन-चार ऐसे लोग हैं, जिनसे महीने में कभी बात होती है. कभी उनको कोई काम पड़ता है. कभी मुझे. हमारे बीच वॉट्सऐप भी तभी यूज होता है. कुछ भेजने-रिसीव करने के लिए. इन पांच-छह कॉन्टैक्ट को छोड़कर बाकी किसी में नहीं झांकती मैं. पर उनके ऊपर मेसेज आता है. रोजाना. गुड मॉर्निंग का मेसेज. त्योहार पर हैपी-हैपी वाला मैसेज. आगे फॉरवर्ड करो, नया निकला है ये जोक टाइप मेसेज. सब फालतू. महीने में कभी एक बार इनको खोलकर सफाई कर देती हूं. पिछला सब डिलीट. एक क्लिक में. मुझे मुक्ति मिल जाती है. आप इसे रिश्तेदारों-दोस्तों से बरतने का मेरा 'मध्यम मार्ग' मान सकते हैं.
हमलोग इसपर चुटकुले बनाते थे. हंसते थे. तब किसी को मालूम भी नहीं होगा कि ये मुद्दा अंतरराष्ट्रीय समस्या बनने वाली है.
हमलोग इसपर चुटकुले बनाते थे. हंसते थे. तब किसी को मालूम भी नहीं होगा कि ये मुद्दा अंतरराष्ट्रीय समस्या बनने वाली है.

ये 'गुड मॉर्निंग' की बाढ़ इंटरनेट के सिर का बोझा बन गई है मुझे मुक्ति मिल जाती है. मगर इंटरनेट को मुक्ति नहीं मिलती. ये 'गुड मॉर्निंग' के मेसेज इंटरनेट का दम घोंट रहे हैं. इनके मारे इंटरनेट के गलफड़ को ऑक्सीजन की सप्लाइ नहीं मिल रही. जाम लग रहा है वहां. ये बात गूगल ने कही है. और ये मेसेज भेजने की बीमारी हम हिंदुस्तानियों के सिर-माथे आई है. कई लोग हैं, जिनके लोग स्मार्टफोन का मतलब ही वॉट्सऐप और फेसबुक है. इनमें वो लोग भी खूब हैं, जिनकी जिंदगी वॉट्सऐप पर मेसेज भेजने में खर्च हो रही है. पहले गूगल पर गुड मॉर्निंग के मेसेज खोजते हैं. फिर उसको डाउनलोड करते हैं और वॉट्सऐप पर फॉरवर्ड कर देते हैं. भारत में कुल 20 करोड़ लोग वॉट्सऐप पर ऐक्टिव हैं. सोचिए, इतने सारे लोग मिलकर इंटरनेट पर कितना भयंकर ट्रैफिक जाम लाते होंगे. हम हिंदुस्तानियों ने बैठे-बिठाए एक अंतरराष्ट्रीय समस्या को जन्म दे दिया है. जिस साइबर स्पेस में एक से एक जरूरी चीजें स्टोर की जा सकती हैं, उसको हम ऐसे फालतू मेसेजों में बर्बाद कर रहे हैं. धरती पर भीड़ बढ़ाने वालों में तो हम शुमार हैं ही, अब इंटरनेट पर धक्कमपेल मचाने में भी पूरा योगदान दे रहे हैं.
हम हिंदुस्तानी जो न करें, वो ही बहुत है जब इंटरनेट आया था, तब हमको बताया गया कि ये ब्रह्मांड जैसा है. माने, अनंत. जैसे ब्रह्मांड की कोई हद नहीं, वैसे ही इंटरनेट पर भी जगह की कोई कमी नहीं. मगर हम हिंदुस्तानियों ने ये बात भी झूठी साबित कर दी. हमारे हाथों भेजे गए 'गुड मॉर्निंग' वाले मेसेज संभालकर रख सके, इतनी जगह इस अथाह इंटरनेट के पास भी नहीं. साइबर की अनंत दुनिया भी हमारे सामने छोटी पड़ रही है. वॉल स्ट्रीट जनरल नाम का एक अखबार है. अमेरिका में. उसने दी है ये खबर. गूगलवाले पिछले कुछ दिनों से एक पहेली बूझ रहे थे. कि इंडिया में इतने सारे लोगों का मोबाइल भर क्यों जाता है? वो भी इतनी जल्दी-जल्दी. बहुत जांच-पड़ताल के बाद पता चला कि ये सब 'गुड मॉर्निंग' की कारस्तानी है. हमारे यहां तो पहले से ही चुटकुले चलते थे. कि कैसे हर सुबह रिश्तेदारों के भेजे 'गुड मॉर्निंग' संदेशों से हमारे मोबाइल में सुनामी आती है. गूगल ने जो कहा है, उसके बाद वो चुटकुले 'डार्क ह्युमर' में तब्दील हो गए हैं.
आप अपना वॉट्सऐप खोलकर देखिए. वहां ज्यादातर लोग आपको ऐसे ही मेसेज भेजते मिलेंगे.
आप अपना वॉट्सऐप खोलकर देखिए. वहां ज्यादातर लोगों ने आपको ऐसे ही मेसेज भेजे होंगे. एक भी ऑरिजनल नहीं. सब नकल वाला माल.

वॉट्सऐप न हुआ, रिश्तेदारी निभाने का दूत हो गया मैंने शुरू में ही रिश्तेदारी का जिक्र किया था. एक बार फिर मेरे दिमाग में रिश्तेदारी ही कौंध रही है. पहले जमा परिवार हुआ करते थे. पूरा कुनबा एक जगह रहा करता था. ज्यादातर ऐसा होता था कि आप जिस शहर में पैदा हुए, उसी शहर में नौकरी भी करते थे. लोगों को घर-बार छोड़कर दूसरे शहरों में जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी. अब ऐसा नहीं है. जॉइंट फैमिली और चीता एक जैसी बातें लगती हैं. विलुप्त होने की कगार पर. ऊपर से लोग इतने कामकाजी हो गए हैं कि रिश्तेदारी निभाने का मौका ही नहीं मिल पाता है. तो शायद ये वॉट्सऐप पर मैसेज भेजना कइयों के लिए रिश्तेदारी निभाने का जरिया है. कइयों के लिए मजबूरी है. रिश्तेदारों के वॉट्सऐप ग्रुप होते हैं. मायके साइड का अलग ग्रुप. ससुराल की साइड का अलग ग्रुप. आपको सबमें शरीक होना पड़ता है. हाल-चाल पूछना पड़ता है. ऐक्टिव दिखने के लिए फॉरवर्डेड मेसेजों से बेहतर क्या होगा. कहीं से आए, आगे ठेल दो. एक ग्रुप पर आया मेसेज दूसरे ग्रुप पर भेज दो. ऐसी और भी कई वजहें होंगी.
बदनाम हुए तो क्या, नाम तो हुआ ही वैसे भी खलिहर लोग खूब हैं अपने इस मुल्क में. और कुछ नहीं, तो वॉट्सऐप पर मेसेज ही भेज दो. सोचते होंगे कि फूल-पत्ती में लिपटा मेसेज और इंप्रेशन बढ़ाएगा. इस सोचने और निभाने के चक्कर में इंटरनेट की वॉट लग जाएगी, ये किसने सोचा था. जिन लोगों का अरमान था कि भारत 'दुनिया में नाम करे' वो खुश हो सकते हैं. बदनाम हुए तो क्या, नाम तो हुआ.


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