गिरोंग पोर्ट. चीन और नेपाल के बीच बिजनेस का सबसे अहम स्पॉट. 26 अगस्त को यहां का एक वीडियो सामने आया था, जिसमें पलक झपकते ही पानी के सैलाब ने इमिग्रेशन सेंटर बिल्डिंग को धराशायी कर दिया. लोग अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे. लेकिन पानी का बहाव इतना विकराल था कि संभलने तक का मौका नहीं मिला. कुछ मिनटों में सब तबाह. ये वीडियो उस दिन दुनियाभर में इंटरनेट पर देखा गया. एक ऐसा सबूत जिसने वहां मची भीषण तबाही का असली पैमाना दिखाया. लेकिन अब चीन ने इस वीडियो को सभी जगहों से हटा लिया है.
गिरोंग पोर्ट की तबाही के वीडियो 'गायब', तिब्बत में बाढ़ का सच क्यों छिपा रहा चीन?
चीन-नेपाल के अहम गिरोंग पोर्ट में बाढ़ से हुई तबाही का वीडियो सामने आने के बाद कथित तौर पर उसे चीनी इंटरनेट से हटा दिया गया. नेपाल में तबाही की तस्वीरें दुनिया के सामने हैं, लेकिन तिब्बत की तरफ विदेशी मीडिया की एंट्री पर रोक और सीमित जानकारी ने चीन की सेंसरशिप पर सवाल खड़े किए हैं.

चीन के सरकारी समाचार बुलेटिन में इस वीडियो का केवल एक स्टिल फ्रेम ही दिखाया गया है. चाइनीज मीडिया के किसी भी प्लेटफॉर्म पर भी आपको ये वीडियो नहीं दिखेगा.
गिरोंग पोर्ट, तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (Tibet Autonomous Region) के शिगात्से प्रान्त के गिरोंग काउंटी में आता है. नेपाल की तरफ ये रसुवा जिले के रसुवागढ़ी बॉर्डर से जुड़ता है. ये पूरा बॉर्डर क्रॉसिंग संकरी हिमालयी घाटियों और त्रिशूली नदी के किनारे बसा है.
2015 के भूकंप के बाद जब तातोपानी-झांगमु क्रॉसिंग लंबे समय तक बंद रही, तब गिरोंग-रसुवागढ़ी बॉर्डर ही चीन और नेपाल के बीच व्यापार का सेंटर बना था. गिरोंग तिब्बत में आता है, और तिब्बत 1950 के दशक से चीन के कंट्रोल में सबसे संवेदनशील और सख्त पहरे वाला इलाका है.
गिरोंग बॉर्डर पोर्ट चीन के 'बेल्ट एंड रोड' नेटवर्क के लिए भी बेहद अहम है, जो चीन को दक्षिण एशिया से जोड़ता है. पिछले एक दशक में यहां बड़े लॉजिस्टिक्स जोन और पार्किंग लॉट बनाए गए हैं.
चीनी रेस्क्यू टीम पहुंची26 अगस्त को यहां से तबाही वाला वीडियो आया था. दो दिन बाद 28 अगस्त को यहां एक चीनी बचाव दल पहुंचा. सड़कें पूरी तरह बह जाने के कारण 21 बचाव कर्मियों और एक खोजी कुत्ते की टीम रस्सियों के सहारे घने जंगलों और खड़ी चट्टानों को पार करते हुए वहां पहुंची. ब्रिटिश अखबार द गॉर्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक, चाइनीज रेस्क्यू टीम को मलबे और खंडहर के अलावा कुछ नहीं मिला. बचाव कर्मी जू मिंगकी ने बताया,
वहां कोई सड़क नहीं बची थी, सिर्फ खंडहर ही नजर आ रहा था.
चीन के नंबर दो नेता प्रधानमंत्री ली कियांग भी गिरोंग का दौरा कर चुके हैं. लेकिन चीन ने यहां किसी भी विदेशी पत्रकार को आने की परमिशन नहीं दी है. इसलिए उन्हें चीन के सरकारी मीडिया पर ही निर्भर रहना पड़ रहा है, जो केवल रेस्क्यू ऑपरेशन दिखा रही है. इसे ऐसे समझिए कि तिब्बत के एक राहत केंद्र से किए गए वीडियो में रिपोर्टर ने पीछे बैठे किसी भी पीड़ित से बात तक नहीं की.
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चीन में सेंसरशिपवैसे चीन में सेंसरशिप कोई नई बात नहीं है. वहां इंटरनेट पर सिर्फ वही तस्वीरें और जानकारियां जारी की जाती हैं, जिन्हें सरकार की मंजूरी मिलती है. इस अचानक आई बाढ़ से मची तबाही का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है, क्योंकि अकेले नेपाल में ही मौतों का आंकड़ा 600 से पार पहुंच गया है. खतरा अभी टला नहीं है. इसके बावजूद, चीन ने कहा कि उसके यहां अब तक सिर्फ 5 लोगों की मौत हुई है. 558 लोग लापता हैं, जिनमें 260 विदेशी शामिल हैं.
चीन की तरफ से बस इतनी ही जानकारी दी गई है. इसके आगे कुछ नहीं. न तो बचे हुए लोगों की कोई आपबीती, न प्रभावित गांवों की कोई जानकारी, और न ही पीड़ित परिवारों की कोई समस्या. एक तरफ नेपाल ने दुनियाभर की मीडिया को खुली छूट दे रखी है कि वो आए और यहां की सिचुएशन को रिकॉर्ड करें लेकिन, तिब्बत में मनाही है. वहां केवल स्पेशल टीमों को सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों तक पहुंचने के लिए ऊंचे पहाड़ चढ़ते या उफनती नदियों को पार करते हुए दिखाया जा रहा है. वहां पहुंचने के बाद क्या हुआ, इसकी कोई जानकारी नहीं दी जा रही.
तिब्बत के हालात छिपा रहा चीन‘तिब्बत पीपल’ नाम के सोशल मीडिया अकाउंट ने दावा किया कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी तिब्बत की तरफ के हालात को पूरी तरह छिपाने और सेंसर करने में लगी है. तिब्बत का नाम लेने से बच रही है, मरने वालों का सही आंकड़ा छिपा रही है. स्थानीय लोगों को मदद करने से भी रोक रही है. ये बेहद शर्मनाक है.
एक दूसरे सोशल मीडिया अकाउंट से दावा किया गया कि वीचैट पर पोस्ट किए गए बाढ़ की तबाही के कई वीडियो इंटरनेट से हटा दिए गए. मदद की गुहार लगाते पीड़ितों के वीडियो भी कथित तौर पर डिलीट किए जा रहे हैं, सेंसर हो रहे हैं और उनके अकाउंट बैन किए जा रहे हैं.
इन अकाउंट से किेए गए किसी भी दावे की दी लल्लनटॉप पुष्टि नहीं करता है. ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक, तिब्बत के लोग विदेशी पत्रकारों से खुलकर बात नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि हर किसी के फोन में सरकारी निगरानी वाले ऐप्स इंस्टॉल होना जरूरी है.
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