चीन ने हथियारों की दुनिया में एक ऐसी क्षमता विकसित करने का दावा किया है, जिसने अमेरिका की चिंता बढ़ा दी है. रिपोर्ट के मुताबिक, चीनी सेना ऐसे हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल विकसित कर चुकी है, जो हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलें छोड़ सकते हैं. यानी जमीन या पारंपरिक लड़ाकू विमान से हमला करने के बजाय एक हाइपरसोनिक हथियार हजारों किलोमीटर दूर मौजूद किसी बेहद अहम विमान को निशाना बनाने की कोशिश कर सकता है.
अमेरिकी आसमान में उड़ रहे फाइटर जेट्स को मार गिरा सकती है चीन की नई मिसाइल
China’s New Hypersonic Weapon: चीन ने हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल से हवा से हवा में हमला करने वाली मिसाइलें छोड़ने की क्षमता विकसित की है. ये तकनीक अमेरिका के टैंकर, निगरानी विमान और उड़ते कमांड सेंटर जैसे अहम विमानों के लिए नई चुनौती बन सकती है. अब सवाल ये है कि चीन के बढ़ते मिसाइल भंडार से भारत को कितना खतरा है?

ब्लूमबर्ग ने 24 अगस्त 2026 की अपनी रिपोर्ट में एक ऐसे व्यक्ति के हवाले से ये जानकारी दी, जिसे मामले की सीधी जानकारी है. रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने कुछ हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में भी हवा से हवा में हमला करने की क्षमता जोड़ी है. इसके अलावा कई दूसरी मिसाइलों में जहाजों को निशाना बनाने की क्षमता भी जोड़ी गई है.
निशाने पर कौन से अमेरिकी विमान होंगे
इस तकनीक का सबसे बड़ा असर उन विमानों पर पड़ सकता है, जो खुद सीधे युद्ध नहीं लड़ते, लेकिन पूरी हवाई लड़ाई को चलाने में अहम भूमिका निभाते हैं. इनमें हवा में ईंधन भरने वाले टैंकर, हवाई चेतावनी और नियंत्रण विमान तथा उड़ता हुआ कमांड सेंटर शामिल हैं.
अमेरिकी वायुसेना का ई-4बी नाइटवॉच इसका सबसे चर्चित उदाहरण है. ऐसे विमान आम तौर पर मुख्य युद्ध क्षेत्र से काफी दूर रहकर कमांड और नियंत्रण की भूमिका निभाते हैं. अगर कोई हथियार इतनी दूरी तक पहुंचकर ऐसे विमान को निशाना बना सके, तो युद्ध के दौरान अमेरिकी हवाई ऑपरेशन की पूरी व्यवस्था पर असर पड़ सकता है.
आखिर हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल क्या है
हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल यानी एचजीवी को आसान भाषा में ऐसे समझिए कि ये एक ऐसा हथियार है, जिसे पहले रॉकेट या बैलिस्टिक मिसाइल ऊंचाई तक पहुंचाती है. इसके बाद इसका ग्लाइड व्हीकल वातावरण में बेहद तेज रफ्तार से आगे बढ़ता है और रास्ते में दिशा बदल सकता है.
यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है. पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइल का रास्ता अपेक्षाकृत अनुमान लगाने योग्य होता है, जबकि एचजीवी वातावरण में दिशा बदल सकता है. इससे उसे ट्रैक करना और रोकना ज्यादा मुश्किल हो सकता है. अमेरिकी रक्षा विभाग भी चीन के डीएफ-17 को एचजीवी से लैस मिसाइल के तौर पर दर्ज कर चुका है.
डीएफ-17 और डीएफ-27 कितनी दूर तक पहुंच सकते हैं
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, डीएफ-17 से छोड़ा गया हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल करीब 2,414 किलोमीटर तक पहुंच सकता है. ये दूरी चीन से अमेरिकी क्षेत्र गुआम की दूरी के लगभग बराबर है.
इससे भी ज्यादा लंबी दूरी के लिए डीएफ-27 अहम है. रिपोर्ट में इसकी अधिकतम अनुमानित दूरी करीब 8,000 किलोमीटर बताई गई है. इतनी दूरी इसे हवाई क्षेत्र में मौजूद बेहद दूर के लक्ष्यों के लिए भी संभावित खतरा बनाती है.
लेकिन यहां एक बड़ी पेंच भी है. किसी दूर उड़ रहे विमान को बैलिस्टिक मिसाइल से निशाना बनाना आसान काम नहीं है. मिसाइल को लक्ष्य तक पहुंचने में अधिकतम दूरी पर 20 मिनट या उससे ज्यादा लग सकते हैं. इतने समय में विमान अपनी स्थिति बदल सकता है. इसलिए मिसाइल को लगातार और बेहद सटीक जानकारी देने वाली लंबी सेंसर चेन की जरूरत होगी.
परमाणु युद्ध का खतरा भी जुड़ा है
इस तरह के हथियारों के इस्तेमाल में एक और गंभीर जोखिम है. जमीन से छोड़ी गई लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल को विरोधी देश शुरुआत में परमाणु हमले वाली मिसाइल भी समझ सकता है.
यही वजह है कि किसी पारंपरिक हमले और परमाणु हमले के बीच अंतर करना युद्ध के दौरान बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है. गलत आकलन की स्थिति में जवाबी कार्रवाई बहुत बड़े संकट में बदल सकती है. ब्लूमबर्ग ने भी इस समस्या को ऐसे हथियारों के इस्तेमाल की बड़ी जटिलताओं में गिना है.
चीन का मिसाइल भंडार कितना बड़ा है
अमेरिकी रक्षा विभाग के अनुमान के मुताबिक, 2024 में चीन के पास कम से कम 3,150 बैलिस्टिक मिसाइलें और करीब 300 जमीन से छोड़ी जाने वाली क्रूज मिसाइलें थीं. 2015 के अमेरिकी अनुमानों की तुलना में बैलिस्टिक मिसाइलों की संख्या में 147 प्रतिशत और जमीन से छोड़ी जाने वाली क्रूज मिसाइलों में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी बताई गई है.
ब्लूमबर्ग ने मई 2026 में अलग विश्लेषण में बताया था कि चीन के मिसाइल कार्यक्रम से जुड़ी 81 कंपनियों की पहचान की गई. 2025 में इन कंपनियों की बिक्री करीब 189 अरब युआन रही, जो एक साल पहले के मुकाबले 20 प्रतिशत ज्यादा थी. करीब 40 प्रतिशत कंपनियों ने 2013 के बाद अपने कार्यकाल का सबसे अच्छा साल दर्ज किया.
अमेरिका भी लंबी दूरी की मिसाइलों पर जोर दे रहा है
कहानी सिर्फ चीन की नहीं है. अमेरिका भी हवा से हवा में मार करने वाली लंबी दूरी की मिसाइलों को तेजी से आगे बढ़ा रहा है. एआईएम-174बी को एसएम-6 मिसाइल से विकसित किया गया है, हालांकि इसकी वास्तविक हवा से हवा में मारक दूरी सार्वजनिक नहीं है.
22 अगस्त 2026 को अमेरिकी नौसेना ने एआईएम-424 मैलिस की टेस्टिंग की जानकारी दी. इसकी बताई गई दूरी 300 मील यानी करीब 482 किलोमीटर से ज्यादा है. एआईएम-260 भी विकास और उत्पादन के दौर में है और इसे बेहद लंबी दूरी की हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल माना जा रहा है. यूरोप की मीटियर मिसाइल की मारक क्षमता 100 मील यानी करीब 161 किलोमीटर से ज्यादा बताई जाती है.
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असली बदलाव मिसाइल से ज्यादा युद्ध की सोच में है
चीन के नए हथियार की असली अहमियत सिर्फ इसकी रफ्तार या दूरी में नहीं है. बड़ा बदलाव ये है कि चीन अपने मिसाइल भंडार को अलग अलग सैन्य भूमिकाओं के लिए इस्तेमाल करने की दिशा में बढ़ रहा है.
अगर हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल से हवा से हवा में हमला करने की क्षमता वास्तव में बड़े पैमाने पर तैनात हो जाती है, तो युद्ध में सुरक्षित दूरी की पुरानी धारणा बदल सकती है. जो विमान अब तक युद्ध क्षेत्र से दूर रहकर कमांड, निगरानी और ईंधन आपूर्ति का काम करते थे, उन्हें भी ज्यादा जोखिम उठाना पड़ सकता है.
यही वजह है कि अमेरिकी वायुसेना के चाइना एयरोस्पेस स्टडीज इंस्टीट्यूट ने 2026 की अपनी रिपोर्ट में चीन के मिसाइल आधुनिकीकरण को ऐसे सिस्टम विकसित करने की दिशा में बताया, जिनका मकसद विरोधी की पूरी सैन्य व्यवस्था को एक साथ नुकसान पहुंचाना है.
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