बताओ. इस फौजी की उम्र भी 60 साल नहीं होगी.
देखो इस कहानी में देशभक्ति से जुड़ा हर मसाला है. सेना है. बॉर्डर है. कश्मीर का माइनस डिग्री वाला टेम्प्रेचर है. मुसीबतों और दुश्मनों से एक साथ लड़ता फौजी है. लेकिन एक कमी है. भारी वाला ब्लंडर. वहां शहीद नहीं है. हमको फौजी सिर्फ शहीद पसंद है. अपनी समस्या बताता है तो अच्छा नहीं लगता. वो अगर पानी जैसी दाल खा रहा है तो दारू पीकर नंगा नाच भी तो करता है. अगर 11 घंटे ठंड में खड़ा रहकर हमारी हिफाजत कर रहा है तो अपने सीनियर्स से बदसुलूकी भी तो की है. हमारे पास सौ लॉजिक हैं उसको विलेन साबित करने के. हम खोज रहे हैं इसकी सर्विस के दौरान की छोटी से छोटी गलती. ताकि उल्टे यही अपने जाल में फंस जाए.लेकिन गुरू इसकी सौ गलतियां निकल आएं, वो पानी जैसी दाल और सूखी रोटी तो नहीं बदलेगी. तेज बहादुर ने न्यूज चैनलों से बातचीत में ये भी बताया है कि उसे 16 बार सम्मानित किया जा चुका है. एक बार गोल्ड मेडल भी मिला है. अगर शराब पीकर पागलपन सवार हो जाता है इस पर तो बॉर्डर जैसी संवेदनशील जगह पर क्यों लगाया गया है सुरक्षा के लिए. कम से कम इसकी जांच की गुंजाइश तो है. बिना जांच बिना केस फैसला ऑन द स्पॉट. दिमाग में बॉबी देओल की क्रांति फिल्म चलाकर बैठे हैं हम. थोड़ी ठंड रखो भाई. फौज के नियम कायदे बड़े कड़े होते हैं. अनुशासन वहां पहले नंबर पर आता है. तो फौजी के खिलाफ एक्शन तो लिया जाता है, लिया जाएगा. लेकिन जो आरोप उसने लगाए हैं उनकी भी तो जांच हो जाने दो. पता तो लगे कौन बड़ा विलेन है. ऐसे क्विक रिएक्शन देने के चक्कर में हम कहीं अपने उन हीरोज़ का गला तो नहीं घोंट रहे जो बॉर्डर पर खड़े होने के अलावा चुनाव जितवाने में भी काम आते हैं.
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