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कौन हैं दिनेश्वर शर्मा, जिन्हें सरकार ने मसला-ए-कश्मीर हल करने चुना है?

अजीत डोवाल के काडर से हैं, उनके करीबी भी बताए जाते हैं.

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दिनेश्वर शर्मा जम्मू कश्मीर के गुटों से बात करने के लिए सरकार की ओर से वार्ताकार होंगे

भारत - पाकिस्तान - 1947 - कश्मीर.

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इतना इंट्रो पर्याप्त है, ये बताने के लिए कि स्टोरी कश्मीर समस्या के बारे में है. नया ये हुआ है कि भारत सरकार ने कश्मीर पर 'बात' करने की इच्छा जताई है और इसके लिए आईबी चीफ रहे दिनेश्वर शर्मा का नाम आगे किया है. वो भारत सरकार की ओर आधिकारिक वार्ताकार होंगे. माने मसले से जुड़े किसी भी व्यक्ति या संगठन को जो भी कहना हो, वो दिनेश्वर से अपनी बात कह सकता है.
फ्री हैंड मिलेगा काम करने के लिए
गृहमंत्री राजनाथ सिंह कह रहे हैं कि केंद्र की तरफ से दिनेश्वर को 'फ्री हैंड' मिलेगा. वो अपने मुताबिक तय कर सकते हैं कि केंद्र सरकार के नुमाइंदे के तौर पर वो किस से मिलेंगे और बात करेंगे. इसका ये मतलब ये निकाला जा रहा है कि वो हुर्रियत से भी बात कर सकते हैं. काम में कोई दिक्कत न हो, इसलिए दिनेश्वर का रैंक कैबिनेट सेक्रेटरी के बराबर होगा. इसका मतलब ये होगा कि वे या तो एनएसए अजीत डोवाल को रिपोर्ट करेंगे, या तो सीधे प्रधानमंत्री मोदी को. इनके अलावा किसी को नहीं. केंद्रिय गृहमंत्रालय दिनेश्वर के काम में दखल नहीं देने वाला है.
गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि दिनेश्वर शर्मा के पास काम करने की पूरी आज़ादी रहेगी.
गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि दिनेश्वर शर्मा के पास काम करने की पूरी आज़ादी रहेगी.

तो दिनेश्वर पर बड़ी ज़िम्मेदारी है. आज हम जानेंगे कि दिनेश्वर में ऐसा क्या खास था कि उन्हें उस नासूर का इलाज ढूंढने के काबिल समझा गया जिसने दो देशों का खून 70 साल बहाया है.
पटना के पास पाली गांव पड़ता है. दिनेश्वर शर्मा यहीं से हैं. पिता और दादाजी दोनों पुलिस में थे. ग्रैजुएशन करने गए गया. यूपीएससी की परीक्षा पास की तो इंडियन फॉरेस्ट सर्विस मिल रहा था. दिनेश्वर ने जॉइन कर लिया. फॉरेस्ट सर्विस में रहते हुए दोबारा परीक्षा दी और आईपीएस के लिए ज़रूरी रैंक ले आए.
डोवाल के काडर से हैं दिनेश्वर
पुलिस सेव में आने के बाद 1979 बैच के दिनेश्वर को मिला केरल काडर. केरल काडर माने एनएसए अजीत डोवाल का काडर. डोवाल 1968 बैच के अधिकारी हैं. 90 का दशक कश्मीर के लिए सबसे कठिन दौर रहा है. दशक की शुरुआत में उग्रवाद चरम पर पहुंच गया था. दिनेश्वर को इसी समय कश्मीर में पोस्टिंग मिली. साल था 1992. राज्य के आईबी हेडक्वार्टर से वो पूरे जम्मू और कश्मीर पर नज़र रखते थे.
अजीत डोवाल की ही तरह दिनेश्वर भी केरल काडर से हैं
अजीत डोवाल की ही तरह दिनेश्वर भी केरल काडर से हैं

दिनेश्वर केरल काडर से अलग-अलग जगहों में डेप्यूटेशन पर भी गए. सीमा सुरक्षा बल (BSF) के डीआईजी रहे, इंटेलिजेंस ब्यूरो के ज्वाइंट डायरेक्टर (इस्लामिक आतंकवाद डेस्क) रहे और फिर सीआरपएफ के आईजी भी रहे. सीआरपीएफ आईजी रहते उनके पास जम्मू कश्मीर का चार्ज था.
दिनेश्वर दिसंबर 2014 में आईबी के चीफ बनाए गए. उनके कार्यकाल के दौरान ही केरल, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र में ISIS के मॉड्यूल का पता चला. अमूमन ऐसा खुलासा होने पर धड़ाधड़ गिरफ्तारियां होती हैं. लेकिन दिनेश्वर ने तय किया कि इन मॉड्यूल से जुड़े लड़कों को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा. उनकी काउंसिलिंग की जाएगी.
दिनेश्वर ने बतौर आईबी चीफ सबसे ज़्यादा दबाव झेला जुलाई 2016 में बुरहान वानी के मारे जाने के बाद. कश्मीर में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हो रहे थे और एजेंसियों को अलगाववादियों पर कार्रवाई करने के लिए सटीक इनपुट चाहिए थे, वो भी बहुत कम समय में.
बुरहान वानी के मारे जाने के बाद कश्मीर में कार्रवाई के लिए आईबी पर बुहत दबाव था
बुरहान वानी के मारे जाने के बाद कश्मीर में कार्रवाई के लिए आईबी पर बुहत दबाव था

दिसंबर 2016 में दिनेश्वर रिटायर हो गए. सरकार उन्हें एक्सटेंशन देना चाहती थी. लेकिन उन्होंने मना कर दिया. लेकिन सरकार का भरोसा उनपर बना रहा. और ये भरोसा कितना मज़बूत था, ये इस साल जून में देखने मिला. असम के उल्फा उग्रवादियों और बोडो समुदाय के नेताओं से बातचीत होनी थी. इस बातचीत में भारत सरकार की तरफ से दिनेश्वर शामिल हुए. सरकार केंद्रिय गृहमंत्रालय का ढांचा सुधारना चाहती है. इस कमिटी के चीफ भी दिनेश्वर हैं.
बताया जाता है कि दिनेश्वर और एनएसए अजीत डोवाल के बीच संबंध अच्छे हैं. डोवाल जब आईबी के चीफ होते थे, तब दिनेश्वर ने उनके साथ काम किया है. दिनेश्वर ने राजनाथ सिंह के साथ भी काम किया हुआ है. जब राजनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री होते थे, तब दिनेश्वर उत्तर प्रदेश के सब्सीडियरी इंटेलिजेंस ब्यूरो (SIB)के चीफ होते थे.
जम्मू कश्मीर के राज्यपाल एनएन वोहरा भी एक वक्त केंद्र की ओर से जम्मू कश्मीर में वार्ताकार रह चुके हैं
जम्मू कश्मीर के राज्यपाल एनएन वोहरा भी एक वक्त केंद्र की ओर से जम्मू कश्मीर में वार्ताकार रह चुके हैं

पहले भी नियुक्त किए गए हैं वार्ताकार
ये पहली बार नहीं है जब केंद्र सरकार ने अपनी तरफ से कोई वार्ताकार खास कश्मीर समस्या पर ध्यान देने नियुक्त किया हो. वाजपेयी की एनडीए सरकार ने भी 2001 में ऐसी पहल की थी. तब प्लानिंग कमिशन के डिप्टी चेयरमैन केसी पंत को ये ज़िम्मेदारी दी गई थी. 2002 में पंत की जगह आए केंद्रिय गृह सचिव रहे एनएन वोहरा. वोहरा फिलहाल जम्मू कश्मीर के राज्यपाल हैं. वोहरा छह साल तक आधिकारिक वार्ताकार के पद पर रहे.
2010 में यूपीए सरकार ने कश्मीर के लिए तीन वार्ताकारों की टीम बनाई जिसमें पत्रकार दिलीप पडगांवकर, सूचना आयुक्त रहे एमएम अंसारी और प्रोफेसर राधा कुमार थे. राधा कुमार इस टीम का हिस्सा बनने से पहले भी हुर्रियत के नर्म धड़े से 'बैकचैनल' बातचीत में शामिल थीं. लेकिन इस तीन मेंबर कमिटी की सिफारिशों को सरकार ने नामंज़ूर कर दिया था.



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