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इंडिया की सबसे नीची जाति पर एक निबंध

किले बनते थे तो नीव में उनकी मानव बलि दी जाती थी, अब एयरपोर्ट बनते हैं तो भी उन्हीं को कुचला-मारा जाता है.

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एक ग़ैर-जरूरी भारतीय नागरिक जिसकी आवाज़ कोई नहीं सुनेगा.

ये जाति है विस्थापितों की. दलितों की. हाशिये पर पड़े उन लोगों की जो सरकारों की चमचमाती 'फील गुड' विकास परियोजनाओं के लिए सबसे पहले बेघर किए जाते हैं और फिर ठंड व भूख से मारे जाते हैं. ये वर्ष 2018 है और अब भी ऐसा हो रहा है. एक लेटेस्ट मामले ने ये फिर से पुष्ट कर दिया है.

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18 सितम्बर 2017. समाचार वेबसाइट्स पर एक खबर चमकी. "खुशखबरी: देवघर में बनेगा इंटरनेशनल एयरपोर्ट." देवघर के लोगों के लिए यह सचमुच अच्छी खबर ही थी. देवघर उत्तर भारत में हिन्दुओं का बड़ा तीर्थ स्थल है. हिन्दू मान्यताओं के हिसाब से 12 ज्योतिर्लिंगों में एक बैद्यनाथ इसी जिले में है. संथाल परगना में पड़ने वाले इस शहर की अर्थव्यवस्था तीर्थयात्रियों पर टिकी हुई है. एयरपोर्ट के आने से तीर्थयात्रियों का देवघर पहुंचना आसान हो जाएगा.

एक महीना बीतते-बीतते देवघर के लिए खुशखबरी की तरह आया एयरपोर्ट शहर से सटे 13 गांवों के लिए गम का सबब बन गया. एयरपोर्ट के लिए बाबूपुर, कटिया, भीतिया सहित कुल 13 गांवों की 600 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया जाना था. इसमें 437.7 एकड़ खेती लायक जमीन और 18 एकड़ का जंगल शामिल था. इस पूरी प्रक्रिया में कुल 529 परिवारों को विस्थापित होना था. 'विस्थापन' ऐसा शब्द है जिससे झारखंड के लोगों का साबका कई पीढ़ियों से पड़ रहा है.

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बैद्यनाथ मंदिर जिसकी वजह से हर साल लाखों तीर्थयात्री देवघर आते हैं
बैद्यनाथ मंदिर जिसकी वजह से हर साल लाखों तीर्थयात्री देवघर आते हैं

तेलंगाना में किसानों के सशस्त्र विद्रोह के बाद विनोबा भावे ने तेलंगाना का दौरा करने का फैसला किया. इस दौरे में उन्हें समझ में आया कि किसानों के असंतोष की वजह है, जमीन का गैर-बराबर बंटवारा. उन्होंने इस समस्या का नया संधान सुझाया. वो बड़े जमींदारों के पास जाते और उनसे अपनी जमीन का कुछ हिस्सा भूमिहीन खेत मजदूरों को देने का आग्रह करते. 18 अप्रैल 1951 के रोज उन्हें तेलंगाना के पोचमपल्ली में जमीन का पहला टुकड़ा दान में मिला. यह शुरुआत आगे जाकर भूदान आंदोलन के नाम से जानी जाने लगी.

बिहार और उत्तर प्रदेश में भूदान आंदोलन की बड़ी धमक देखी गई. 1956 तक 40 लाख एकड़ जमीन भूदान के खाते में चढ़ चुकी थी. ऐसी ही कुछ जमीन देवघर के बाबूपुर में थीं. 30 दिसंबर 1965 को भूदान खाते में आई जमीनों पर आस-पास के दलित खेत-मजदूरों को लाकर बसा दिया गया. इस बात के 52 साल बीत गए. चीजें अपनी गति से चलती रहीं.


भूदान आंदोलन के दौरान विनोबा भावे (ढोल बजाते हुए)
भूदान आंदोलन के दौरान विनोबा भावे (ढोल बजाते हुए)

सितंबर 2017. अखबारों में छपी रिपोर्ट्स के मुताबिक एयरपोर्ट के लिए 600 एकड़ जमीन का अधिग्रहण हो चुका था. भूदानी पट्टे पर बसे दलितों के 105 परिवारों के 'मकानों' का मामला अभी अधरझूल में था. इन परिवारों के पास इस बात की कोई जानकारी नहीं थी कि अगर उनका घर गिरा दिया जाएगा तो वो लोग सिर ढकने के लिए कहाँ जाएंगे? सरकारी अफसरों ने शुरुआत में कहा था कि उन्हें अपने मकान की एवज में नया मकान या फिर नकद पैसा दिया जाएगा लेकिन यह महज मौखिक आश्वासन भर था.

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7 अक्टूबर 2017. सबसे पहले थाना कुंडा के सीओ बाबूपुर पहुंचे. उसके बाद जिला भूअर्जन अधिकारी, बीडीओ, असिस्टेंट कमिश्नर और प्रशासनिक अमले के दूसरे अधिकारी. उनके पीछे खुद बुलडोजर खड़े थे जिनके दांत चमक रहे थे. प्रशासन की तरफ से गांव वालों से कहा गया कि वो एक घंटे के अंदर घर खाली करें. अगर वो ऐसा नहीं करते हैं तो घर के भीतर के सामान के क्षतिग्रस्त होने पर 'प्रशासन' की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी. और एक घंटे बाद सच में बुलडोजर चलने लगे.


बाबूपुर दलित बस्ती
बाबूपुर दलित बस्ती

22 साल की लाखो मांझी दूसरी बार पेट से थीं. उनके पति रंजू मांझी घर के बाहर खड़े होकर प्रशासन की तरफ से घर खाली करने की घोषणा सुन रहे थे और घर के भीतर लाखो सहमी हुई सी बैठी थीं. अचानक उनके पेट में दर्द शुरू हुआ. उन्होंने मन में सोचा अभी नहीं. ये अभी नहीं हो सकता. आखिरकार उन्हें समझ में आ गया कि चीजें उनके नियंत्रण से बाहर हो चुकी हैं. उन्होंने दबी सी आवाज में अपनी सास पुष्पा को पुकारा. पुष्पा याद करती हैं-


"उस दिन बहुत तेज बरसात हो रही थी. इतने में मेरी बहू को पेट में दर्द शुरू हो गया. इधर बुलडोजर चल रहा और इधर पेट का दर्द. घर के दूसरे सदस्य घर खाली करने में लगे हुए थे. कौन ,मदद के लिए आता? सभी अपना घर बचाने में लगे हुए थे. चारों तरफ अफरा-तफरी. लगता था जैसे भूडोल आ गया है.

मैं भागते हुए सरकारी अफसरों के पास गई. वो रोड पर खड़े थे. मैं उनके सामने हाथ जोड़कर गिडगिडाती रही. बहुत मिन्नतें की कि बहू की डिलेवरी हो जाए उसके बाद हमारा घर गिरा देना. उन्होंने हमारी बात को सुना-अनसुना कर दिया. हमारी बस्ती में एक औरत है धरकी मांझी. वो दाई का काम करती है. हम दौड़कर उसके पास गए. उससे मिन्नतें की कि मेरी बहू की डिलेवरी करवा दे नहीं तो वो मर जाएगी.

सरकार ने बुलडोजर चलाना बंद नहीं किया था. हम लाखो को खुले में ले आए. गांव की दूसरी औरतें भी आ गईं. हमने चारों तरफ से धोती की आड़ बना कर लाखो को लिटा दिया. ऊपर से पानी गिर रहा था. उसका कोई उपाय हमारे पास नहीं था. मेरी बहू ने खुले में बेटे को जन्म दिया. शाम होते-होते हमारा घर मिटटी में मिल चुका था और मेरी बहू के हाथ में बच्चा. ऐसी हालत में मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि हम कहां जाएं."

लाखो मांझी की सास पुष्पा
लाखो मांझी की सास पुष्पा

पंजाब के इंकलाबी शायर अवतार सिंह संधू पाश की एक नज्म हैः


मैं घास हूँ मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊंगा

बम फेंक दो चाहे विश्‍वविद्यालय पर बना दो होस्‍टल को मलबे का ढेर सुहागा फिरा दो भले ही हमारी झोपड़ियों पर

मेरा क्‍या करोगे मैं तो घास हूं हर चीज़ पर उग आऊंगा...

लाखो मांझी का बेटा बस्ती के मलबे पर पाश की घास की तरह ही पैदा हुआ. उसके घरवालों ने पाश की यह नज्म शायद ही सुनी हो लेकिन उनके मन में जाने क्या आया कि उन्होंने इस लड़के नाम 'सुमन' रखा. तीन महीने का सुमन जब बड़ा होगा तो उसे भी उसके जन्म के समय के तबाह हालातों की कहानियां जरूर सुनाई जाएंगी. ऐसे में यह लड़का अपने जन्मदिन पर खुश हो पाएगा इसमें संदेह है.

करीब ढाई हजार साल पहले बुद्ध ने कहा था कि दुनिया में परिवर्तन ही एक मात्र ऐसी चीज है, जिसे स्थाई कहा जा सकता है. चीजें घिसटती ही सही लेकिन आगे बढ़ रही होती हैं. घर टूट जाने के बाद बस्ती की जिंदगी रुक नहीं सकती थी. बुलडोजरों के जाने के बाद लोगों ने मलबे को किनारे किया और नए सिरे से तम्बू खड़े करना शुरू किया. मलबे से जो काम लायक सामान निकाला जा सकता था उसे नए सिरे से इन तंबुओं में सजा दिया गया.


मलबे पर खड़े तंबू
मलबे पर खड़े तंबू

तंबुओं को खड़ा करने के महीने भर बाद ठंड ने दबे पांव इस बस्ती पर हमला बोल दिया. ओढ़ने-बिछाने का सामान मलबा हो चुका था. शाम ढलते-ढलते लोग आग सुलगा लेते. लकड़ी के जलने की एक औकात होती है. वो पहले आग होती है फिर अंगार और बाद में राख. शाम ढले सुलगाई हुई लकड़ियां रात होते-होते राख हो जातीं. इसके बाद लोग प्लास्टिक की पन्नी के भरोसे पाले से बचने की कोशिश में गठरी बनकर सो जाते.

दुनिया में हर आदमी के पास सुनाने के लिए 'संघर्ष और सफलता की कहानी' नहीं होती. कुछ लोग इस दुनिया में जीते नहीं बल्कि वक़्त काट रहे होते हैं. बस्ती के पोंचा मांझी ऐसे ही शख्स थे. साल 1988 तक वो पास के गांव मिसर जमुआ में बंधुआ मजदूरी किया करते थे. इसे झारखंड में 'धान मजदूरी' कहा करते थे. माने जमींदार के यहां पूरे दिन काम करने के बदले ढाई किलो धान बतौर मजदूरी दे दिया जाता था.


पोंचा मांझी की पत्नी कदनी देवी
पोंचा मांझी की पत्नी कदनी देवी

1988 में संथाल परगना डिविजन में कोई सक्सेना साहब नाम के अफसर आए. उन्होंने जमींदारों को समझाया कि 'धान मजूरी' गैर-कानूनी है. अगर वो किसी से धान मजूरी करवाते हैं तो उन्हें जेल में डाल दिया जाएगा. सक्सेना के प्रयासों से काफी सारे बंधुवा मजदूर मुक्त करवाए गए. उन्हें सर्टिफिकेट दिए गए और उनके लिए सरकारी पेंशन की व्यवस्था की गई. पेंचा मांझी भी इन्ही बंधुवा मजदूरों में से एक हैं. उनके बंधुवा मजदूरी मुक्ति प्रमाण पत्र पर 1 सितंबर 1988 की तारीख दर्ज है.

पेंचा उम्र की ढलान पर थे और उनके सिर से छत छिन चुकी थी. 7 जनवरी 2018 की शाम वो समय आग सुलगाकर बैठ हुए थे. इसके बाद उन्होंने साग-रोटी खाई. घर में जो बिछावन था वो घर के साथ ही मलबा हो चुका था. इन तीन महीनों में उनकी बीवी कदनी ने पुरानी साड़ी और बेकार कपड़ों की मदद से एक कथरी सिल ली थी लेकिन वो रात 5 डिग्री सेल्सियस के तापमान के हिसाब से यह काफी नहीं थी. पेंचा मांझी की पत्नी कदनी याद करती हैं-


"उस दिन रात को उन्होंने खाने में साग-रोटी खाई थी. इसके बाद वो तंबू के बाहर आग तापने लगे. उस समय उनसे मिलने बस्ती का ही मनोज आया हुआ था. उन्होंने मनोज से कहा कि आज मुझे बहुत ठंड लग रही है. रात को वो कथरी ओढ़कर सो गए. मेरे पति सुबह जल्दी ही उठ जाया करते थे. सुबह मेरा बेटा मिथुन उठा. उसने देखा कि उसके पिता अब भी सोये हुए हैं. उसने दातून वगैरह किया और फिर पिता को जगाने पहुंच गया. उसने पिता को आवाज दी लेकिन वो नहीं उठे. इसके बाद उसने मेरे पति को हिलाकर देखा. उनकी सांस नहीं चल रही थीं. शरीर पूरी तरह से अकड़ गया था. इसके बाद उसने हल्ला मचाना शुरू कर दिया. लेकिन इसका क्या फायदा होना था. जो चला गया वो लौटकर थोड़े वापस आता है."

पोंचा मांझी के बेटे मिथुन मांझी
पोंचा मांझी के बेटे मिथुन मांझी

प्रशासन का कहना है कि पेंचा मांझी की मौत बीमारी की वजह से हुई. उनकी पत्नी कदनी इस बात से साफ़ इनकार करती हैं. कदनी के हिसाब से पेंचा को किसी भी किस्म की गंभीर बीमारी नहीं थी. फिलहाल बस्ती के लोग प्लास्टिक की छत वाले तंबुओं में रह रहे हैं. पिछले एक सप्ताह में बस्ती के दो बाशिंदे मर चुके हैं. गांववालों का दावा है कि दोनों लोगों की मौत ठंड की वजह से हुई है जबकि प्रशासन दोनों मौतों की वजह बीमारी बताने पर अड़ा हुआ है. हालांकि पेंचा मांझी की मौत के बाद सरकार की तरफ से हर परिवार को एक-एक कम्बल दिया गया है.

कभी हवाई अड्डे के नाम पर तो कभी बेहतर सड़क के नाम पर, बॉक्ससाइड और एलुमिनियम के नाम पर झारखंड में हाशिए के लोग पीढ़ियों से विस्थापित होते आ रहे हैं. कई मामलों में एक ही पीढ़ी तीन से चार दफा विस्थापन का शिकार हो रही है. इस बाबत अरुंधती रॉय की बात बहुत मार्के की है. वो कहती हैं-


"‘लाखों-लाख विस्थापितों का अब कोई वजूद नहीं है. जब इतिहास लिखा जाता है, वे इसमें नहीं होते. आंकड़ों में भी नहीं. उनमें से कुछ लगातार तीन बार और चार बार विस्थापित हुए हैं. कभी बांध के लिए, यूरेनियम की खान के लिए, बिजली परियोजना के लिए वे विस्थापित होते रहे हैं. एक बार वे लुढ़कना शुरू करते हैं तो फिर रुकने की कोई जगह नहीं होती. इनमें से बहुत बड़ी संख्या आखिरकार हमारे बड़े शहरों की परिधि में मौजूद झोपड़पट्टियों में खप जाती है, जहां यह सस्ते निर्माण-मजदूरों की बहुत बड़ी भीड़ में बदल जाती है (जो और ज्यादा परियोजनाओं पर कार्य करती है जिससे और ज्यादा लोग बेदखल होते हैं)."

 यह मलबा कभी इंसानी बस्ती हुआ करता था
यह मलबा कभी इंसानी बस्ती हुआ करता था



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