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13 साल से कब्र में दफन होने का इंतजार कर रहे हैं आदिवासियों के छह कटे पंजे

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मॉस्को शहर के बीचोबीच एक जगह है. रेड स्क्वॉयर. पिछले 95 सालों से यहां एक इंसान की लाश रखी है. सोवियत संघ के महान नेता व्लादीमिर लेनिन की लाश. रूसी क्रांति के महान नेता लेनिन की लाश. रूस को लगता है कि लेनिन को दफना दिया, तो उसके इतिहास का सबसे सजीला हिस्सा खत्म हो जाएगा. उसी इतिहास को जिंदा रखने की उम्मीद में लेनिन का शव इतने सालों से वहां रखा हुआ है. जैसे, मिस्र के किसी फराओ का शव रखा हुआ हो. पूरी हिफाजत से. भारत के पास भी ऐसा ही एक इतिहास है. छह कटे पंजों का इतिहास. मगर इसमें कोई गौरव नहीं. ये निशानी सरकारी क्रूरता की मिसाल के तौर पर सहेजकर रखी गई है. कटी हथेलियां न्याय की राह देख रही हैं. सन 2006 से.

टाटा स्टील के एक प्रॉजेक्ट पर स्थानीय आदिवासी विरोध कर रहे थे. इसी के कारण हिंसा हुई और 13 आदिवासी मारे गए.
टाटा स्टील के एक प्रॉजेक्ट पर स्थानीय आदिवासी विरोध कर रहे थे. इसी के कारण हिंसा हुई और 13 आदिवासी मारे गए.

तारीख: 2 जनवरी, 2006
जगह: कलिंगनगर, ओडिशा

टाटा स्टील का एक प्रॉजेक्ट शुरू होने वाला था. आस-पास के इलाकों में रहने वाले आदिवासी इसके लिए राजी नहीं थे. प्रॉजेक्ट के लिए सरकार उनकी जमीन ले रही थी. आदिवासी जमीन देना नहीं चाहते थे. विरोध हो रहा था, मगर इसका कोई असर नहीं दिख रहा था. जो कारखाना खुलना था, उसके चारों ओर दीवार बननी शुरू हो गई. इसके विरोध में आदिवासियों ने एक रैली बुलाई. स्थितियां हिंसक हो गईं. पुलिसवालों ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाईं. 13 आदिवासी मारे गए. मृतकों के शवों को प्रशासन ने अपने कब्जे में कर लिया. हंगामा हुआ, तो घटना के दो-तीन दिन बाद लाशों को उनके परिवारों के सुपुर्द किया गया. जब लोगों ने मरने वालों के शव देखे, तो कई लोगों के पंजे गायब थे. सरकारी दूतों ने मृत प्रदर्शनकारियों के पंजे काट दिए थे. कुछ लोग तो ये इल्जाम भी लगाते हैं कि कुछ लाशों का लिंग कटा हुआ था. इस बात के बारे में कुछ पुख्ता नहीं पता. मगर पंजे कटे, ये सच है.

ये कलिंगनगर गोलीबारी में मारे गए लोगों की याद में बनाया गया स्मारक है (फोटो: ओडिशा सन टाइम्स)
ये कलिंगनगर गोलीबारी में मारे गए लोगों की याद में बनाया गया स्मारक है (फोटो: ओडिशा सन टाइम्स)

हथेलियों की पहचान करने के लिए 13 साल से संघर्ष कर रहे हैं आदिवासी
मृतकों का अंतिम संस्कार हो गया. मगर उन पंजों का नहीं. मालूम ही नहीं था कि कौन-सा पंजा किसका है. इनकी पहचान खोजने के लिए जद्दोजहद शुरू हुई. ओडिशा के जाजपुर जिले में है कलिंगनगर. यहां एक गांव है- अंबागाड़िया. यहां एक सामुदायिक केंद्र है. गांव के लोगों की साझा जगह. इसमें एक संदूक के अंदर संभालकर रखे हुए हैं वो कटे पंजे. केमिकल से सुरक्षित करके रखे हैं. इस आस में कि कटे पंजों को पहचान मिलेगी. इस बात को 13 साल गुजर चुके हैं. मगर आस अब भी अधूरी है. संघर्ष चालू है. अंबागाड़िया गांव में एक युवक रहता है. नाम है मोतीलाल टीगू. इंडियन एक्स्प्रेस से बात करते हुए मोतीलाल ने जो कहा, उसमें इन आदिवासियों की साझा आवाज खोजने की कोशिश कीजिए. मोतीलाल के शब्दों का सार कुछ ऐसा है:

हमने कई बार प्रशासन से और नेताओं से अपील की. कि इन कटे पंजों की डीएनए जांच कराई जाए. ताकि पंजों को उनके मालिक की कब्र में दफनाया जा सके. जवाब में प्रशासन ने हर बार बहाना बनाया. कहा कि जांच नहीं हो सकती है. क्यों नहीं हो सकती, ये साफ-साफ नहीं कहते. अपने संघर्ष को दोबारा शुरू करने के अलावा हमारे पास दूसरा कोई और रास्ता नहीं है.

ये ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक हैं. सरकार ने कलिंगनगर में हुई घटना की जांच के लिए तीन आयोग गठित किए. सरकार और उसके तंत्र के लिए जांच का काम पूरा हो चुका है. मगर आदिवासियों के कई सवाल अब भी ज्यों के त्यों हैं.
ये ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक हैं. सरकार ने कलिंगनगर में हुई घटना की जांच के लिए तीन आयोग गठित किए. सरकार और उसके तंत्र के लिए जांच का काम पूरा हो चुका है. मगर आदिवासियों के कई सवाल अब भी ज्यों के त्यों हैं.

यहां हर साल 2 जनवरी को आदिवासी मनाते हैं ‘शहीद दिवस’
हर समाज के अपने-अपने नायक होते हैं. जो 13 लोग मरे, वो इन आदिवासियों के नायक हैं. उनके शहीद. उनकी याद में गांव के अंदर एक स्मारक भी है. जिनकी याद में ये स्मारक बना है, उन सबके नाम का एक पत्थर भी है यहां. उसके ऊपर मरने वाले का नाम दर्ज है. और ये पत्थर कब्र के ऊपर लगे हैं. मरने वाले की आखिरी पहचान के तौर पर. इस पूरी घटना को एक तस्वीर में फिट करके देखिए. उस तस्वीर में ये कटे हाथ भी हैं. ये कब्र के पत्थर भी हैं. इनको मिलाकर जो तस्वीर पूरी होती है, वो शायद ओडिशा के इतिहास की सबसे नृशंस सरकारी क्रूरता का दस्तावेज है. हर साल 2 जनवरी को जब दुनिया नए साल के जश्न का खुमार उतार रही होती है, तब स्थानीय आदिवासी इस स्मारक पर जमा होते हैं. अपने शहीदों की याद में. ये दिन उनका ‘शहीद दिवस’ होता है.

ज्यादातर आदिवासी समुदाय जंगलों में रहते हैं. जंगल न केवल उनकी जरूरतें पूरी करता है, बल्कि उनकी आस्था भी इससे जुड़ी होती है.
ज्यादातर आदिवासी समुदाय जंगलों में रहते हैं. जंगल न केवल उनकी जरूरतें पूरी करता है, बल्कि उनकी आस्था भी इससे जुड़ी होती है.

पोस्टमॉर्टम में मृतकों के शरीर के साथ ऐसी बदसलूकी क्यों की?
सरकारी तंत्र कहता है कि मृतकों के पोस्टमॉर्टम के समय पंजे काटे गए थे. ताकि जो मारे गए, उनकी पहचान करना आसान हो जाए. मगर ये तर्क फालतू लगता है. मारे गए लोगों के पंजे काटकर लाश के साथ यूं छेड़छाड़ करना कहां का नियम है? क्रूरता के ऊपर और क्रूरता? ये आदिवासियों के जले पर मिर्च रगड़ने जैसा था. वैसे भी, मृतकों का चेहरा बिगड़ा नहीं था. उन्हें आसानी से पहचाना जा सकता था. फिर पंजे काटकर फिंगरप्रिंट मैच करने की क्या जरूरत थी? क्या कभी आपने ऐसा मामला सुना है, जहां पहचान के नाम पर मृतक का अंग काट दिया जाए? वो भी इतने संवेदनशील मामले में!

टाटा का प्रॉजेक्ट चल रहा है. आदिवासी अब भी हथेलियों की पहचान मालूम करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
टाटा का प्रॉजेक्ट चल रहा है. आदिवासी अब भी हथेलियों की पहचान मालूम करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

सरकार ने जांच क्यों कराई थी, खुद को क्लीनचिट देने के लिए?
खैर, पंजे काटने का इल्जाम तीन डॉक्टरों के माथे आया. प्रदर्शनकारियों की मौत के कारण पहले ही सरकार की किरकिरी हो चुकी थी. फिर ये पंजे कटने की घटना से दबाव और बढ़ गया. दबाव में आकर उन तीन डॉक्टरों को सस्पेंड कर दिया गया. बाद में ओडिशा हाई कोर्ट ने जब डॉक्टरों के हक में फैसला सुनाया, तो उनका सस्पेंशन भी खत्म कर दिया गया. सरकार ने इन हत्याओं की जांच करवाई. जांच कमीशन बैठा. एक नहीं, बल्कि तीन-तीन. किसी सरकारी अधिकारी को सजा नहीं हुई. आदिवासी कल्याण, मुआवजा सारी रस्मअदायगी की बातें हुईं, मगर सजा किसी को नहीं हुई. तो क्या इन हत्याओं के लिए कोई जिम्मेदार नहीं था? स्थानीय आदिवासी नाराज हैं. उन्हें लगता है कि प्रशासन से लेकर नेताओं तक, सबने उन्हें निराश किया है. वो इस संघर्ष को खत्म करने के मूड में नहीं दिखते. उनके लिए ये उनके मृतकों के सम्मान का सवाल है. सवाल तो ये लोकतंत्र का भी है. सवाल ये भी है कि जांच पूरी हो जाने के बाद भी अगर सवाल मुंह बाये घूरते रहें, तो क्या किया जाए?


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