पिछले कई दिनों से देश में न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच विवाद चल रहा है. जजों की नियुक्ति को लेकर पहले कानून मंत्री ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम पर सवाल उठाया. अब संविधान के 'मूल ढांचे' पर बहस छिड़ गई है. कुछ दिन पहले उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने 1973 के केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले पर सवाल उठाया. इसे फैसले को 'गलत उदाहरण' बताया था. फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के मूल ढांचे का जिक्र किया था. अब चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा है कि संविधान का मूल ढांचा एक 'ध्रुव तारे' की तरह है, जो जजों को रास्ता दिखाता है.
ये आर्टिकल पढ़कर CJI vs उपराष्ट्रपति वाला पूरा मैटर समझ में आ जाएगा!
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पूरा मामला एक-एक कर समझते हैं. 21 जनवरी को बॉम्बे बार एसोसिएशन ने नानी पालखीवाला मेमोरियल लेक्चर आयोजित किया था. इसी लेक्चर में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि केशवानंद भारती केस का फैसला संविधान की आत्मा को बनाए रखने में मदद करता है. चीफ जस्टिस ने कहा,
"संविधान का मूल ढांचा ध्रुव तारे की तरह है. जब आगे का रास्ता पेचीदा होता है तो इससे संविधान की व्याख्या करने वालों और उसे लागू करने वालों को एक दिशा मिलती है. इसमें संविधान की सर्वोच्चता, कानून का शासन, शक्तियों का बंटवारा, न्यायिक समीक्षा, धर्मनिरपेक्षता, संघीय व्यवस्था, व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा, राष्ट्र की अखंडता की बात कही गई है."
चीफ जस्टिस ने कहा कि एक जज की कुशलता संविधान की आत्मा से छेड़छाड़ किए बिना उसकी व्याख्या करने में है. उन्होंने कहा कि केशवानंद भारती का फैसला इस मामले में एक मिसाल है जिसे बाद में पड़ोसी देशों मसलन नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान ने भी अपनाया.
उपराष्ट्रपति ने क्या कहा था?11 जनवरी को उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ जयपुर में थे. एक कार्यक्रम में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को खत्म करने और 1973 के केशवानंद भारती केस का भी जिक्र किया. उपराष्ट्रपति ने कहा कि संसदीय संप्रभुता से भी समझौता नहीं किया जा सकता क्योंकि लोकतंत्र के लिए यह जरूरी है.
इसी दौरान जगदीप धनखड़ ने कहा था कि केशवानंद भारती केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने गलत मिसाल पेश की है. उन्होंने कहा था,
"क्या संसद को संविधान में संशोधन करने के लिए किसी संस्था पर निर्भर होना चाहिए? अगर कोई संस्था संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति पर सवाल उठाती है तो यह कहना मुश्किल होगा कि हम एक लोकतांत्रिक राष्ट्र हैं."
दरअसल, इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संसद को संविधान में संशोधन की शक्ति है लेकिन वो इसके मूल ढांचे में कोई बदलाव नहीं कर सकती है.
केशवानंद भारती केस का फैसलाजब बार-बार केशवानंद भारती केस का जिक्र हो रहा है तो उसे भी समझ लेते हैं. यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की अब तक की सबसे बड़ी बेंच ने दिया था, जिसमें 13 जज शामिल थे. इस मामले की सुनवाई 68 दिनों तक चली थी जो देश में सबसे लंबे दिनों तक चलने वाला केस है.
केशवानंद भारती केरल के कासरगोड में इदनीर मठ के प्रमुख थे. 21 साल की उम्र में ही साल 1961 में उन्हें ये जिम्मेदारी मिल गई थी. साल 1970 में भारती ने केरल सरकार के भूमि सुधार कानून को चुनौती दी थी. तब केरल के मुख्यमंत्री सी अच्यूत मेनन थे. भूमि सुधार के फैसलों के तहत इदनीर मठ की जमीन का एक बड़ा हिस्सा चला गया था. मठ की अधिकतर जमीन खेती करने वाले लोगों के पास चली गई.
उन्होंने 29वें संविधान संशोधन को चुनौती दी थी जिसके तहत संविधान की 9वीं अनुसूची में केरल भूमि सुधार एक्ट शामिल था. उनका केस वकील नानी पालकीवाला ने ही लड़ा था. कोर्ट में दलील दी गई कि सरकार के फैसले से उनके मौलिक अधिकारों का हनन हुआ. इस केस की सुनवाई 31 अक्टूबर 1972 को शुरू हुई थी और 23 मार्च 1973 को सुनवाई पूरी हुई.
हालांकि केशवानंद भारती केस हार गए थे और मठ को जमीन वापस नहीं मिली. लेकिन संविधान के मूल्यों के संरक्षण को लेकर ये फैसला ऐतिहासिक हो गया. 13 जजों की बेंच ने 7-6 की बहुमत से कहा था कि संसद के पास संविधान में संशोधन की शक्ति है लेकिन वह संविधान के मूल ढांचे को बदल नहीं सकती है.
संविधान का मूल ढांचा क्या है?मूल संरचना या मूल ढांचे का सिद्धांत. इसे संविधान की 'आत्मा' भी कहते हैं. इस 'मूल संरचना' का जिक्र संविधान में नहीं है. लेकिन समय-समय पर इसे परिभाषित किया गया है. इसका मतलब संविधान की सर्वोच्चता, सरकार का लोकतांत्रिक स्वरूप, राष्ट्र की एकता और अखंडता, संविधान की धर्मनिरपेक्षता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संघीय व्यवस्था जैसे मूल्यों से है. केशवानंद भारती फैसले में कहा गया था कि ये मूल्य ऐसे हैं जिसे किसी भी परिस्थिति में खत्म नहीं किया जा सकता है.
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