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दंगाइयों खुश हो जाओ, धर्म के नाम पर कत्ल करो और कोर्ट तुम्हें छोड़ देगा

बेल की ये वजह समझ से बाहर है माईलॉर्ड.

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फोटो - thelallantop
एक आदमी शाम को इबादत करके लौट रहा है. तभी कुछ लोग उस पर सिर्फ इसलिए हमला कर देते हैं कि उसकी सूरत ये कहती है कि वो मुसलमान है. उस शख्स को इतना पीटा जाता है कि वो अस्पताल में दम तोड़ देता है. इस से बुरा कुछ हो सकता है?

जी हां. इस से बुरा ये हो सकता है कि उस शख्स के गुनहगार एक ऐसे तर्क पर बेल पर छूट जाएं, जो कतई हज़म न किया जा सके.

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जून 2014 में पुणे में मोहसिन शेख का कत्ल हुआ. अभी 3 आरोपियों को बंबई हाई कोर्ट ने न सिर्फ बेल दे दी है, बल्कि बेल देते वक्त ये भी कहा है कि '...मरने वाले का सिर्फ इतना कसूर था कि वो एक दूसरे धर्म से था. ये बात आरोपियों के हक में जाती है. आरोपियों को धर्म के नाम पर भड़काया गया था और इसी के चलते उन्होंने वारदात को अंजाम दिया था...'
मोहसिन शेख. पिक्चर: bangaloremirror
मोहसिन शेख. पिक्चर: bangaloremirror
फैसले की इस भाषा से मोहसिन के घर वाले सकते में हैं. उनके लिए ये एक निजी त्रासदी है. लेकिन हमारे-आपके लिए भी इस खास वजह से बेल का मिल जाना गौर करने लायक बात भी है और एतराज़ जताने लायक भी.

क्या था मामला

31 मई 2014 को पुणे में फेसबुक पर कुछ तस्वीरें शेयर हुईं जिनमें शिवाजी महाराज और बाल ठाकरे को लेकर कुछ भद्दी बात कही गई थी. ये तस्वीरें व्हाट्सऐप के ज़रिए लोगों तक पहुंचीं और फिर शहर के कुछ हिस्सों में हिंदूवादी संगठनों ने आगज़नी और तोड़फोड़ मचा दी, जो कुछ दिनों तक जारी रही. 2 जून की शाम को मोहसिन शेख अपने एक दोस्त रियाज़ के साथ नमाज़ पढ़कर घर लौट रहे थे, जब उन पर हिंदू राष्ट्र सेना (HRS) के गुंडों ने हमला कर दिया. जब तक मदद आ पाती, रियाज़ के हमलावर उन्हें अधमरा कर के भाग गए. उसी रात मोहसिन ने अस्पताल में दम तोड़ दिया. मौके पर गुंडे अपनी बाइक्स छोड़ गए थे, जिनके ज़रिए पुलिस उन तक पहुंची. मोहसिन की मौत पर देशभर में हंगामा हुआ जिसके बाद पुलिस पर कड़ी कार्रवाई करने का दबाव बना और हिंदू राष्ट्र सेना के अध्यक्ष धनंजय देसाई सहित कुल 21 लोगों की गिरफ्तारियां हुईं.
धनंजय देसाई (बीच में)
धनंजय देसाई (बीच में)

कोर्ट ने अपनी बात को साफ करते हु्ए आगे लिखा है कि मोहसिन पर हमला करने वालों को हिंदू राष्ट्र सेना के अध्यक्ष धनंजय देसाई ने भड़काया था. विजय राजेंद्र गंभिरे, रंजीत शंकर यादव और अजय दिलीप लालगे (जिन तीनों को बेल मिली) की कोर्ट के मुताबिक बेगुनाह मोहसिन से कोई ज़ाती दुश्मनी नहीं थी. हमले से पहले हुई मीटिंग में धनंजय ने इनसे जो कुछ कहा, उसी के बहकावे में आकर इन्होंने मोहसिन पर हमला किया. इससे पहले इनका कोई क्रिमिनल रिकॉर्ड नहीं था.

फैसले पर एक नज़र

इसमें कोई शक नहीं कि हाई कोर्ट नियमों के तहत या नियमों की व्याख्या करके दोषियों को बेल दे सकता है. और क्योंकि हम कानून के राज की बात करते हैं, हमें ये समझना होगा कि सबसे भयानक जुर्म के आरोपियों (और दोषियों के भी) के भी कुछ हक तय हैं. परोल और बेल ऐसे ही हक हैं. ये उन्हें मिलें, इसमें समस्या नहीं है.
लेकिन इस एक मामले में बेल के लिए गिनाए कारणों के बारे में जितना कुछ सामने आया है, उस पर कम से कम एक ऐतराज़ लाज़मी है. कोर्ट की राय से मोहसिन के हमलावरों पर तय होने वाली ज़िम्मेदारी का वज़न कम होता है. खतरा ये है कि इस लॉजिक से तमाम दंगाइयों का गुनाह कम नज़र आने लगेगा. दंगाई किसी न किसी के भड़काने पर ही हिंसा करते हैं. क्या इस तरह की छूट सभी दंगाइयों को दी जा सकती है? क्या एक इंसान को उसके किए से इस तरह अलग किया जा सकता है?
बॉम्बे हाई कोर्ट
बॉम्बे हाई कोर्ट

मोहसिन का मामला क्यों है खास

मोहसिन को मारने वालों को ये तक नहीं पता था कि उन्होंने वो पोस्ट शेयर की भी थी कि नहीं, जिसके चलते शहर जल रहा था. उनके दोस्त का बयान था कि मोहसिन पर हमला सिर्फ टोपी और दाढ़ी के चलते हुआ था. यानी हेट -क्राइम की अगर कोई परिभाषा है तो ये उसमें बिल्कुल फिट बैठता था. ऐसे किसी मामले में एक हाई कोर्ट के फैसलों पर बड़ा गौर किया जाता है. हाई कोर्ट के फैसले/ऑब्ज़र्वेशन निचली अदालतों में फैसले देते वक्त भी ध्यान में रखे जाते हैं. ऐसे में हाई कोर्ट जितनी बड़ी अदालत से बेहद सतर्क होने की उम्मीद की जाती है.
आज जब सिस्टम से निराश होते लोग अदालतों की तरफ आखिरी उम्मीद की नज़र से देखते हैं, ऐसे फैसले हौसला तोड़ने वाले लगते है. इंडियन एक्सप्रेस  के हवाले से खबर है कि मोहसिन का परिवार और शायद महाराष्ट्र सरकार भी हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने वाले हैं.

उम्मीद है कि वहां इस मामले में ज़्यादा सफाई से फैसला आएगा. और ये शुबहा दूर होगा कि कोर्ट ने इस मामले में ढिलाई बरती है.



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