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बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी के लिए अमेरिका का प्रेम उमड़ रहा, भारत के लिए क्यों खतरा है ये करीबी?

बांग्लादेश की Jamaat-e-Islami पार्टी का झुकाव Pakistan की तरफ माना जाता है. ऐसे में अमेरिका का उसके करीब जाना नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच तनाव को और बढ़ा सकता है.

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जमात-ए-इस्लामी’ आने वाले चुनावों में अच्छा प्रदर्शन कर सकती है. (फाइल फोटो: आजतक)

बांग्लादेश की ‘जमात-ए-इस्लामी’ पार्टी आने वाले चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करने की तैयारी कर रही है. इस बीच खबर आ रही है कि अमेरिका, इस पार्टी के साथ रिश्ते बेहतर बनाना चाहता है. जमात-ए-इस्लामी एक कट्टरपंथी इस्लामी पार्टी है, जिस पर कई बार बैन लग चुका है. जमात का झुकाव पाकिस्तान की तरफ माना जाता है, ऐसे में अमेरिका का उसके करीब जाना नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ा सकता है.

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जमात ने 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश की मुक्ति का विरोध किया था. यह पार्टी शरिया कानून की वकालत करती है और एक दशक से ज्यादा समय तक बैन रही थी. वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, ढाका में एक अमेरिका के राजनयिक जमात से बातचीत करना चाहते हैं. 

द वाशिंगटन पोस्ट को मिली एक ऑडियो रिकॉर्डिंग के मुताबिक, अमेरिकी राजनयिक ने 1 दिसंबर 2025 को कुछ बांग्लादेशी पत्रकारों से बंद कमरे में बात की. उन्होंने कहा कि अमेरिका को उम्मीद है कि 12 फरवरी को होने वाले चुनाव में जमात पार्टी पहले से बेहतर प्रदर्शन करेगी. 

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अमेरिकी राजनयिक ने बांग्लादेश को ‘इस्लामी विचारधारा की तरफ बढ़ता हुआ’ देश बताया और कहा कि अमेरिका जमात के नेताओं से दोस्ती बढ़ाना चाहता है. उन्होंने पत्रकारों से यह भी कहा कि वे जमात से जुड़े छात्र संगठन ‘इस्लामी छात्र शिविर’ के सदस्यों को टीवी कार्यक्रमों में बुलाएं.

पार्टी की बढ़ती साख

कुछ सर्वे बताते हैं कि बांग्लादेश के आगामी आम चुनावों में जमात, मुख्य विपक्षी पार्टी बीएनपी के बाद दूसरे नंबर पर आ सकती है. हालांकि, ढाका स्थित अमेरिकी दूतावास ने सफाई देते हुए कहा है कि अमेरिका किसी भी राजनीतिक दल का समर्थन नहीं करता. उन्होंने इसे सिर्फ एक सामान्य और अनौपचारिक बातचीत बताया. 

अमेरिका का कहना है कि ‘जमात-ए-इस्लामी’ अब इतनी प्रभावशाली हो गई है कि वाशिंगटन उसे नजरअंदाज नहीं कर सकता. सर्वे और छात्र चुनावों में उसकी बढ़त भी दिखी है. शेख हसीना के हटने के बाद पार्टी ने अपनी इमेज सुधारने की कोशिश की और भ्रष्टाचार-विरोधी बातें करके अपनी लोकप्रियता बढ़ाई. 

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शरिया कानून की समर्थक ‘पार्टी’

जमात-ए-इस्लामी पर अलग-अलग सरकारों, खासकर हसीना के शासन में, कई बार प्रतिबंध लगा. पार्टी शरिया कानून और रूढ़िवादी नीतियों की समर्थक रही है. अमेरिकी राजनयिक ने कहा कि जमात के सत्ता में आने पर शरिया लागू होने की आशंका नहीं है, क्योंकि अमेरिका आर्थिक दबाव बना सकता है. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर महिलाओं के अधिकार कमजोर किए गए तो बांग्लादेश पर कड़े टैरिफ लगाए जाएंगे, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा.

अमेरिकी राजनयिक ने कहा,

हम अगले ही दिन उन पर 100% टैरिफ लगा देंगे. अगर बांग्लादेश महिलाओं से कहता है कि वे सिर्फ पांच घंटे काम कर सकती हैं, या उन्हें देश से निकाल देता है और उन पर शरिया कानून लागू कर देता है… तो बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था भी खत्म हो जाएगी.

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अमेरिका-भारत के संबंधों में तनाव क्यों?  

2024 में शेख हसीना के सत्ता से हटने और मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार बनने के बाद बांग्लादेश की राजनीति तेजी से बदली है. अब होने वाले चुनावों को बड़े लोकतांत्रिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है. लेकिन जमात के मजबूत होने और अमेरिका की उससे बढ़ती नजदीकी भारत की चिंता बढ़ाएगी. 

भारत जमात को शक की नजर से देखता है, क्योंकि उसने 1971 के मुक्ति संग्राम का विरोध किया था और उसके पाकिस्तान से अच्छे रिश्ते माने जाते हैं. भारत कभी नहीं चाहेगा कि बांग्लादेश में कोई ऐसी सरकार बने, जो पाकिस्तान के ज्यादा करीब हो. ऐसे समय में, जब पाकिस्तान और अमेरिका के बीच भी नजदीकी बढ़ रही है.

अमेरिका की जमात से नजदीकी भी भारत-अमेरिका रिश्तों में तनाव ला सकती है. खासकर ऐसे समय में जब दोनों के बीच व्यापार और टैरिफ को लेकर पहले से ही तनाव बना हुआ है. एक अमेरिकी एक्सपर्ट ने कहा कि भारत को बांग्लादेश में सबसे ज्यादा डर हमेशा जमात से रहा है. 

भारत बांग्लादेश में राजनीतिक स्थिरता चाहता है. साथ ही यह भी चाहता है कि वहां अल्पसंख्यकों के अधिकार सुरक्षित रहें. लेकिन जमात के सत्ता में आने के बाद ऐसा होना मुश्किल दिखाई देता है.

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