इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक 'कंबाला' शुरू करने की मांग कर रहे समूह, 'जॉइंट कंबाला कमिटी' के बैनर तले एक हो गए हैं. इनका कहना है कि कंबाला 700 साल पुरानी परंपरा है और इसके लिए खास नस्ल के भैंसे तैयार किए जाते हैं. वे इसे अपनी संस्कृति का हिस्सा बताते हैं तो लोग इसके लिए लामबंद हो रहे हैं.
क्या है कंबाला?
कंबाला कर्नाटक के तटीय ज़िलों की परंपरा है. खासकर उडीपी और दक्षिण कन्नड ज़िलों की. आमतौर पर धान की बुवाई के बाद होने वाले इस खेल में धान के खेतों में भैंसों की दौड़ होती है. एक वक्त वो भी था कि कंबाला के लिए तैयार किए जाने वाले भैसें सिर्फ 'बंट' जाति के लोगों के पास होते थे. बकौल अंग्रेज़ी वेबसाइट वायर, खूब खुराक वाले ये मोटे-तगड़े भैंसे बंट जाति के दबदबे के प्रतीक होते थे.लाज़मी तौर पर धान के खेतों वाले लोग नहीं चाहते थे कि ये दौड़ उनके खेतों में हो जाए. इसलिए 'कोगरा' जाति के लोग खेतों की रखवाली के लिए रखे जाते थे. दौड़ से पहले इन्हें खेतों में दौड़ाया जाता था ताकि कांच वगैरह का पता चल जाए जिससे भैसों को चोट न लग जाए!
मतलब साफ है कि किसी भी पारंपरिक खेल की तरह कंबाला भी जानवरों की दौड़ भर नहीं है. इससे जाति के जटिल सवाल भी जुड़े रहे हैं. इसलिए कुछ बुद्धिजीवी कंबाला के खिलाफ हैं. इसके अलावा इसका अपना अर्थशास्त्र भी है. दौड़ के बहाने से जुआ भी चलता है. लोग जीतने वाले जानवर पर दांव लगाते हैं. मेंगलुरु के पास पुत्तुर का कंबाला बड़ा मशहूर है. इसे गैंगस्टर से नेता बने मुतप्पा राय आयोजित करवाते हैं.

पिक्चरः Reuters
जल्लीकट्टू की ही तरह PETA कंबाला के खिलाफ कोर्ट गया था. इसके बाद 22 नवंबर 2016 को कर्नाटक हाई कोर्ट ने कंबाला पर रोक लगा दी थी.
बात जहां संस्कृति की आ जाती है तो नेता, लोगों की राय से फर्क रखने की हिम्मत नहीं करते. कर्नाटक में भी सरकार-विपक्ष सब एक सुर में कह रहे हैं कि कंबाला दोबारा शुरू हो. मुख्यमंत्री सिद्धारमैया कह चुके हैं कि कोर्ट के आदेश के बावजूद उनकी सरकार कंबाला शुरू करवाने के पक्ष में है. वे केंद्र से वैसी ही 'मदद' चाहते हैं जैसी उसने तमिलनाडु को जल्लीकट्टू मामले में दी. चूंकि अगले साल कर्नाटक में चुनाव होने वाले हैं, विपक्ष में बैठे भाजपा के नेता भी कंबाला के समर्थन में ही दिखना चाह रहे हैं. भाजपाई राज्य सरकार पर मामले में दखल देकर कंबाला शुरू करवाने का दबाव बना रहे हैं.अपने आदेश में कोर्ट ने कहा था कि परंपरा कानून से परे नहीं हो सकती. ऐसा कोई भी काम जो जानवरों को बेजा तकलीफ में डालता हो, नहीं होना चाहिए.

पिक्चरः Reuters
मतलब मामला अब इस तरह का हो गया है कि एक तरफ PETA और कोर्ट हैं और दूसरी तरफ हर कोई जो अपने-अपने मकसद के लिए कंबाला शुरू करवाना चाहते हैं. कंबाला कमिटी के अध्यक्ष अशोक राय का टाइम्स ऑफ इंडिया की वेबसाइट पर बयान है कि कोर्ट में मामले की सुनवाई से पहले ही वे कंबाला आयोजित करवा के रहेंगे.
कोर्ट बनाम संस्कृति के इस एक और मामले का अंत क्या होगा, देखना है.














