क्यों, मुख्यमंत्री दलित नहीं हो सकता? क्या समस्या है? इसका मतलब उन्होंने ये तय कर दिया कि पंजाब का अगला मुख्यमंत्री दलित नहीं, कोई सवर्ण होगा. ये कोई कैसे कह सकता है? और अगर ऐसा नहीं है, तो कहने की क्या जरूरत? अभी तो पार्टी ने पंजाब का अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार भी घोषित नहीं किया है. तो ये लोग एक छोटा पद देने के लिये दलित समाज की बात कर रहे हैं. इस आधार पर तो इनका एटीट्यूड सामंतवादी व्यवस्था वाला है. जिसमें दलित हमेशा सवर्णों से नीचे ही रहेंगे. अगर इन्होंने अपना मुख्यमंत्री घोषित कर दिया होता तो शायद ठीक होता कि अगला बड़ा पद किसी और को देंगे. पर पहले से ही दिमाग में भर के रखना और सबसे कहना तो बहुत बड़ा अपमान है. फिर ये किस मुंह से अधिकारी हैं उना में दलितों के खिलाफ अत्याचार पर बोलने के? ये वो चीजें हैं जो लोगों के दिमाग में गहरा धंसी होती हैं. लोग ऊपर से मीठा-मीठा बोलते रहते हैं. जब नशे में होते हैं, तो सच्ची बातें मुंह से निकल जाती हैं. अभी पंजाब में इनके जीतने के चांसेज बन रहे हैं, तो जीत और ताकत का नशा छा रहा है. तो इस नशे में वही बातें निकल रही हैं मुंह से. अभी तक तो पार्टी ने बहुजन समाज के लिये दिल्ली में कोई बड़ा डिसीजन तो लिया नहीं है. ना ही केंद्र सरकार के ही फैसलों को लागू कर पाये हैं. अभी तक तो इन्हें न्यूकमर होने का फायदा मिलता रहा है. पर धीरे-धीरे फेन उतरने लगा है. और सत्ता-लोलुपता के साथ दिल में रची-बसी चीजें सामने आने लगी हैं. जबान पर कोई लगाम नहीं है. यही काम दूसरी पार्टियां बिना कहे करती हैं और ये लोग ताल ठोंक के कह रहे हैं. जब दूसरी पार्टियां बिना कहे करती हैं तो निराशा होती है कि पॉलिटिक्स कर के किया जा रहा है. पर आशा रहती है कि इसको पॉलिटिक्स कर के सुलझाया जा सकता है. पर इन लोगों के खुल के कहने पर इंसान भयाक्रांत हो जाता है कि ये क्या है भइया. क्या कह रहे हो और क्यों. इसका तो कोई इलाज ही नहीं. पहले ही डिक्लेयर कर दिया. अब तो पॉलिटिक्स कर के भी नहीं सुलझाया जा सकता. अब दलित समाज को जरूरत है कि खुद का नेता चुनें और सरकार बनायें. नहीं तो ये लोग बस इधर-उधर के पद देते रहेंगे. और वोट मांगते रहेंगे. https://www.youtube.com/watch?v=xPugbbPSKlc आम आदमी पार्टी ने दलितों का बहुत बड़ा अपमान किया है
पंजाब चुनाव का नशा छाने लगा है और जबान पर कंट्रोल नहीं है.
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फोटो - thelallantop
आम आदमी पार्टी ने आज वो काम किया है, जिससे डॉ. भीमराव अंबेडकर लौट के आयेंगे और संविधान में खुद संशोधन करेंगे. आज आम आदमी पार्टी ने कहा है कि अगर पंजाब में जीतेंगे तो पंजाब का अगला उप-मुख्यमंत्री दलित होगा. हालांकि दो महीने पहले यही बात ट्वीट कर के कही गई थी.
क्यों, मुख्यमंत्री दलित नहीं हो सकता? क्या समस्या है? इसका मतलब उन्होंने ये तय कर दिया कि पंजाब का अगला मुख्यमंत्री दलित नहीं, कोई सवर्ण होगा. ये कोई कैसे कह सकता है? और अगर ऐसा नहीं है, तो कहने की क्या जरूरत? अभी तो पार्टी ने पंजाब का अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार भी घोषित नहीं किया है. तो ये लोग एक छोटा पद देने के लिये दलित समाज की बात कर रहे हैं. इस आधार पर तो इनका एटीट्यूड सामंतवादी व्यवस्था वाला है. जिसमें दलित हमेशा सवर्णों से नीचे ही रहेंगे. अगर इन्होंने अपना मुख्यमंत्री घोषित कर दिया होता तो शायद ठीक होता कि अगला बड़ा पद किसी और को देंगे. पर पहले से ही दिमाग में भर के रखना और सबसे कहना तो बहुत बड़ा अपमान है. फिर ये किस मुंह से अधिकारी हैं उना में दलितों के खिलाफ अत्याचार पर बोलने के? ये वो चीजें हैं जो लोगों के दिमाग में गहरा धंसी होती हैं. लोग ऊपर से मीठा-मीठा बोलते रहते हैं. जब नशे में होते हैं, तो सच्ची बातें मुंह से निकल जाती हैं. अभी पंजाब में इनके जीतने के चांसेज बन रहे हैं, तो जीत और ताकत का नशा छा रहा है. तो इस नशे में वही बातें निकल रही हैं मुंह से. अभी तक तो पार्टी ने बहुजन समाज के लिये दिल्ली में कोई बड़ा डिसीजन तो लिया नहीं है. ना ही केंद्र सरकार के ही फैसलों को लागू कर पाये हैं. अभी तक तो इन्हें न्यूकमर होने का फायदा मिलता रहा है. पर धीरे-धीरे फेन उतरने लगा है. और सत्ता-लोलुपता के साथ दिल में रची-बसी चीजें सामने आने लगी हैं. जबान पर कोई लगाम नहीं है. यही काम दूसरी पार्टियां बिना कहे करती हैं और ये लोग ताल ठोंक के कह रहे हैं. जब दूसरी पार्टियां बिना कहे करती हैं तो निराशा होती है कि पॉलिटिक्स कर के किया जा रहा है. पर आशा रहती है कि इसको पॉलिटिक्स कर के सुलझाया जा सकता है. पर इन लोगों के खुल के कहने पर इंसान भयाक्रांत हो जाता है कि ये क्या है भइया. क्या कह रहे हो और क्यों. इसका तो कोई इलाज ही नहीं. पहले ही डिक्लेयर कर दिया. अब तो पॉलिटिक्स कर के भी नहीं सुलझाया जा सकता. अब दलित समाज को जरूरत है कि खुद का नेता चुनें और सरकार बनायें. नहीं तो ये लोग बस इधर-उधर के पद देते रहेंगे. और वोट मांगते रहेंगे. https://www.youtube.com/watch?v=xPugbbPSKlc
क्यों, मुख्यमंत्री दलित नहीं हो सकता? क्या समस्या है? इसका मतलब उन्होंने ये तय कर दिया कि पंजाब का अगला मुख्यमंत्री दलित नहीं, कोई सवर्ण होगा. ये कोई कैसे कह सकता है? और अगर ऐसा नहीं है, तो कहने की क्या जरूरत? अभी तो पार्टी ने पंजाब का अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार भी घोषित नहीं किया है. तो ये लोग एक छोटा पद देने के लिये दलित समाज की बात कर रहे हैं. इस आधार पर तो इनका एटीट्यूड सामंतवादी व्यवस्था वाला है. जिसमें दलित हमेशा सवर्णों से नीचे ही रहेंगे. अगर इन्होंने अपना मुख्यमंत्री घोषित कर दिया होता तो शायद ठीक होता कि अगला बड़ा पद किसी और को देंगे. पर पहले से ही दिमाग में भर के रखना और सबसे कहना तो बहुत बड़ा अपमान है. फिर ये किस मुंह से अधिकारी हैं उना में दलितों के खिलाफ अत्याचार पर बोलने के? ये वो चीजें हैं जो लोगों के दिमाग में गहरा धंसी होती हैं. लोग ऊपर से मीठा-मीठा बोलते रहते हैं. जब नशे में होते हैं, तो सच्ची बातें मुंह से निकल जाती हैं. अभी पंजाब में इनके जीतने के चांसेज बन रहे हैं, तो जीत और ताकत का नशा छा रहा है. तो इस नशे में वही बातें निकल रही हैं मुंह से. अभी तक तो पार्टी ने बहुजन समाज के लिये दिल्ली में कोई बड़ा डिसीजन तो लिया नहीं है. ना ही केंद्र सरकार के ही फैसलों को लागू कर पाये हैं. अभी तक तो इन्हें न्यूकमर होने का फायदा मिलता रहा है. पर धीरे-धीरे फेन उतरने लगा है. और सत्ता-लोलुपता के साथ दिल में रची-बसी चीजें सामने आने लगी हैं. जबान पर कोई लगाम नहीं है. यही काम दूसरी पार्टियां बिना कहे करती हैं और ये लोग ताल ठोंक के कह रहे हैं. जब दूसरी पार्टियां बिना कहे करती हैं तो निराशा होती है कि पॉलिटिक्स कर के किया जा रहा है. पर आशा रहती है कि इसको पॉलिटिक्स कर के सुलझाया जा सकता है. पर इन लोगों के खुल के कहने पर इंसान भयाक्रांत हो जाता है कि ये क्या है भइया. क्या कह रहे हो और क्यों. इसका तो कोई इलाज ही नहीं. पहले ही डिक्लेयर कर दिया. अब तो पॉलिटिक्स कर के भी नहीं सुलझाया जा सकता. अब दलित समाज को जरूरत है कि खुद का नेता चुनें और सरकार बनायें. नहीं तो ये लोग बस इधर-उधर के पद देते रहेंगे. और वोट मांगते रहेंगे. https://www.youtube.com/watch?v=xPugbbPSKlc Advertisement











