रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे
रश्मि प्रियदर्शिनी एक स्वतंत्र लेखक/पत्रकार हैं. मैथिली-भोजपुरी अकादमी की संचालन समिति की सदस्य हैं. उन्हें ज़ी नेटवर्क और हमार टीवी में पत्रकारिता का लंबा अनुभव प्राप्त है. कई मंचों से काव्य-पाठ करती आ रही हैं. आजकल 'बिदेसिया फोरम' नाम के डिजिटल प्लेटफॉर्म का संचालन कर रही हैं. दी लल्लनटॉप के लिए एक लंबी कहानी 'शादी लड्डू मोतीचूर' लिख रही हैं. शादी लड्डू मोतीचूर कहानी शहर और गांव के बीच की रोचक यात्रा है. कहानी के केंद्र में है एक विवाहित जोड़ी जिन्होंने शादी का मोतीचूर अभी चखा ही है. प्रस्तुत है इसका सातवां भाग -
भाग 1 - दिल्ली वाले दामाद शादी के बाद पहली बार गांव आए हैं!
भाग 2 - दुल्हन को दिल्ली लाने का वक़्त आ गया!
भाग 3 - हंसती खिलखिलाती सालियां उसके इंतज़ार में बाहर ही बरसाती में खड़ी थीं
भाग 4 - सालियों ने ठान रखा है जीजाजी को अनारकली की तरह नचाए बिना जाने नहीं देंगे
भाग 5 - ये तो आंखें हैं किसी की... पर किसकी आंखें हैं?
भाग 6 - डबडबाई आंखों को आंचल से पोंछती अम्मा, धीरे से कमरे से बाहर निकल गई!
भाग 7 - मुहूर्त बीत रहा है
सुबह दस बजे ही विदाई है उसकी.
रात गए बड़का बक्सा खोले पूनम अपने साथ ले जाने वाली चीज़ें अलग कर रही थी. स्कूल से कॉलेज तक के सारे सर्टिफिकेट वो पहले ही चन्दर के हवाले कर चुकी थी. शादी तय होने के बाद से ही वह चन्दर से 'दिल्ली-गाथा' सुनती आई थी कि -
दिल्ली सबको दिल में जगह देती है.
कि -
अगर आपमें थोड़ी सी भी प्रतिभा है तो दिल्ली आपको निराश नहीं करती.
कि -
यहां भूखे पेट तो कम से कम कोई नहीं मर सकता.
वह भविष्य को लेकर रोमांचित थी. नौकरी करना उसके बचपन का सपना था. टी.वी. सीरियल और फिल्मों ने इस सपने में और रंग भर दिए थे. फॉर्मल कपड़ों में सजी-संवरी, गले मे आई. कार्ड लटकाए, हाई-हील में टक-टक कर चलती उसने कई बार खुद को सपने में देखा था. यहां मायके में बाबूजी ने पढ़ा-लिखा तो दिया था, और गेस-क्वेश्चन रट के लड़कियों ने मुजफ्फरपुर से किसी तरह बी.ए. की डिग्री भी ले ली थी पर घर से दूर जा के नौकरी..! सवाल ही नहीं था. ये तो पूनम की किस्मत अच्छी थी और बकौल उसकी सहेलियों के 'उसने सोने के शिव जी को पूजा था' जो उसकी शादी दिल्ली में रह रहे लड़के से हुई थी..और फिर चन्दर ने भी तो उसे प्रोत्साहित किया था नौकरी के लिए.
मन ही मन भविष्य के सपने संजोती पूनम की निगाहें स्कूल वाली ऑटोग्राफ डायरी पर पड़ी. उसकी प्रिंसिपल ने शुभकामनाएं देते हुए उसे भविष्य की 'नलिनी सिंह' बनने का आशीर्वाद दिया था. वो मुस्कुरा उठी. बक्से में नव-वर्ष के कुछ आर्चीज़ कार्ड्स, कुछ गिफ्ट्स के रैपर्स और वो बर्थडे कार्ड भी मौजूद था जो खोलते ही दिन बन जाता था. कुछ रंग-बिरंगे पेन जिनकी स्याही तो न जाने कब की सूख चुकी थी पर उनसे झरते अल्फ़ाज़ आज भी बातें कर रहे थे. कुछ डायरियां जिनमें दबे पड़े सूखे फूल ज़िन्दगी के सबसे खुशनुमा बसंत के आगमन की याद थे तो कुछ पर्चियां, जो यहां-वहां कभी टी.वी.- रेडियो या किसी दोस्त से सुन कर जल्दी-जल्दी में लिखे गए शेरों-नज़्मों से भरी गईं थीं.
न जाने कितनी डायरियां तो ऐसी थीं जो ये सोच कर खरीदी गई थीं कि अब हर रोज़ पाबंदी से लिखना है पर जिनके पन्ने जनवरी से आगे कभी बढ़ ही नहीं पाए. जो बाद में लता-रफ़ी और सोनू निगम के गानों से भरी गईं या फिर उन रेसिपीज़ से जिनमें 'पति के पेट से दिल तक कैसे प्रवेश करें'...! हाँ, गोरेपन की टॉप सीक्रेट होमियोपैथिक क्रीम का नाम भी लिखा हुआ था और पन्ने को इस तरह मोड़ा गया था, कि कहीं गुम न हो जाए. तस्वीरें तो न जाने कितनी थीं... दिव्या भारती से लेते हुए उन सभी सहेलियों की जिनके साथ स्कूल पिकनिक और फंक्शन्स में खूब मजे किये थे. समय के साथ यह तस्वीरें कॉलेज के सरस्वती-पूजा पंडाल और कोचिंग के टीचर्स-डे की साझा तस्वीर तक सिमट कर रह गई थीं! किशोरावस्था से तरुणाई तक के न जाने कितने रंग, कितनी खुशबुएं यहां-वहां से सर उठाने लगीं. उसने उन सबको सहलाया और छोटे सूटकेस में बंद कर दिया. ये सब उसके साथ जाएंगी.
साथ जाने वाले सारे सामान को पैक कर पूनम बिचली कोठरी में दादी के पलंग पर आ गई. जैसे ही उसने दादी की कमर में हाथ डाला, उसकी सिसकी निकल पड़ी....नींद में डूबी दादी आदतन उसे धीरे-धीरे थपकी देने लगीं. पूनम की सिसकियां और तेज़ हो गईं...
सुबह-सुबह अम्मा की आवाज़ से उसकी नींद खुली. अम्मा कभी उसे सोते से नहीं उठाती थी. पर आज तो उठाना ही था -
उठ जा पूनम, नहा-धो कर कुलदेवी का आशीर्वाद ले ले...
फिर कुछ सोच कर बोलीं-
ससुराल में इतनी देर तक मत सोना बिटिया.
पूनम नींद से बोझिल अपनी बड़ी-बड़ी पलकें झपका कर अम्मा का मुंह देखने लगी. अम्मा आंखें चुराती उठ खड़ी हुई.
बाहर एक कार और ट्रैक्टर-टेलर धोए जा रहे थे। ट्रेक्टर पर साथ जाने वाले सामान लादे जाएंगे और गाड़ी में चन्दर-पूनम के साथ घर का कोई सवांग भी जाएगा. उधर आंगन में नहा-धोकर तैयार खड़ी पूनम के पैरों पर छोटी बहन महावर लगा रही है. सुहागिनें मायके से ससुराल या ससुराल से मायके सादा-पैर नहीं जातीं. आलता-महावर में रचे पैर शुभ सगुण साथ लाते हैं. बहन की सारी शोखियां आज गायब हैं. थोड़ी देर बाद भारी पायल और बिछुए का नया जोड़ा लिए अम्मा आई और छोटकी को देते हुए कहा -
ये ले... और हां, बाली उतार के उसके पर्स में डाल और मेरा झुमका पहना उसे.
पूनम ने अम्मा को देखा और इनकार करती हुई बोली -
अब ये झुमके क्यों अम्मा! रहने दे न. दोंगे में कौन करता है इतना. ऐसे ही इतना कुछ दे दिया है.
अम्मा ने कुछ नहीं कहा. पास आई और उसके माथे को चूमती हुई पीढ़े पर बैठा दिया -
खाना खा ले. समय हो गया है.
पीली-हरी भागलपुरी सिल्क पहनी पूनम ने रसोई-घर को भरी-भरी निगाहों से देखा. हर कोने में, हर डिब्बे-हर बर्तन पर उसके हाथों का स्पर्श है. बाबूजी को उसी के हाथ के पेड़े भाते हैं क्योंकि वो खोये को देर तक भून कर ललछौंहा रंग देती है. दादी को उसी के हाथ की लहसुन-मिर्च की चटनी पसंद है और अम्मा को पूनम के बनाए पिट्ठे ही पसंद हैं. अम्मा ने थाली उसके सामने रखी. कोहड़े की सब्ज़ी और कढ़ी के साथ साग और मछली. अम्मा ने देखा सर झुकाए बैठी पूनम की थाली के पास टप-टप आंसू की बूंदे गिरी जा रही हैं. मां का मन हुआ कलेजे में छुपा ले उसे.
गहनों से लदी ब्याह की चूनर सर पर रखे पूनम पूजा-वाली कोठरी की ओर जा रही है. साथ मे चन्दर भी है. दोनों ने एक साथ कुलदेवी को सर नवाए. अम्मा ने पूनम की आंचल में सुप से पांच बार हल्दी से रंगे चावल डाले. उसमें गुड़हल के कुछ फूल, दूब और हल्दी की पांच फलियों के अलावा चांदी का एक सिक्का डालकर गांठ बांध दी. ये 'खोइचा' अब ससुराल में ही खुलेगा. माएं 'खोइचा' के रूप में बेटियों के साथ लक्ष्मी और अन्नपूर्णा को साथ भेजती हैं.
समय हो चुका था. गाड़ी स्टार्ट होने की जैसे ही आवाज़ आई, पूनम की धड़कनें बेतहाशा तेज़ हो गईं. वो बिलख-बिलख कर रोने लगी. अम्मा, दादी, चाची और बुआओं के गले लगती पूनम को सबने चुप कराना चाहा. वह खुद के आंसू नहीं रोक पा रहे थें. गमछे से पूरे चेहरे को ढके, आंसुओं को सबसे छिपाए बाबूजी ने आवाज़ लगाई-
मुहूर्त बीत रहा है... जल्दी करो सब.
अम्मा ने पूनम को अपने अंकवारी में लिया और गाड़ी की ओर चल पड़ी. गाड़ी में बैठने से पहले दूल्हा-दुल्हन के मुंह मे पान की खिल्ली रखी गई. आज की यात्रा का जतरा पान ही था. पूनम को बिठा कर अम्मा और बाबूजी ने अपने हाथ जोड़े और दामाद के सम्मुख खड़े हो गए. चन्दर ने अरे! कहते हुए उन दोनों के चरण-स्पर्श किये और आज्ञा मांगी.
घर-दुआर, गांव-गलियों को डबडबाई आंखों से निहारती पूनम नये सफ़र पर जा रही थी.
…टू बी कंटीन्यूड!
Video देखें:
एक कविता रोज़: अज्ञेय की कविता 'चीनी चाय पीते हुए'