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संदीप नाईक
संदीप नाईक ने एमए, एम फिल- इंग्लिश लिटरेचर और टाटा सामाजिक शोध संस्थान मुम्बई से विशेष अध्ययन किया है. उनकी देश भर की पत्रिकाओं, अखबारों में कहानियां कविताएं पुस्तक समीक्षाएं प्रकाशित हो चुकी हैं. कहानी संग्रह ‘नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथाएं’ पर 2015 का प्रतिष्ठित वागीश्वरी पुरस्कार प्राप्त कर चुके संदीप अपने इस लेख के बारे में कहते हैं - कहानी, कविता लिखते समय कई बड़े लेखकों आलोचकों को पढ़ा तो लगा कि, की हुई आलोचना कभी रचना से मेल नहीं खाती और एक तरंग में आलोचक अपनी विद्वता दिखाते हुए रचना की ऐसी-तैसी कर देता है. रचना जो बहुत श्रम साध्य प्रक्रिया से लिखी जाती है. अस्तु मैंने आलोचना जैसी पत्रिकाएं टटोलीं और फिर एक आलोचक का जो चरित्र उभारा वो इस व्यंग-आलेख में आया है.
हिंदी-साहित्य आलोचक के नज़रिए से - तीसरा भाग
# 9)आलोचक ने अब सोचा कि हिंदी में कहानी कविता उपन्यास ललित निबंध आदि विधाएं पुरानी पड़ गयी है, इससे बेहतर है कि एक नई निंदा विधा को ईजाद किया जाए और यह एक ऐसी विधा - जो अत्याधुनिक शास्त्रों और शस्त्रों से सुसज्जित हो. ताकि, अपने हथियारों को छुपाकर ऐसे वार किये जाएं जिससे सभी ढोल गंवारों और साहित्यिक पशुओं को निपटाया जा सके.
सो, आलोचक ने युवा होते छर्रों को अपना शिकार बनाया. उन्हें जंगल राज की पोथी में से बांचने को अध्याय दिए. कुरूक्षेत्र से छपने वाली पत्रिका में कूड़ा छापा इस तरह से अपनी मार्केटिंग करके आलोचक ने वृहद् दायरा बनाया. फिर धीरे धीरे बाज़ार को गाली देते बाजार से रिश्ते कमाए, रुपया बनाया और संपत्ति इकठ्ठी की.इस तरह से देश में गरीबी को भुनाते ओर सम्पत्ति को गलियाते हुए उसने साहित्य को वाम, दक्षिण और मध्यममार्गीय लोगों को भला किया और प्रवचन शुरू किये - इस तरह से हिंदी में निंदा विधा का प्रादुर्भाव हुआ और वागीश को स्मरण करते हुए वागर्थ धर्म का पालन कर आलोचक ने साहित्यानुरागियों को एक अनूठा संधान दिया और पूंजी को आसरा !!!
# 10)
फिर आलोचक ने NGO में कुकुरमुत्तों की तरह उग आये युवा और बे-मेल शादी करने वालों से लेकर कॉलेज के प्राध्यापकों, मीडिया के भांड और साहित्य में पनप रहे भाई भतीजावाद को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि ये जो सामजिक परिवर्तन की अंगडाईयां ली जा रही है वह ऐसी ही बेमेल है जैसे कोई शादी कर ले किसी शहर में और दिल्ली में जाकर बस जाए लिव-इन का बहाना बनाकर, या कोई श्री-गौड़ ब्राह्मण किसी विजातीय युवा से ब्याह कर पूंजी के बल पर मार्क्स को चुनौती देते हुए दिशा बदले अपने विध्वंसकारी संस्कारों के बल पर या फिर मीडिया का कोई चारण किसी संघी या कट्टर मुस्लिम को गाली देते हुए वेब पेज पर अपनी टीआरपी बढ़ाते हुए नौकरी सुरक्षित करे.
ठीक इसी प्रकार की सृजनात्मकता इन दिनों साहित्य में देखी जा सकती है. आलोचक ने अपनी गरीबी का एक चिथड़ा उघाड़ते हुए कहा कि ये जो हिंदी के नाम पर पुलिस और भारतीय प्रशासनिक सेवा से अघाये अफसरों को विश्व विद्यालयों के नाम कुत्ते सी रोटी परोसी जाती है, वह भी हिंदी का नुकसान ही कर रही है.आलोचक बेहद कटु हो आया था यह कहते हुए. अपने पेट की मरोड़ को दरकिनार करके उसने फिर दोस्तों की आयातित व्हिस्की का एक भयानक बड़ा पेग बनाया और बोला कि डाक्टरों ने भी हिंदी में आकर जो सत्यानाश किया है वह कम नहीं है. इस तरह से उपन्यास की विधा और ललित निबंधों की परम्परा बोध पर नामवर सिंह और काशीनाथ क्या और कैसे लिखेंगे.
फिर अपने सारे कहे का सार समेटते हुए आलोचक ने बड़ी डकार के साथ प्रकाशक के आये चेक को जेब में रखते हुए कहा कि कविता का कोई इतिहास नहीं और भविष्य भी नहीं और टुच्चे तरीके से फेसबुक पर कहानी लिखने वालों को और परखा जाए.
# 11)
फिर आलोचक ने दूर कहीं देखा और बोला ये बच्चों की हत्या नहीं, एक कहानी और वाङ्गमय की आत्महत्या है. एक ऐसे समय में जब कविता पूंजीपति के द्वार पर वेश्या बनकर नाच रही हो और उपन्यास की व्यास पीठ पर मुजरे हो रहे हों, राज्य प्रायोजित हिंसा अपने कलरव और साम्प्रदायिकता के शोर में सारे कलाकारों को एक कूची से हांक कर किसी गौशाला में दूहने ले जा रही हो और मूर्तिकार एक ऐसा म्यूरल बना रहे हो जिस पर समय की विभीषिका या गैस त्रासदी में मरे लोगों के पिंजर नहीं, एक नग्न राजा के कुकृत्यों का नख-शिख दंत वर्णन हो रहा हो, वहां क्या साहित्य की भूमिका है?
यह कहकर आलोचक ने सुराही से मिट्टी के कुल्हड़ में पानी की चन्द बूंदें भरीं, मुंह पर छींटा और फिर अपने शुष्क हो आये होठों को भयानक प्यासी हो आई जीभ से दुलारते हुए सर पर हाथ फेरा और बोला कि यह कहते झिझक होती है कि मेरे जैसे ख्यात, दुर्लभ और ऐतिहासिक साहित्य के व्यसनी से भी दो कौड़ी का टुच्चा प्रकाशक किताब छापने का बीज धन भीख की तरह से मांगता हैं... दुखद है...इतिहास बदला लेगा इन सबसे, जो पुस्तक प्रदर्शनियों में किताबें बेचकर लेखक को घर में बना बीवी के हाथ का परांठा भी नही खिला सकते एक दोपहरी में .....कलयुग में यही सब होना था.
इससे तो बेहतर है कि फिल्मों में कुछ श्रेष्ठ गढ़ा जाये, गुना और बुना जाए !!! आलोचक ने फिर एक सनन मनुक्का निकाली और दूध में घोलकर पीने लगा. शोधार्थी हतप्रभ थे वे भी ज्ञान की टोंटी खोलकर साहित्य में क्रान्ति गटकने लगे !!!
# 12)
उस समय जब दुनिया बच्चों के ग़म से सरोबार थी और एक कवि अपने जन्मदिन पर क्षोभ मना रहा था तब आलोचक कहानी उपन्यास में कविता को खारिज करते आत्ममुग्ध होकर आसमान के किसी कोने में एक पेंटिंग तैयार कर रहा था कि अब वॉन-गॉग के बाद उसे ही महिमा मंडित होना है.
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