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'NGO कल्चर ने देश का सत्यानाश किया है!'

यह आर्टिकल संदीप नाईक ने लिखा है. हम इसे आपको चार किस्तों में पढ़ाएंगे.

संदीप नाईक
संदीप नाईक

संदीप नाईक ने एमए, एम फिल- इंग्लिश लिटरेचर और टाटा सामाजिक शोध संस्थान मुम्बई से विशेष अध्ययन किया है. उनकी देश भर की पत्रिकाओं, अखबारों में कहानियां कविताएं पुस्तक समीक्षाएं प्रकाशित हो चुकी हैं. कहानी संग्रह ‘नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथाएं’ पर 2015 का प्रतिष्ठित वागीश्वरी पुरस्कार प्राप्त कर चुके संदीप अपने इस लेख के बारे में कहते हैं – कहानी, कविता लिखते समय कई बड़े लेखकों आलोचकों को पढ़ा तो लगा कि, की हुई आलोचना कभी रचना से मेल नहीं खाती और एक तरंग में आलोचक अपनी विद्वता दिखाते हुए रचना की ऐसी-तैसी कर देता है. रचना जो बहुत श्रम साध्य प्रक्रिया से लिखी जाती है. अस्तु मैंने आलोचना जैसी पत्रिकाएं टटोलीं और फिर एक आलोचक का जो चरित्र उभारा वो इस व्यंग-आलेख में आया है.


हिंदी-साहित्य आलोचक के नज़रिए से – प्रथम भाग

# 1)

फिर आलोचक ने एकलंबी डकार ली और कहा कि NGO कल्चर ने देश का सत्यानाश किया है और जिस तरह से तलुए चाटकर ये देश में संपत्ति के पूरक बन गए हैं, वह आने वाले समय के लिए, साहित्य के लिए घातक है.

देश में अंबानी – अडानी और गांव की तस्वीर देखते हुए मुझे लगता है कि हमें आने वाले समय के लिए कुछ ठोस करना होगा, यदि मेरी किताबें बड़ी तादाद में छपे और यहां की माटी में रचे बसे और प्रेम में पगे किस्से कोई छापे तो एक खूबसूरत पुस्तकालय बनाया जा सकता है. ऐसे सद-प्रयास ही ज़मीन बचाएंगे क्योकि देश में अराजक माहौल होता जा रहा है और इस समय देश को मेरे जैसे लोगों की नितांत आवश्यकता है. देखो चहूं-ओर मेरे ही यशगान से देश अटा पडा है, पत्रिकाएं प्रशस्ति गा रही है, रुदालियां विरह गीतों में मेरे किस्से सुनाते हुए ऐसी विहल हो जाती हैं कि जन समुदाय मृतक के बजाय मेरे किस्से में डूब जाता है और फिर क्रांति के कदमों से श्मशान के बाहर निकलता है उसमे कोई वैराग्य भाव नहीं वरन एक बदलाव की आशा और तमन्ना होती है, दूरदर्शन और रेडियो मेरे ही गुणगान में व्यस्त हैं, तमाम एंकर मेरे साहित्य को आधार बनाकर परिवार पाल रहे हैं, स्कूल, कॉलेज और विश्व विद्यालय यानि देश से लेकर विदेश तक मेरे बनाए तिलिस्मों से भरे पड़े हैं और विदेशी छात्रों और छात्राओं के आने वाले फोन यह बताते है कि मेरी किस्सागोई का अंदाज़ निराला और जुदा है.

कहते कहते आलोचक ने धीमे से आंखें बंद की और फिर एक उद्घोषणा की और कहा कि वो जो ज़मीन पड़ी है उसर में गांव के भीतर और कमबख्त एक आदमी उस पर कब्जा जमाये बैठा है और फसलें उगा हड़प जाता है हर साल, क्यों ना उस ज़मीन पर एक प्रकल्प आरंभ किया जाए – एक संस्था खड़ी की जाए उसे संपूर्णतः आधुनिक बनाकर वहां साहित्य का काम आरंभ किया जाए, यह आवश्यक ही नहीं बल्कि समय की पुरजोर मांग है, उस अवनी को इतना भव्य बना दो कि वहां तमाम तरह की विलासिता की चीजें हों और देश में इसका नाम हो, मेरे नाम के साथ, सब लोग देश विदेश से आएं-जाएं और वहां रौनक हो, हंसी हो खुशी हो और किताबें बिकें, भाषा का सृजन हो, और धन की बरसात हो – ताकि वहां कुबेर स्थाई निवास कर सके और फिर लक्ष्मी चंचला के बहाने सरस्वती का स्थाई वास हो.

आलोचक ने फिर यकायक अपनी पटरी पर गाड़ी रखी और बोला कि NGO कल्चर ने जो संपत्तियां बनाई है और इसमें काम करने वाले भ्रष्ट लोगों की फौज देश में खड़ी की है, उसने धन्ना सेठ संस्कृति को बढ़ावा दिया है. आलोचक ने एक दिव्य दृष्टि डाली सब पर फिर कहा कि उस ज़मीन पर भव्य भवन बनाने को चंदा इकठ्ठा करो और फिर वह हाजत करने निकल गया.


# 2)

आलोचक ने एक उंघती दोपहरी में जमा दो चार लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि लेखक संघों के झगड़े अनंतिम से हैं और इन पर बात करने के पहले इनकी प्रवृत्ति समझना बेहद जरुरी है, जो लोग भी झंडा उठाकर लेखक बन जाते है या संघों का निर्माण करते है, वे वास्तव में लेखक नहीं किसी के कांधे खोज रहे होते हैं, जो सिर्फ चरवाहे का काम करके लोगों का हुजूम इकठ्ठा कर लें और गाहे-बगाहे हमारे सामने पेश कर दें, क्योंकि हम अपनी लेखकीय क्षुधा तभी तो शांत कर पाएंगे जब हमारी भड़ास को एक जन मानस सुनेगा, गुंथेगा, या फिर हमारे लिए ताली बजाएगा.

ये सारे संघर्ष, ये सारे मोर्चे और सारे झंडे किसी विचारधारा मसलन सीटू, मीतू, माकपा, भाकपा, या माले, भाले के लिए नहीं वरन उसकी किताब मेरी किताब से ज़्यादा कैसे बिके, या उससे ज़्यादा मेरी भड़ास दीगर शहरों में कौन ज़्यादा सुने या अन्य शहरों में मेरे सत्संग कैसे ज़्यादा हो, इस पर है. यह सुनकर एक बुजुर्ग से होते सज्जन ने पुरी दुर्जनता से पूछा कि एक मोहल्ले में चार संघ या एक कस्बे में दस संघ या एक शहर में पचास संघ का क्या अर्थ है, तो आलोचक तनिक रुका – खैनी खाई, पीक थूका और बोला कि यदि बहुत ई दिक्कत है तो एक ठो ससुरा फेडरेसन काहे ना बनवा कर NGO इस्टाईल में पंजीकृत करवा दें ताकि कही से ग्रांट मिल जाए, उ कलवा, और ई रामदीन का भाणेज राजधानी में काहे यूनिसेफ में घिस रहा है और काहे वो रशीद्वा की छोरी महिला पंचायत के साथ लुगाईयों की टोली में NGO-NGO खेलत है, फेडरेसन बनेगा तो ससुर ग्रांट आएगी और फिर मस्ती से यही छानेंगे और यही धुनी रमाकर बैठेंगे, मां सुरसती की आराधना करेंगे, जाओ, हर मोहल्ले में संघ बनाओ और सुरुआत करो अपने बंटी, पप्पू, कलावती और उ बहुत पटर पटर करत रही ना, का नाम उको- हां वो शर्मीली – इन सबको घेर-घारकर एक ठो संघ बनाओ फिर दूसरों और फिर तीसरो बनाओ, क्या है कि सरकारी नौकरी होने से रही अब हमसे, इन लोगों को ज्ञान की दडिया और जडिया पिलाए तो कुछ अपना बुढ़ापा सुधरे, मोहल्ले के तीन लोग ऊब गए थे, खड़े हुए अनमने से और फिर उन्होंने पुट्ठे झाड़े, काले कलूटे पायजामे का नाड़ा बांधा और मुंह में उंगली घुमाकर फिर आलोचक को एक प्रश्न दागा कि चंदा कहां से आएगा, तो आलोचक ने बोला यही दिक्कत है कि तुम लोग रुपया पैसा में बर्बाद हो गए हो, नाम की और यश की नहीं सोचते, सब हो जाएगा, बस संघ बनाओ, मै हूं ना सब पर कहानी लिखूंगा, साली ऐसी चीज होगी कि दुनिया देखती रह जाएगी.

मुझे एक – दो नहीं, मोहल्ला वार और घरवार संघ चाहिए, यदि पति – पत्नी हों तो वे दोनों भी प्यार-मुहब्बत के अलावा दो संघों के पदाधिकारी होना चाहिए. चलो अब खिसको और भागो संघ बनाओ. आलोचक ने खैनी थूकी और फिर एक भांग का लोटा हाथ में लेकर गटागट पी गया.


# 3)

कहानी, कविता और उपन्यास से लगभग ख़त्म हो चुके और साहित्य से हकाले गए आलोचक ने अपने आप को इधर झोंक दिया और फिर उसे लगा कि अब संसार में कुछ नहीं बाकी है तो उसे लगा कि फ़िल्म ही वह माध्यम है जो उसे फिर से एक बार धन्ना सेठ बनाने के रास्ते में आने वाली सभी अड़चनों से दूर कर सकता है.

बस एक मोटे बनिए टाईप आदमी को पकड़कर आलोचक ने अपनी सारी घटिया कहानियां उसे पेल दी परंतु वह टस से मस नहीं हुआ, इस तरह शहर के सभी बनियों, जायसवालों और ओसवालों, अग्रवालों और साहूओं के भरोसे भी एक बार में शहर के सभी बियर बार में बैठ आया, परंतु मामला जमा नहीं कहीं, फिर लगा कि उसमें ही दिक्कत है, सो, अबकी बार उसने फिर एक बड़े से होटल में बैठकर फिर छः से आठ लाख का दांव फेंका कि काश लग जाए और फिर सर्वहारा, किसान, महिला, दलित और शोषकों के पांसे फेंककर उसने इस मोटे मुर्गे को साधने की कोशिश की, पुरजोर ताकत लगाकर – पर दांव फिर एक बार फेल हो गया, सुट्टा मारते हुए जब वह अपने घुंघराले बालों में मुर्गे को कांच के गिलास में ढले जाम के पार से झांक रहा था तो उसकी निगाहें किसी क़ातिल की तरह से उस मुर्गे को चबाकर पूरी तरह से चांप जाना चाहती थी, क्योंकि आख़िरी उम्मीद पर बैठा यह मुर्गा यदि हाथ से फिसल गया तो उसका बना – बनाया तिलिस्म भरभराकर गिर जाएगा और जो छर्रे उसने इन दिनों पाल रखे थे उनके सामने उसकी थू थू हो जाएगी या जिन वजीरों और बादशाहों को गलियाते हुए अपने अपराध बोध में वह जी रहा था या जिन धन्ना सेठों, जागीरदारों, मास्टरों और मीडिया की लोंडीयों के साथ नई – नई गाड़ियों में सर्वहारा की दुहाई देते हुए दारु के पैग खींचता रहा था या एक अदद मकान की जुगाड़ में फूटपाथ से वह राजमहल में पहुंचना चाहता था, शोहरत और दौलत के इस मुर्गे को पटाए बिना संभव नहीं था और आखिर हार कर उसने अपना अंतिम पत्ता बड़े धैर्य से फेंटा और कहा कि यदि आप कहें तो मैं अपनी विचारधारा और सारे लिखे को एक सिरे से निरस्त करने को तैयार हूं, यह उसके साहित्यीक जीवन का समाहार था और वह लगभग हताश हो चुका था, और इसके अलावा उसके पास कोई चारा नहीं था, अकादमिक रूप से दरिद्र और विचारों से खाली चुका हुआ आदमी और क्या करता ?

बस यही सुनना था कि मोटे मुर्गे ने कहा कि अपना लिखा मेरे नाम कर दो ….एक बार आलोचक ने सोचा और फिर कहा कि मेरे कंप्यूटर की हार्ड डिस्क आपको दे देता हूं और फिर वह लगभग चरण वन्दना की मुद्रा में आया और झोले से डिस्क निकालकर दे दी और एक फ़िल्म के मीठे सपनों में चार पैग में चढ़ी मुफ़्त की दारु, जो अक्सर उसे यूं ही मिल जाया करती थी, को गटक कर अपने खोली में चलता बना, आज आलोचक फुल-टू मस्ती में था और साहित्य की मां-भैन करते हुए सोच रहा था कि अब दोस्तों को क्या कहे कि कहानी , कविता और उपन्यास कहां गए….?


# 4)

हिंदी का यह दुर्भाग्य है कि इसमें वह तहजीब नहीं है जो उर्दू या फ्रेंच में होती है, कितने भाषाओं के शब्दों को लेकर नाजायज़ बनी यह जाहिलों, गंवारों की भाषा कुछ शिक्षाविदों, राजनैतिक रूप से कमज़ोर लोगों की महत्वकांक्षा और ऊंचे एंबीशन की शिकार हो गयी, हिंदी में लेखन की परंपरा में जो भी विश्व विद्यालयों में लिखाया पढ़ाया जा रहा है वह कालातीत हो गया है, वीर गाथाकाल से लेकर आज तक बंटे हुए समय में और दोहा सोरठा से लेकर श्रृंगार रस और वीभत्स रस में डूबा हिंदी का कुंठित संसार कभी विश्व फलक पर छा नहीं सकता.

हां, यह दीगर बात है कि इधर मेरी दो तीन क़िताबें आने के बाद अब हिंदी में बुकर, मेगसेसे और नॉबेल के लिए विश्व विचारवान हो रहा है, परंतु अभी भी यह प्रश्न विचारणीय है कि रामचंद्र शुक्ल, हजारीप्रसाद से लेकर नामवर सिंह या विश्वनाथ त्रिपाठी या कि पत्रिकाओं में देखे तो आलोचना, बहुमत या गंगा में क्या लिखा गया और अब जो इन दिनों मैंने जो पत्रिकाएं संपादित कीं, वहां आंदोलन से लेकर ज़मीनी हकीकतों का फसाना है जो शायद हिंदी के इतिहास में कहीं परिलक्षित नहीं होता. इसलिए जब मैं कहता हूं केदारनाथ जी को ज्ञानपीठ या किसी ढपोल शंखी को भारत भूषण मिलता है तो दर्द होता है मुझे कि हिंदी का क्या स्तर बनाकर रख दिया है इन लोगों ने, प्रशासन और विश्व विद्यालयों के काडर, पूंजीपतियों और धन्ना सेठों की अमर होने की हवस ने हिंदी को विश्व की लुप्त होती भाषा में लाकर पटक दिया है, प्रो. गनेश देवी से यही बात हो रही थी तो उन्होंने कहा कि लोक भाषाएं छोड़कर वे अब हिंदी के लिए काम करेंगे, मेरी किताबें उन्होंने मंगवाई हैं और कहा है कि इन पर कम से कम पंद्रह PHD तो वे करवा ही देंगे और इस बहाने क्षरित होती भाषा को एक निस्संगता के साथ देखा जाएगा.

इतना एक सांस में कहकर आलोचक के कंधे दुखने लगे थे और फिर उसकी देह यष्टि को सरसों के तेल से मालिश करने को नव-यौवना ने धूप में खटिया को घूमा दिया और मोहल्ले से गुज़रने वाले लोग ओटले पर पड़े इस हिंदी के नंग धडंग आलोचक को देखकर बरबस ही मुस्कुराते हुए निकलने लगे, सरसों की तेल में गंधाता आलोचक बड़बड़ाता हुआ हिंदी में बुकर ना मिलने की लगातार शिकायत कर रहा था और अपने कम ज्ञान और लोक भाषा में सशक्त होने की दलील भी दे रहा था, नव यौवना नाक पर हाथ रखकर उस मस्त सांड के शरीर पर नाजुक हाथों से सरसों का तेल मल रही थी.

(क्रमशः)


लल्लनटॉप में पढ़िये एक कविता रोज़ के कुछ संस्करण:

‘मेरी मां मुझे अपने गर्भ में पालते हुए मज़दूरी करती थी, मैं तब से ही एक मज़दूर हूं’
बड़े लोग इसी काम के लिए बेदांता नाम के हस्पताल में जाते हैं
किन पहाड़ों से आ रहा है ये किस समन्दर को जा रहा है, ये वक़्त क्या है?
‘पंच बना बैठा है घर में फूट डालने वाला’
पाब्लो नेरुदा की कविता का अनुवाद: अगर तू मुझे भूल जाए
एक कविता रोज़: इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो
सुनो परम ! पैदल चलना, हाथ से लिखना और सादा पानी पीना…


Video देखें: कुंवर नारायण की कविता ‘बात सीधी थी, पर…’

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