केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा परिषद यानी CBSE में तीसरी भाषा सिखाने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है. सुप्रीम कोर्ट ने 16 जुलाई को CBSE करिकुलम के तहत 9वीं क्लास में तीसरी भाषा शुरू करने पर सवाल उठाए हैं. मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस बी वी नागरत्ना ने कहा कि इससे बोर्ड परीक्षाओं से ठीक पहले छात्रों पर बेवजह का दबाव पड़ेगा. साथ ही कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को भी सलाह दी है. कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को यह सलाह दी है कि वह केंद्र सरकार की शिक्षा नीति का विरोध सिर्फ़ इसलिए न करे कि वह केंद्र सरकार की ओर से आई है. कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य में जवाहर नवोदय विद्यालयों (JNVs) को लेकर बातचीत अभी भी चल रही है.
थर्ड लैंग्वेज पर सुप्रीम कोर्ट की दो टूक- '9वीं में बच्चों पर बोझ मत डालिए', दिया यह सुझाव
सुप्रीम कोर्ट ने थर्ड लैंग्वेज पॉलिसी पर अहम टिप्पणी की है. Justice BV Nagaratna ने कहा कि उनके स्कूल में छात्र मिडिल स्कूल के दौरान ही तीसरी भाषा सीखना शुरू कर देते थे, जिससे सेकेंडरी स्कूल लिविंग सर्टिफिकेट (SSLC) परीक्षा से पहले का बदलाव आसान हो जाता था.


सुप्रीम कोर्ट तमिलनाडु सरकार की एक अपील पर सुनवाई कर रही थी. ये सुनवाई तमिलनाडु सरकार की एक अपील पर की जा रही थी. तमिलनाडु सरकार ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील की थी. मद्रास हाईकोर्ट ने अपने आदेश में तमिलनाडु राज्य को हर जिले में जवाहर नवोदय विद्यालय बनाने में मदद करने का निर्देश दिया गया था. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक इस सुनवाई के दौरान ही जस्टिस नागरत्ना ने सवाल किया कि एक नई भाषा सिर्फ क्लास 9 में ही क्यों शुरू की जानी चाहिए? इस कदम को बहुत बुरा बताते हुए उन्होंने कहा कि स्टूडेंट्स पहले से ही क्लास 10 की बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी करते समय काफी पढ़ाई के दबाव का सामना कर रहे हैं. उन्होंने कहा,
नौवीं कक्षा में पहले से ही पढ़ाई का तनाव है. आप नौवीं कक्षा में नई भाषा क्यों शुरू करते हैं? इसे छठी कक्षा में ही शुरू करना चाहिए.
कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस नीति के समय पर फिर से विचार करने को कहा और कहा कि छात्रों को तीसरी भाषा बहुत पहले ही सीखना शुरू कर देना चाहिए. कोर्ट ने कहा,
जस्टिस नागरत्ना ने याद किए अपने स्कूल के दिनभारत सरकार, कृपया 9वीं कक्षा में तीसरी भाषा न रखें. CBSE, ICSE, स्टेट बोर्ड, दसवीं की बोर्ड परीक्षा होती है. इसलिए 8वीं कक्षा के आखिर से ही दबाव शुरू हो जाता है.
सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने अपने स्कूल के दिनों को याद किया. जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि उनके स्कूल में छात्र मिडिल स्कूल के दौरान ही तीसरी भाषा सीखना शुरू कर देते थे, जिससे सेकेंडरी स्कूल लिविंग सर्टिफिकेट (SSLC) परीक्षा से पहले का बदलाव आसान हो जाता था. उन्होंने बताया कि छात्र अपनी दूसरी भाषा के आधार पर कन्नड़, हिंदी या संस्कृत में से तीसरी भाषा चुन सकते थे. इसलिए इसे जितनी जल्दी शुरू करें, उतना अच्छा है.
1970 के दशक के अपने पढ़ाई के अनुभव का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा,
हमारे समय में, बोर्ड परीक्षा की तैयारी के लिए छात्रों को 8वीं क्लास में ही 10वीं क्लास के कॉन्सेप्ट्स से परिचित करा दिया जाता था. अगर हमारी ऐसी तैयारी होती थी, तो आज के छात्रों के साथ क्या हो रहा है? 9वीं क्लास में नई भाषा शुरू न करें. इसे 6ठी क्लास में ही शुरू करें. मैं 1976 के अपने अनुभव को याद कर रही हूं.
हिंदी को कंपल्सरी करना National Education Policy में नहींसुनवाई के दौरान, जस्टिस नागरत्ना ने यह भी क्लियर किया कि नेशनल एजुकेशन पॉलिसी में हिंदी को तीसरी भाषा के तौर पर जरूरी नहीं बताया गया है. उन्होंने कहा,
राज्य की भाषा सिखाई जानी चाहिए, इंग्लिश सिखाई जानी चाहिए और कोई भी तीसरी भाषा. इसमें हिंदी नहीं कहा गया है.
जवाब देने वाले NGO की तरफ से पेश हुए वकील ने बताया कि NEP में साफ तौर पर कहा गया है कि किसी भी राज्य पर कोई भी भाषा थोपी नहीं जानी चाहिए. इसके बाद जस्टिस नागरत्ना ने तमिलनाडु सरकार से पूछा कि आप हिंदी नहीं चाहते, लेकिन अगर यह संस्कृत है, तो क्या दिक्कत है? इस पर राज्य के वकील ने जवाब दिया कि तीसरी भाषा सिर्फ क्लास 9 से जरूरी हो जाती है. सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 11 अगस्त तक के लिए टाल दी है.
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