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पंजाब बंद क्यों है? 'बंदी सिंह' कौन हैं, किन कैदियों की रिहाई की हो रही मांग?

Punjab Band 2026: पंजाब में 21 अगस्त 2026 को कौमी इंसाफ मोर्चा के आह्वान पर बंद क्यों है? बंदी सिंह कौन हैं, किन सिख कैदियों की रिहाई की मांग हो रही है, उम्रकैद और 14 साल के नियम की असली कानूनी स्थिति क्या है, जगतार सिंह हवारा की पैरोल का मामला क्या है?

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21 अगस्त को पंजाब बंद के पीछे पूरी कहानी (फोटो-PTI)

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  • 21 अगस्त 2026 को पंजाब में सात घंटे का बंद रखा गया, जिसका आह्वान कौमी इंसाफ मोर्चा ने किया था, इसकी मुख्य मांग सिख कैदियों यानी 'बंदी सिंहों' की रिहाई थी।
  • यह बंद 15 अगस्त को चंडीगढ़-मोहाली बॉर्डर पर पुलिस-प्रदर्शनकारियों की टकराव वाली घटना और जगतार सिंह हवारा की पैरोल मांगे से उत्पन्न हुए तनाव के कारण हुआ था।
  • बंद के दौरान बाजार, सार्वजनिक परिवहन और रास्तों पर अवरोध देखे गए, पर जरूरी सेवाएं जारी रहीं, और घटना पंजाब सरकार की रिहाई व पैरोल नीतियों पर आगामी निर्णयों को प्रभावित कर सकती है।

पंजाब में आज, 21 अगस्त 2026 को सात घंटे का बंद है. कौमी इंसाफ मोर्चा ने सुबह 7 बजे से दोपहर 2 बजे तक पंजाब बंद का आह्वान किया था. सबसे बड़ी मांग उन सिख कैदियों की रिहाई है, जिन्हें सिख संगठन 'बंदी सिंह' कहते हैं. इसके साथ 15 अगस्त को चंडीगढ़ की तरफ मार्च कर रहे प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई और दर्ज किए गए मामलों का विरोध भी बंद की वजह है. एक और बड़ा मुद्दा जगतार सिंह हवारा को पैरोल देने का है.

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‘इंडिया टुडे’ की खबर के मुताबिक 21 अगस्त की सुबह से पंजाब के कई हिस्सों में बाजार बंद रहने, सड़कों पर आवाजाही प्रभावित होने और चंडीगढ़-मोहाली बॉर्डर पर सुरक्षा बढ़ाए जाने की रिपोर्ट आई है. कुछ जगह समर्थकों ने रास्ते भी रोके. हालांकि इसका असर हर जिले में एक जैसा नहीं है. जरूरी सेवाओं को बंद से बाहर रखा गया है.

'बंदी सिंह' आखिर कौन हैं?

'बंदी सिंह' किसी कानून में इस्तेमाल होने वाली आधिकारिक श्रेणी नहीं है. सिख संगठनों की भाषा में ये शब्द उन सिख कैदियों के लिए इस्तेमाल होता है, जिन्हें मुख्य रूप से 1980 और 1990 के दशक के पंजाब उग्रवाद से जुड़े मामलों में दोषी ठहराया गया और जिन्होंने लंबे समय से जेल में समय बिताया है.

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‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के मुताबिक इन संगठनों का तर्क है कि कई कैदी अपनी सजा पूरी कर चुके हैं या remission यानी सजा में छूट के लिए पात्र हैं, लेकिन अभी भी जेल में हैं. सरकार और कानूनी व्यवस्था का पक्ष इससे अलग है. किसी कैदी की रिहाई सिर्फ इस आधार पर तय नहीं होती कि उसने 14, 20 या 30 साल जेल में गुजार दिए. हर मामले में सजा, अपराध की प्रकृति, लागू कानून, संबंधित सरकार की remission policy और दूसरे कानूनी पहलुओं को देखना पड़ता है.

किन कैदियों की रिहाई की मांग हो रही है?

SGPC लंबे समय से नौ प्रमुख सिख कैदियों की रिहाई की मांग करती रही है. ‘द ट्रिब्यून’ के मुताबिक इस लिस्ट में गुरदीप सिंह खेड़ा, प्रोफेसर देविंदरपाल सिंह भुल्लर, बलवंत सिंह राजोआणा, जगतार सिंह हवारा, जगतार सिंह तारा, लखविंदर सिंह लखा, गुरमीत सिंह, शमशेर सिंह और परमजीत सिंह भ्योरा शामिल हैं. SGPC ने राष्ट्रपति को दिए अपने ज्ञापन में भी इन नौ नामों का उल्लेख किया है.

लेकिन यहां एक जरूरी सावधानी है. इन सभी कैदियों की कानूनी स्थिति एक जैसी नहीं है. अलग-अलग मामलों में अलग अदालतों के फैसले, सजा और remission से जुड़े सवाल हैं. इसलिए 'सभी ने सजा पूरी कर ली है' कहना कानूनी रूप से सही नहीं होगा. यही इस पूरे विवाद की सबसे महत्वपूर्ण बारीकी है.

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30 साल से ज्यादा जेल की बात क्यों हो रही है?

'बंदी सिंह' आंदोलन में लंबे समय से जेल में रहने वाले कैदियों का मुद्दा प्रमुख है. SGPC के पुराने अभियानों में कई कैदियों की जेल अवधि 25 से 30 साल से ज्यादा बताई गई है. उदाहरण के लिए SGPC ने गुरदीप सिंह खेड़ा, देविंदरपाल सिंह भुल्लर और दूसरे कैदियों की लंबी जेल अवधि को अपनी रिहाई की मांग का आधार बनाया है.

जगतार सिंह हवारा के मामले में पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने अगस्त 2026 में कहा था कि वो करीब 31 साल से जेल में हैं. मान ने उनकी बीमार मां से मिलने के लिए 10 दिन की पैरोल की मांग की है.

क्या उम्रकैद का मतलब 14 साल बाद रिहाई है?

ये इस विवाद को समझने के लिए सबसे जरूरी कानूनी सवाल है. आम बोलचाल में अक्सर कहा जाता है कि उम्रकैद की सजा 14 साल होती है. लेकिन कानून इतना सीधा नहीं है. Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita यानी BNSS की धारा 473 सरकार को सजा suspend या remit करने की शक्ति देती है. लेकिन धारा 475 कुछ खास मामलों में सीमा लगाती है.

दिल्ली हाई कोर्ट के सीनियर एडवोकेट नवीन दूबे इस कानूनी पेचीदगी को समझाते हुए कहते हैं,

अगर किसी अपराध में मौत की सजा भी कानून में संभव थी और अदालत ने उम्रकैद दी है, या मौत की सजा को उम्रकैद में बदला गया है, तो ऐसे व्यक्ति को कम से कम 14 साल जेल में बिताए बिना रिहा नहीं किया जा सकता. लेकिन इसका उल्टा यानी 14 साल पूरे होते ही स्वतः रिहाई का अधिकार भी कानून नहीं देता. remission एक अलग प्रक्रिया है.

किस सरकार को फैसला करना है, ये भी केस पर निर्भर करता है. BNSS में 'appropriate government' की परिभाषा के मुताबिक कुछ मामलों में केंद्र सरकार और दूसरे मामलों में राज्य सरकार संबंधित प्राधिकारी हो सकती है. कुछ मामलों में केंद्र सरकार की सहमति भी जरूरी हो सकती है.

यही वजह है कि बंदी सिंहों की रिहाई का मामला सिर्फ '14 साल पूरे हुए या नहीं' का सवाल नहीं है.

जगतार सिंह हवारा की पैरोल क्यों बड़ा मुद्दा बन गई?

इस समय आंदोलन का सबसे भावनात्मक मुद्दा जगतार सिंह हवारा की पैरोल है. हवारा को पूर्व पंजाब मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की 1995 में हुई हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था. उन्हें 2007 में मौत की सजा सुनाई गई थी, जिसे 2010 में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने उम्रकैद में बदल दिया.

अगस्त 2026 में मुख्यमंत्री भगवंत मान ने पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया से हवारा को 10 दिन की पैरोल देने की सिफारिश की. वजह बताई गई उनकी मां की खराब सेहत और उनसे मिलने की मानवीय जरूरत. मान ने कहा कि मामला चंडीगढ़ और दिल्ली से जुड़ा होने के कारण राज्यपाल की भूमिका महत्वपूर्ण है और अंतिम प्रक्रिया केंद्र तक जाती है.

इसके बाद 15 अगस्त का विरोध प्रदर्शन और 21 अगस्त का बंद इसी मुद्दे से और ज्यादा जुड़ गया.

15 अगस्त को चंडीगढ़-मोहाली बॉर्डर पर क्या हुआ?

15 अगस्त को कौमी इंसाफ मोर्चा के प्रदर्शनकारियों ने मोहाली के YPS Chowk से चंडीगढ़ की तरफ मार्च करने की कोशिश की. प्रदर्शनकारी पंजाब के राज्यपाल तक अपनी मांग पहुंचाना चाहते थे.

चंडीगढ़-मोहाली सीमा पर पुलिस ने बैरिकेड लगाए थे. प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड हटाने की कोशिश की. रिपोर्टों के मुताबिक कुछ बैरिकेड ट्रैक्टरों की मदद से हटाए गए, जिसके बाद पुलिस ने भीड़ को रोकने के लिए आंसू गैस और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया. दोनों पक्षों के अपने-अपने दावे हैं. प्रदर्शनकारियों ने पुलिस कार्रवाई को ज्यादा बल प्रयोग बताया, जबकि पुलिस का कहना था कि चंडीगढ़ में प्रवेश रोकने के लिए कार्रवाई की गई.

इसी घटना के बाद कौमी इंसाफ मोर्चा ने 21 अगस्त के बंद का ऐलान किया.

कौमी इंसाफ मोर्चा का आंदोलन कितना पुराना है?

ये कोई अचानक शुरू हुआ आंदोलन नहीं है. कौमी इंसाफ मोर्चा जनवरी 2023 से चंडीगढ़-मोहाली बॉर्डर के पास बंदी सिंहों की रिहाई को लेकर धरना दे रहा है. पिछले कई वर्षों से रिहाई, पैरोल और remission के मुद्दे पर पंजाब में अलग-अलग सिख संगठनों की सक्रियता बनी हुई है.

SGPC भी बंदी सिंहों की रिहाई के मुद्दे पर लगातार अभियान चलाती रही है. एक पुराने अभियान में SGPC ने राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन के साथ 26 लाख signatures/proforma जमा करने की बात कही थी.

स्कूल, बाजार और बसों का क्या असर है?

21 अगस्त को बंद का निर्धारित समय सुबह 7 बजे से दोपहर 2 बजे तक है. बाजार और कई व्यावसायिक प्रतिष्ठान प्रभावित हैं. निजी बस ऑपरेटरों और दूसरे संगठनों के समर्थन से सार्वजनिक परिवहन पर भी असर पड़ा है.

स्कूलों को लेकर स्थिति थोड़ी अलग है. निजी स्कूलों से जुड़ी संस्थाओं ने छुट्टी की घोषणा की है, जबकि सरकारी स्कूलों के खुले रहने की रिपोर्ट भी आई है. इसलिए 'पंजाब के सभी स्कूल बंद हैं' कहना सही नहीं होगा. पंजाब यूनिवर्सिटी ने 21 अगस्त को होने वाली परीक्षाएं भी री-शेड्यूल की हैं.

SGPC ने भी 21 अगस्त के लिए अपने दफ्तर और संस्थान बंद रखने तथा तय अंतरिम कमेटी मीटिंग को 22 अगस्त तक टालने का फैसला किया है. अस्पताल और मेडिकल स्टोर जैसी जरूरी सेवाओं को बंद से बाहर रखा गया है.

बंद कितना सफल रहा

21 अगस्त की सुबह तक उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक बंद का असर पंजाब के कई हिस्सों में दिखाई दे रहा है. बाजारों में बंदी, सार्वजनिक परिवहन में व्यवधान और कई जगह रास्तों पर अवरोध की रिपोर्ट है. चंडीगढ़-मोहाली बॉर्डर पर सुरक्षा भी बढ़ाई गई है. लेकिन अभी इसे पूरे पंजाब में एक समान 'पूर्ण बंद' कहना जल्दबाजी होगी. असर जिले और इलाके के हिसाब से अलग है.

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आगे पंजाब की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा?

बंदी सिंहों का मुद्दा पंजाब में सिर्फ जेल और remission का मामला नहीं है. इसके साथ 1980 और 1990 के दशक की हिंसा, सिख पहचान, न्याय, मानवाधिकार और राज्य-केंद्र संबंध जैसे सवाल जुड़े हुए हैं.

अभी सबसे ताजा घटनाक्रम ये है कि एक तरफ कौमी इंसाफ मोर्चा बंद के जरिए दबाव बढ़ा रहा है, वहीं पंजाब सरकार ने जगतार सिंह हवारा की मानवीय आधार पर 10 दिन की पैरोल का समर्थन किया है. लेकिन बाकी बंदी सिंहों की रिहाई अलग-अलग कानूनी मामलों से जुड़ी है. इसलिए आने वाले दिनों में असली सवाल यही होगा कि सरकारें remission और release के मामलों में क्या कदम उठाती हैं.

21 अगस्त का पंजाब बंद इस पुराने विवाद का नया अध्याय जरूर है. लेकिन इसकी कहानी सिर्फ आज बाजार बंद रहने तक सीमित नहीं है. असली लड़ाई ये है कि दशकों से जेल में बंद कैदियों के मामलों में कानून, remission, मानवीय आधार और राजनीतिक दबाव के बीच रास्ता कैसे निकलेगा.

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