पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह कांग्रेस पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए. हालांकि, इसके बावजूद वह बीच-बीच में ऐसे बयान देते रहते हैं जिससे लगता है कि बीजेपी में वह खुश नहीं हैं. उन्होंने नरेंद्र मोदी के इर्द-गिर्द बुनी राजनीतिक व्यवस्था को ‘मोदीइज्म’ यानी ‘मोदीवाद’ बताया. उन्होंने मोदी सरकार की उपलब्धियां गिनाईं, लेकिन कुछ सवाल भी दागे. अमरिंदर सिंह ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में लिखे अपने ओपिनियन पीस में इस बारे में बताया है.
कैप्टन अमरिंदर सिंह की 'मोदीइज़्म' पर नसीहत, 'एक चेहरे से नहीं, मजबूत संस्थाओं से बढ़ेगा देश'
पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 'Modi-ism' पर बात की है. उन्होंने PM Modi की उपलब्धियां गिनाई. कैप्टन ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की तारीफ की लेकिन इसके साथ-साथ उन्होंने कुछ सवाल भी उठाए और संस्थाओं को मजबूत बनाने पर जोर दिया.

इस ओपिनियन पीस में अमरिंदर सिंह ने पीएम मोदी की उपलब्धियां गिनाई हैं. उन्होंने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की तारीफ की. आखिर बीजेपी नेता अमरिंदर सिंह ने ‘मोदीइज्म’ को कैसे परिभाषित किया और बीजेपी की सरकार को लेकर क्या सवाल खड़े किए? उसे समझते हैं.
क्या है 'मोदीइज्म'?अमरिंदर सिंह के मुताबिक 'मोदीइज्म' एक ऐसा राजनीतिक और सरकारी मॉडल है, जिसके केंद्र में नरेंद्र मोदी का मजबूत नेतृत्व है. अपने ओपिनियन पीस में लिखा कि नरेंद्र मोदी ने बीजेपी को सिर्फ एक बड़ी राष्ट्रीय पार्टी नहीं बनाया, बल्कि उसे भारतीय राजनीति में सबसे बड़ी ताकत बना दिया. बीजेपी अपने पुराने इलाकों और सामाजिक आधार से आगे बढ़ी. इसमें मोदी का करिश्माई नेतृत्व खुद चुनावी राजनीति का एक बड़ा मुद्दा बन गया.
लेकिन अमरिंदर सिंह के मुताबिक, 2024 का लोकसभा चुनाव 'मोदीइज्म' के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ था. बीजेपी को 240 सीटें मिलीं और सरकार बनाने के लिए NDA के सहयोगियों की जरूरत पड़ी. अमरिंदर सिंह इसे मोदी की हार नहीं मानते, लेकिन इसे पहले के मुकाबले एक सीमित जनादेश जरूर बताते हैं.
अमरिंदर सिंह मोदी सरकार के सामने एक बड़ा लोकतांत्रिक सवाल रखते हैं. उनका सवाल है- ‘क्या किसी सरकार के काम करने की ताकत ही लोकतंत्र की पूरी कसौटी है?’ अपने इस सवाल का जवाब देते हुए कहते हैं- ‘नहीं, ऐसा नहीं है.’
सरकार के कामकाज पर दी रायअमरिंदर सिंह के मुताबिक, सरकार कितनी तेजी से फैसले लेती है, सड़कें कितनी तेजी से बनती हैं या योजनाएं कितने लोगों तक पहुंचती हैं, यह अहम है. इसके साथ ये भी देखना जरूरी है कि सरकार संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ किस तरह काम करती है.
वो मोदी सरकार के आलोचकों के उन आरोपों का भी जिक्र करते हैं, जिनमें कहा जाता रहा है कि इस दौर में देश की विविधता और अलग-अलग विचारों के साथ रहने की भावना कमजोर हुई है. संस्थाओं की स्वतंत्रता और संविधान की मूल भावना को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं. हालांकि अमरिंदर सिंह ने अपने ओपिनियन पीस में इनमें से किसी भी आरोप को सीधे स्वीकार नहीं किया.
'लोकतंत्र सिर्फ चुनाव का नाम नहीं'
लोकतंत्र को लेकर पंजाब के पूर्व सीएम अपनी चिंता भी जाहिर करते हैं. सिंह लिखते हैं, ‘संविधान को कमजोर करने के लिए जरूरी नहीं कि उसके शब्द बदल दिए जाएं. कागज पर संस्थाएं और नियम वैसे ही रह सकते हैं, लेकिन उनकी स्वतंत्रता, भरोसा और काम करने की परंपरा धीरे-धीरे कमजोर हो सकती है.’ अमरिंदर सिंह के मुताबिक लोकतंत्र सिर्फ चुनाव का नाम नहीं है. सत्ता पर नियंत्रण, असहमति का सम्मान, संसद के प्रति जवाबदेही और सभी नागरिकों को बराबर अधिकार भी उतने ही जरूरी हैं.
अल्पसंख्यकों को लेकर क्या कहा?
अमरिंदर सिंह कहते हैं कि चिंता ये नहीं है कि लोगों की धार्मिक आजादी खत्म हो गई है. चिंता ये है कि बहुसंख्यकों को खुश करने वाली राजनीति और भड़काऊ बयानबाजी से अल्पसंख्यकों के बीच बराबर सम्मान नहीं मिलने की आशंका मज़बूत हुई है.
उनकी बात समझाते हुए कैप्टन अमरिंदर सिंह कहते हैं, ‘अपनी संस्कृति और विरासत पर गर्व करना गलत नहीं है, लेकिन अपनी संस्कृति को दूसरों से बेहतर बताना सही नहीं हो सकता. भारत अपनी हिंदू सभ्यता और विरासत पर गर्व कर सकता है. यह भी समझना चाहिए कि देश हर नागरिक का है और सबको बराबर अधिकार मिलना चाहिए.’
'सुविधाएं देना नेता की मेहरबानी नहीं'
अमरिंदर सिंह मोदी सरकार के लिए एक संदेश देते हैं. उनके मुताबिक राशन, घर, रोजगार, स्कॉलरशिप और सामाजिक सुरक्षा जैसी सुविधाएं किसी नेता की निजी मेहरबानी नहीं हैं. ये सरकार की जिम्मेदारी हैं. इन योजनाओं का पैसा जनता के टैक्स से आता है और कानून के तहत लोगों तक पहुंचता है.
संस्थाओं की स्वतंत्रता पर भी अमरिंदर सिंह ने सवाल उठाया है. वो कहते हैं कि किसी संस्था की आजादी सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि उसका फैसला कानून के दायरे में है या नहीं. नियुक्तियों की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है और जनता को संस्था की स्वतंत्रता पर कितना भरोसा है, ये भी उतना ही महत्वपूर्ण है.
इलेक्शन कमिश्नर्स की नियुक्ति पर जताई चिंता
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर भी उन्होंने चिंता जताई है. उनका मानना है कि मौजूदा व्यवस्था में चयन प्रक्रिया में सरकार की भूमिका ज्यादा है. आखिर में अमरिंदर सिंह 'मोदीइज्म' के भविष्य को लेकर अपनी सबसे अहम सलाह देते हैं. उनके मुताबिक 'मोदीइज्म' की अच्छी चीजें आगे जारी रहनी चाहिए, लेकिन अब इसे नेता-केंद्रित राजनीति से संस्थाओं को मजबूत करने वाली राजनीति की तरफ बढ़ना चाहिए.
यानी बीजेपी में रहते हुए अमरिंदर सिंह ने मोदी के नेतृत्व की उपलब्धियां भी गिनाईं और उसी मॉडल की सीमाओं पर सवाल भी खड़े किए. अमरिंदर सिंह 'मोदीइज्म' को खारिज नहीं करते, लेकिन वो ये जरूर कहते हैं कि मजबूत नेता के साथ मजबूत संस्थाएं भी जरूरी हैं.
गांधी परिवार के साथ पुराने संबंध
अमरिंदर सिंह के इस ओपिनियन पीस की टाइमिंग को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. बीते दिनों एक सोशल मीडिया सेशन के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह को भाजपा में अपना पसंदीदा नेता बताया था. उन्होंने कैप्टन को 'कूल' बताया था. इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि राजनीतिक रूप से वह भाजपा के प्रति प्रतिबद्ध हैं, लेकिन गांधी परिवार के साथ उनके पारिवारिक संबंध हमेशा रहेंगे.
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कौन हैं कैप्टन अमरिंदर सिंह?कैप्टन अमरिंदर सिंह भारतीय सेना के पूर्व अधिकारी और पटियाला रियासत के शाही परिवार से आते हैं. वे लंबे समय तक कांग्रेस के एक प्रमुख नेता रहे हैं. उन्होंने दो बार पंजाब के मुख्यमंत्री के रूप में काम किया. पहली बार 2002 से 2007 तक और दूसरी बार 2017 से 2021 तक कांग्रेस सरकार में पंजाब के मुख्यमंत्री रहे.
लेकिन पंजाब कांग्रेस की अंदरूनी कलह और नवजोत सिंह सिद्धू के साथ विवाद के कारण उन्होंने सितंबर 2021 में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद नवंबर 2021 में उन्होंने कांग्रेस भी छोड़ दी. कांग्रेस छोड़ने के बाद उन्होंने अपनी नई पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस बनाई, जिसका सितंबर 2022 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी में विलय कर दिया और वे खुद भी भाजपा में शामिल हो गए.
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